जड़ी-बूटियों को लेकर लोगों की समझ आसान बने

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कुछ हफ्तों से रेडियो पर रू-ब-रू हो रहा हूं। मैं हर्बल टिप्स देता हूं, लोगों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए कई सुझाव भी देता हूं और कई बार पाठकों से सीधे चर्चा भी कर लेता हूं।

कई बार कुछ सवाल इतने गंभीर हो जाते हैं कि जिनके सामने खुद को निरुत्तर पाता हूं। कुछ सवाल इतने बेरुखे से होते हैं कि मन में तकलीफ भी होती है। सदियों पुराना पारंपरिक हर्बल ज्ञान जिसे हमने पीढ़ी दर पीढ़ी अपनाया है, दुर्भाग्य से लोग इस पर ज्यादा भरोसा नहीं करते हैं। त्वरित उपचार के चक्कर में हमने उन दवाओं को अपनाया है जिनके दुष्परिणामों को भुगतना तय है।

पिछले 18-19 वर्षों से हमारे देश के पारंपरिक ज्ञान को समझने की कोशिश कर रहा हूं, विज्ञान के नज़रिए से भी देख रहा हूं, यकीन मानिए ये दमदार है। सवाल जवाब के दौरान अक्सर लोग पूछ लेते हैं कि उन्हें किसी ऐसी वनस्पति की जानकारी बताई गई है जो हिमाचल और ऊपरी इलाकों में ही मिलती है, हम गुजरात में रहते हैं, कहां से लाएं उन जड़ी बूटियों को? क्या हमारे इर्दगिर्द को ऐसी जड़ी-बूटी नहीं जो हमारा रोग निदान कर पाए? बेशक है, लेकिन कोई आपको क्यों बताएगा कि आप घर बैठे ठीक हो सकते हैं, आखिर बात बाज़ार और व्यवसाय की कला से जो जुड़ी है।

अब तक के अपने अनुभवों के आधार पर कह सकता हूं कि हमारे गाँव-देहातों और वनवासियों से जुड़ी जानकारियां असरदार हैं बशर्ते इससे जुड़ी तमाम युक्तियां सही दिशा में काम करें, जैसे, सही सलाह, सही जड़ी-बूटियों का मिलना, सही मात्रा, अनुपात और रोगी की वास्तविक दशा की परख। स्वदेशी हर्बल ज्ञान को सबसे बड़ा नुकसान पहुंचाया है इसके अंधाधुंध बाज़ारीकरण और झोलाछाप जानकारियों ने। कई जानकार जड़ी-बूटियों के बारे में इतनी सारी बातें बोल जाते हैं कि ऐसा लगने लगता है मानो कुछ जड़ी बूटियां अमृत ही हैं।

जानकार इस तरह की वनस्पतियों को हिमालय से लेकर सुदूर पूर्वी राज्यों के पहाड़ी इलाकों से लाने और फिर दवा बनाने का दावा करते हैं। मेरी समझ से परे है कि ऐसे अमृतगुणों वाली जड़ी-बूटियां एक या दो ही क्यों है? हर वनस्पति की एक खासियत होती है, हर एक वनस्पति असरदार है, इस बात को जानकार भी जानते हैं। हल्दी की ही बात लीजिए लिपिटर/ एटरवास्टाटिन (कॉलेस्ट्रॉल), कॉर्टिकोस्टेरॉयड (स्टेरॉयड), प्रोजेक/ फ़्लोक्सेटाइन और इमीप्रामाइन (डिप्रेशन), एस्प्रीन (ब्लड थिनर), इबुप्रोफ़ेन, नाप्रोक्सेन, इन्डोमेथासिन, डायक्लोफिनाक, डेक्सामेथासोन, सेलेकॉक्सिब, टेमोक्सिफेन (एंटीइन्फ्लेमेटरी ड्रग्स), ऑक्सेलीप्लाटिन (कीमोथेरापी), मेटफ़ोर्मिन (डायबिटीस), इन दवाओं के नाम कभी ना कभी आपने सुने होंगे, ये सारी रासायनिक और कृत्रिम दवाएं हैं जिनका बाज़ार काफी तगड़ा है और इनके ग्राहक आप-हम सब हैं।

जेब को ढ़ीली करने वाली इन दवाओं और इसी तरह की कम से कम 18 ऐसी ही दवाओं से बेहतर प्रभाव हमारी अपनी हल्दी में देखा जा सकता है लेकिन इतनी आसानी से सेहत उपाय कोई आपको क्यों बताएगा? अब हर कोई निरोगी हो जाएगा तो इतनी सारी दवाओं के व्यापार पर अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष असर तो पड़ेगा ही। मैंने हल्दी के असर को बेहद करीब से देखा है और दावे से कह सकता हूं कि हर व्यक्ति को कम से कम दो चम्मच शुद्ध हल्दी की गांठ का पाउडर का सेवन नियमित करना चाहिए, इसे पानी में घोलकर लें या शहद में मिलाकर। हल्दी आपके व्यंजनों को खूबसूरत दिखाने के लिए नहीं है, सदियों से इसे सेहत के मायनों के साथ इस्तेमाल में लाया जाता रहा है। 

दरअसल आपकी सेहत को दुरुस्त करने के लिए इन तमाम रासायनिक दवाओं की बॉस है हल्दी। 1998 से 2015 तक तमाम इंटरनेशनल जर्नल्स में प्रकाशित सैकड़ों शोध रिपोर्ट्स खंगाले जा सकते हैं जो दावे को सच साबित करेंगे। हल्दी को ज्यादा से ज्यादा उपयोग में लाएं, आपको नहीं पता आपकी सेहत दुरुस्ती का असली डॉक्टर आपकी अपनी रसोई के भीतर किसी डिब्बे में बंद पड़ा है। अब ये बात अलग है बाज़ार में मिलने वाली हल्दी कितनी असली, कितनी नकली है पर इस पारंपरिक नुस्खे को आधुनिक विज्ञान तो सलाम ठोक ही रहा है।

इतने विस्तार से जवाब दे पाना रेडियो पर संभव नहीं हो पाता है लेकिन मेरा प्रयास है कि जड़ी बूटियों को लेकर लोगों की समझ आसान बने। सवाल जब भी मन में उछलकूद करें, उनके जवाबों को खोजा जाना बेहद जरूरी है वर्ना सवाल शंकाओं में बदल जाते हैं और जड़ी-बूटियों या हर्बल मेडिसिन्स के असर को लेकर शंकाओं के बादल बनने की वजहें भी यही रही कि कई सवालों के जवाब आम लोगों तक पूरी तरह से नहीं पहुंच पाए, मेरी कोशिश हरदम यही होती है कि मैं अपनी तरफ से कुछ सवालों के पूरे-पूरे जवाब देकर हर्बल मेडिसिन्स से जुड़ी शंकाओं के बादलों को हटाकर रख दूं।

(लेखक हर्बल जानकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।) 

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