इस सूखे से भी बड़ी त्रासदी आने वाली है

इस सूखे से भी बड़ी त्रासदी आने वाली हैगाँव कनेक्शन

ये कोई आम सूखा नहीं है, मीडिया इस सूखे को किसी मौसमी समस्या के चलते कम हुई वर्षा से उपजी समस्या की तरह रिपोर्ट कर रही है, जिससे मुझे शिकायत है। अगर देश में लगातार तीन अच्छे मानसून भी आ जाएं तब भी समस्या नहीं टलने वाली। 

अच्छी बारिश के चलते शायद पीने का तो ज़्यादा पानी मिल जाएगा, पर हमारा पानी को इस्तेमाल करने का तरीका बदतर होता जा रहा है। इसके कारण ज़्यादा बड़ी पानी की त्रासदी उत्पन्न होने वाली है, क्योंकि हम जो भी कर रहे हैं वो स्थिति सुधार कतई नहीं रहा, बिगाड़ रहा है।

हमारा खेती का तरीका गलत है। हमने पानी को अनाज वाली फसलों से नकदी फसलों की ओर मोड़ दिया है। हमने ग्रामीण क्षेत्रों का पानी शहरों की ओर मोड़ दिया है। बस्तियों का पानी ऊंची ईमारतों को सप्लाई कर दिया है। इन सभी मामलों से साफ है कि पानी जैसे संसाधन को गरीबों से लेकर अमीरों को दिया जा रहा है, जो देश के गरीबों को बहुत कमज़ोर बना रहा है। 

इससे उबरने के लिए हमें इस सवाल का जवाब खोजना होगा कि क्या पानी मानव अधिकार है, मनुष्यों के अलावा सभी जीवित चीजों को उस पर अधिकार है, या फिर यह एक कमोडिटी है? अभी हम दूसरे वाले विकल्प पर चल रहे हैं, पानी को किसी कमोडिटी की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। 

इस दिशा में पिछले पंद्रह सालों में राज्यों ने तमाम कानून बनाए ‘महाराष्ट्र वॉटर रेग्यूलेटरी अथॉरिटी एक्ट’, ‘आंध्र प्रदेश वॉटर रेग्यूलेटरी अथॉरिटी एक्ट’ आदि। ये सभी कानून दिखाते हैं कि कैसे पानी को, उसके अधिकार को धीरे-धीरे समुदायों और किसानों से लेकर पीछे के रास्ते से निजीकरण की ओर बढ़ाया जा रहा है। 

हमने पिछले 20 सालों में बोतलों वाले पीने के पानी, सॉफ्ट ड्रिंक्स और बेवरेज इंडस्ट्री को भी खूब फलने-फूलने में मदद की है। ये कितना पानी इस्तेमाल करते हैं इसके बारे में कोई नहीं जानता पर निश्चित ही लाखों लीटर होगा। इसके बारे में हम क्या कर रहे हैं? 

इस सब में आप कमजोर हो चुके लोगों के हितों को कैसे सुरक्षित रखेंगे? इसके लिए सबसे पहले समझना होगा कि पानी बनाया नहीं जा सकता। और एक ऐसी अर्थव्यवस्था में जहां पानी की भारी कमी हो, आप उसे कमॉडिटी नहीं बना सकते। दूसरा आपको पानी को एक मानवाधिकार घोषित करना होगा। सिर्फ इंसानों के लिए नहीं बल्कि मनुष्य के साथ हर जीवित प्रजाति के लिए। इसके बाद प्राथमिकता तय कीजिए कि पानी का इस्तेमाल किस चीज़ के लिए पहले और किस चीज़ के लिए बाद में किया जा सकता है। 

जीवित रहने के लिए पीने का पानी, खाना बनाने के लिए प्रति घर के हिसाब से पानी, स्कूल, हॉस्पिटल यानि सारे ज़रूरी प्रयोग तय कर लिए जाएं, इनके लिए कितने पानी की आवश्यकता है ये तय हो जाए। फिर उसके बाद बहस करते रहिए कि बचे हुए पानी का क्या करना है।

(पी.साईंनाथ देश के वरिष्ठ ग्रामीण पत्रकार व ‘एवरीबडी लव्स अ गुड ड्रॉट’ किताब के लेखक हैं। यह लेख ‘डाउन टू अर्थ’ पत्रिका को दिए गए उनके साक्षात्कार का शब्दश: अंश है)

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