इतिहास की हिचकिचाहट से मुक्त मोदी!

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका में कहा कि भारत और अमेरिका के रिश्ते ‘हिचकिचाहट के इतिहास’ से निजात पा चुके हैं। उनकी इस बात से मेरे समक्ष इस सप्ताह के स्तंभ के लिए दो विकल्प खुलते हैं: पहला, इतिहास का आत्मोत्सर्ग या इतिहास के पाखंड। बल्कि काफी हद तक दोनों। सामरिक मुद्दे भले ही बहुत बाद में उभरे हों लेकिन भारत और अमेरिका सन 1947 के बाद से ही स्वाभाविक सहयोगी और साझेदार रहे हैं।

परंतु विश्वयुद्ध के उपरांत के समीकरणों में उलझा अमेरिका पूर्व और पश्चिम में यूरोप और जापान से परे देख ही नहीं सका। शुरुआत में भारतीय नेतृत्व भी ब्रिटेन पर निर्भर था। जल्दी ही अमेरिका के उक्त दोनों साझेदार शीतयुद्ध की भेंट चढ़ गए। पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ जाने में भलाई समझी जबकि भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेतृत्व पसंद किया जो अंतत: तत्कालीन सोवियत संघ की ओर झुकता चला गया। इसका पाखंड सबसे पहले तत्कालीन चेकोस्लोवाकिया में और उसके बाद अफगानिस्तान में सोवियत अतिक्रमण के समय उजागर हो गया।

भारत के दो सबसे प्रमुख पश्चिम विरोधी नेता जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी गहन संकट के क्षणों में अमेरिकी दरवाजे पर ही गए। ये अवसर थे क्रमश: चीन का आक्रमण और भीषण खाद्यान्न संकट। उसके बाद मोदी समेत तमाम भारतीय प्रधानमंत्रियों ने अमेरिका को बारबार यह याद दिलाया कि कैसे देश में हरित क्रांति को संभव बनाने में उसका योगदान रहा। पर हम सभी यह भूलना भी चाहते हैं कैसे सन 1971 में हमारे रिश्ते का सबसे बुरा दौर आया। उन वर्षों में गंवाए गए अवसरों को गिनने का कोई फायदा नहीं है। बुश, क्लिंटन, ओबामा समेत तमाम प्रमुख अमेरिकी नेताओं ने इतिहास के उन गंवाए गए दशकों का जिक्र अपनी बात में किया है। 

यह मानना सुविधाजनक है कि भारत-अमेरिका के रिश्तों के मौजूदा दौर की शुरुआत सन 1989 में शीतयुद्ध के खात्मे के साथ हुई। या फिर शायद इसकी शुरुआत उस समय होनी चाहिए थी पर हमारे छोर पर एक किस्म की हिचकिचाहट थी। सबसे पहले द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एक बड़ी घटना ने भारत को असहज स्थिति में डाल दिया। राजीव गांधी का पराभव हुआ (विरोधियों को नानी याद दिला देंगे वाला उनका भाषण याद कीजिए) और देश में दो वर्षों तक राजनीति अस्थिरता और आर्थिक गिरावट का दौर चला।

इस बीच पंजाब सुलग रहा था और कश्मीर में नई आग भड़क चुकी थी। देश का आत्मविश्वास हिला हुआ था। ऐसे में भारत के पास वैश्विक बदलावों को लेकर प्रतिक्रिया न देने का बहाना था। अमेरिका अफगानिस्तान में अपनी जीत को अंजाम देने लगा था इसलिए उसके पास भी यह कहने का अवसर था कि वह अपने ही संकट और राजनीतिक गड़बड़ियाें से जूझ रहे भारत तक नहीं पहुंच पाया। 

सन 1991 में आर्थिक सुधारों के साथ भारत ने इस यथास्थिति को तोड़ दिया पर राजनीतिक नेतृत्व अभी भी सामरिक अतीत में ही उलझा हुआ था। सोवियत संघ के विभाजन को लेकर उसकी मन:स्थिति ठीक नहीं थी। नरसिंह राव की सबसे भूलने लायक अविवेकपूर्ण नीतिगत पहल ठीक इसी स्थिति में सामने आई थी। सन 1991 के अगस्त में जब आधी अधूरी क्रांति की बदौलत मॉस्को में पुन: वामपंथी सत्ता कायम हुई तो इसे उन्होंने तत्काल सुधारवादियों को एक चेतावनी करार दे दिया था। 

हालांकि बाद में कुछ सुधार के प्रयास किए गए। इस क्रम में इजरायल के साथ रिश्ते सुधारना, अमेरिका की यात्रा और आखिर में दिया गया यह बयान शामिल था कि भारत और अमेरिका के रिश्ते अब अतीत की छाया से मुक्त हैं और आकाश नई संभावनाओं से लैस है। नरसिंह राव भारत को बहुत ठंडे रुख वाले दिनों से उबार ले गए। उस दौर में व्हाइट हाउस में शीतयुद्ध के दौर के लोगों का बोलबाला था, वहां परमाणु अप्रसार चाहने वाले लोग थे और रॉबिन राफेल के रूप में एक राह का रोड़ा भी था। कश्मीर में संकट व्याप्त था और दिल्ली-वॉशिंगटन के बीच अवसर कम बाधाएं अधिक थीं। बहरहाल राव में इतनी बुद्धिमता थी वह वैश्विक स्तर पर हो रहे आधारभूत सामरिक और आर्थिक बदलाव को संभाल सकें। 

राव ने देश की विदेश नीति में विश्व युद्ध के उपरांत का सुधार शुरू किया। मोदी ने अब इसे यह कहकर पूर्णता प्रदान की है एक मजबूत और समृद्ध भारत अमेरिका के ‘सामरिक हित’ में है। यह बात अतीत में कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री कह सकता था कि मजबूत भारत, अमेरिका के हित में है लेकिन उच्च कूटनयिक संबंध में शब्द मायने रखते हैं और सामरिक ऐसा ही एक शब्द है।

मोदी ने जिसे ऐतिहासिक हिचकिचाहट कहा उस अंतर को पाटने में 25 वर्ष का समय लगा। हम दोनों देशों के रिश्तों में तीन दशक में आए ठहराव को रिले दौड़ की तरह देख सकते हैं। राव ने रास्ता साफ किया। अटल बिहारी वाजपेयी पहला चरण दौड़े और उन्होंने बेटन मनमोहन सिंह को थमा दिया। संप्रग-1 में मनमोहन सिंह ने परमाणु समझौते के साथ बढ़िया प्रदर्शन किया पर संप्रग-2 में लड़खड़ा गए। मोदी ने गिरा हुआ बेटन उठाया और भरपाई की। 

चौथाई सदी के जमीनी काम के अलावा मोदी अपनी खुद की शक्ति भी इसमें समाते हैं। सबसे पहले उनके पास 282 का जादुई आंकड़ा है। यह संयोग नहीं पिछली बार जिस भारतीय प्रधानमंत्री ने अमेरिका में इतनी उत्सुकता जगाई थी वह पूर्ण बहुमत वाले राजीव गांधी ही थे। राव, वाजपेयी, मनमोहन सबका आदर था पर 150-200 सांसद भला 282 के मुकाबले कहां ठहरते हैं। दूसरी बात मोदी अब पेशेवर कूटनयिकों की टीम के साथ काम कर रहे हैं जो शीतयुद्ध के बाद बड़ी हुई। तीसरी बात, इतनी बड़ी प्रवासी आबादी को देखते हुए कहा जा सकता है अमेरिका के साथ भावनात्मक रिश्ता प्रगाढ़ हुआ है। चौथी बात, मोदी पूर्ववर्तियों की तुलना में खासे युवा हैं। 

मनमोहन सिंह अक्सर कहा करते भारत के प्रधानमंत्री का काम एक युवा व्यक्ति का काम है। तथ्य यह है कि देश के सबसे बुद्धिमान प्रधानमंत्रियों में तीन राव, वाजपेयी और सिंह ने अपने जीवन में कम से कम 10 साल की देरी से यह पद संभाला। राजीव के बारे में कहा जा सकता है कि वह 10 साल पहले प्रधानमंत्री बन गए। मोदी इस मामले में उपयुक्त कहे जा सकते हैं। 

उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका सुव्यवस्थित मस्तिष्क है। वह ऐतिहासिक पाखंडों से घिरे नहीं हैं। न ही बहुत अधिक कूटनयिक आकलन पढ़कर उनका दिमाग विश्लेषण पंगु हुआ है। शायद उपरोक्त  पूर्वग्रहों के चलते ही रक्षा सहयोग और परमाणु समझौते पर गतिरोध उत्पन्न हुआ था। तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी वाम केरल में प्रतिकूल निहितार्थ देख चुके थे जबकि अन्य लोगों ने सोनिया गांधी को डरा दिया था वह मुस्लिम वोट गंवा देंगी। मोदी एक कोरी स्लेट की तरह खुले मन से अमेरिका गए। भले ही विपक्ष में रहते हुए मोदी और उनके दल ने इन्हीं नीतियों का जमकर विरोध किया हो।

सत्ता में आपका पहला दिन एक नए इतिहास का प्रस्थान बिंदु भी बनता है। यह बात मोदी को कूटनीति और समझौतों के क्षेत्र में बदलावपरक क्षमता वाला नेता बनाती है। वह व्यापार और जलवायु परिवर्तन वार्ता पर परस्पर लेन-देन के लिए तैयार हैं ताकि और अधिक गुंजाइश निकल सके। वह चीन की सामरिक चिंताओं का शमन करते हुए आर्थिक और व्यापारिक गुंजाइश बढ़ाने के इच्छुक हैं। उस लिहाज से मोदी बुश जूनियर या रीगन के करीब ठहरते हैं। वह लक्ष्य केंद्रित सपाट व्यक्ति, सौदे करने में उस्ताद दक्षिणपंथी गुजराती हैं जो इतिहास की हिचकिचाहट और पाखंड से मुक्त हैं।    

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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