ज़िलों में ट्रॉमा सेंटर हों तो बच सकती हैं सैकड़ो जाने

Arvind ShukklaArvind Shukkla   27 April 2016 5:30 AM GMT

ज़िलों में ट्रॉमा सेंटर हों तो बच सकती हैं सैकड़ो जानेगाँव कनेक्शन

लखनऊ। वाहन चालकों की लापरवाही और भारत में सड़कों की दुर्दशा से सड़क हादसों में मरने वालों की संख्या 2015 में पांच फीसदी बढ़ गई। भारत में रोजाना चार सौ लोगों की जान जा रही है। इऩमें से अधिकांश की मौत वक्त पर सही इलाज न मिलने से होती है। यानि जिलों में ट्रामा सेंटर हों तो सैकड़ों जानें बचाई जा सकती हैं।

पिछले शनिवार को बाराबंकी के फतेहपुर के पास हादसे में तीन युवक घायल हो गए। दो घायलों की एंबुलेंस में मौत हो गई, जबकि तीसरे ने बाराबंकी जिला अस्पताल में दम तोड़ दिया। अस्पताल में मौजूद गाँव कनेक्शन रिपोर्टर के मुताबिक घायल को सिर्फ ड्रिप चढ़ाई गई 20 मिनट बाद उसकी सांसें उखड़ गईं। हो सकता है वो बच जाता, अगर उचित इलाज मिलता। कई लोगों ने भी माना कि अगर जिला अस्पताल में बेहतर उपचार होता तो उसे बचाया जा सकता था।

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री गडकरी ने पिछले दिनों माना कि भारत में प्रतिवर्ष पांच लाख दुर्घटनाएं होती हैं, जिनमें 1.5 लाख की जान जाती है। हमारी कोशिश 2020 तक इऩमें 50 फीसदी कमी लाने की कोशिश है।        

अंग्रेजी अख़बार टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक वर्ष 2015 में 1.45 लाख लोगों की मौत सड़क हादसों में हुई, जो वर्ष 2014 के अनुपात में पांच फीसदी ज्यादा हैं।

जिलों में ट्रामा सेंटर बनाने की बात लगातार होती रही है। पिछले वर्ष मुख्य सचिव आलोक रंजन में जिलों में ट्रामा सेंटर बनाए जाने की बात की थी। जबकि अभी अप्रैल में ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सैफई में कहा था, “हादसों के दौरान ज्यादा लोगों की जानें बचाई जा सकें इसलिए प्रदेश 40 ट्रामा सेंटर बनाए जाएंगे।” उत्तर प्रदेश राज्य पुलिस और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में इस दौरान सबसे ज्यादा 17,666 लोगों की जान गई जबकि 15,642 मौते के साथ तमिलनाडु दूसरे नंबर पर है।

लखनऊ में स्थित केजीएमयू के ट्रामा सेंटर में प्रदेश के दूरदराज इलाकों से रोजाना 70-80 घायल आते हैं। लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के ट्रामा सेंटर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. धीरेंद्र पटेल बताते हैं, “सबसे ज्यादा हादसे शराब पीकर गाड़ी चलाने और हेलमेट न लगाने से होते हैं। हादसों में सबसे ज्यादा चोट सिर पर आती है। पश्चिमी यूपी के कुछ जिलों को छोड़कर बाकी सारे घायल यहां आते हैं। पूर्वी बिहार के कई जिलों के मरीज हमारे यहां रेफर किए जाते हैं। अगर जिलों में ट्रामा सेंटर जैसे सुविधाएं हों तो लखनऊ में दबाव तो कम होगा ही, सैकड़ों जानें बचाई जा सकेंगी।”

सीएमओ डॉ. धीरेंद्र आगे बताते हैं, “हमारे यहां ट्रैफिक कल्चर और यातायात को लेकर लोग जागरुक नहीं है। बिना हेलमेट, ट्रैफिक नियम तोड़ना आम बात है। प्रदेश भर में एबुलेंस 10-20 मिनट में मौके पर पहुंच जाती हैं, तो एंबुलेंस में मौजूद कर्मचारी को ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। जिलों के अस्पतालों में मौजूद डॉक्टरों को भी बेहतर तरीके से प्रशिक्षित कर जानें बचाई जा सकती हैं।”

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