झारखंड के एक गांव की कहानी: महिलाओं ने ईंट पाथकर बनाए शौचालय, यह थी वजह

ये कहानी झारखंड के उस नक्सल प्रभावित क्षेत्र की है जहाँ आवागमन आज भी एक बड़ी चुनौती है। यहाँ रहने वाले ग्रामीणों का जीवन भले ही मशक्कतों भरा हो लेकिन इस गाँव के हर घर में बने शौचालय यहाँ की एक सुखद तस्वीर है। जिस तस्वीर को यहाँ की आदिवासी महिलाओं ने गढ़ा है।

Neetu SinghNeetu Singh   30 Aug 2019 11:01 AM GMT

लातेहार (झारखंड)। घने जंगलों के बीच पहाड़ी पर बसे आख़िरी गाँव नवरनागू की मीना देवी के घर बना शौचालय बेहद ख़ास है क्योंकि इसे उन्होंने खुद ईंट पाथकर बनाया है।

जिला मुख्यालय से लगभग 110 किलोमीटर दूर बरवाडीह प्रखंड के नवरनागू गाँव में रहने वाले ग्रामीणों का जीवन भले ही मशक्कतों भरा हो लेकिन इस गाँव के हर घर में बने शौचालय यहाँ की एक सुखद तस्वीर है। जिस तस्वीर को यहाँ की महिलाओं ने गढ़ा है। इस गाँव में बने शौचालय यहाँ की आदिवासी महिलाओं के जुझारूपन की गवाही दे रहे हैं। जिसे इन्होंने खुद ईंट पाथकर निर्माण किया है। पहाड़ी पर बसे ये उस आख़िरी गाँव की कहानी हैं जहाँ आज भी आवागमन एक बड़ी चुनौती है।

मीना देवी (40 वर्ष) खुश होकर आत्मविश्वास के साथ कहती हैं, "हम लोगों ने खुद ही ईंट बनाकर ये शौचालय बनाया है। अगर ईंट खरीदकर मंगवाते तो शौचालय की पूरी लागत इसी में चली जाती। इसलिए थोड़ी मेहनत जरुर पड़ी लेकिन अब शौचालय बनने से आराम बहुत है।"

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वो अपने गाँव की मुश्किलें बताती हैं, "शौचालय बनाने में बहुत कम ईंटों की जरूरत होती है। इसलिए अगर इतनी ईंटे मंगाते तो हमें 30 किलोमीटर दूर से मंगाना पड़ता। पहाड़ों और जंगलों के बीच का रास्ता ठीक नहीं है इसलिए कोई जल्दी आने को तैयार नहीं होता है रास्ता भी सही नहीं है। भाड़ा बहुत ज्यादा लग जाता इसलिए जो काम खुद कर सकते हैं वो कर लिया।" मीना देवी इस गाँव में चल रहे खुशबू आजीविका स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष हैं।

वर्ष 2018 में 32 घरों के इस गाँव में जब शौचालय निर्माण की बात हुई तो इनके लिए सबसे बड़ी चुनौती थी ईंट कहां से लाई जाए। शौचालय निर्माण का बाकी सामान तो पांच दस किलोमीटर की दूरी पर मिल जाता है। लेकिन 30-35 किलोमीटर दूर से ईंट लाना इनके लिए सम्भव नहीं था इसलिए इन्होंने खुद ही ईंट पाथकर शौचालय निर्माण करना ठान लिया। इनकी मेहनत रंग लाई और कुछ महीनों में यहाँ शौचालय निर्माण हो गया। जिनके पास पहले से ईंटें थी उन महिलाओं को छोड़कर ज्यादातर महिलाओं ने खुद ही ईंट पाथी और शौचालय निर्माण भी घर में पुरुषों की मदद से पूरा किया।


ये बरवाडीह प्रखंड का वो आखिरी गाँव है जिस क्षेत्र को नक्सलों का गढ़ माना जाता है। ऐसे सुदूर और दुर्गम गाँव में सरकार की हर योजना पहुंच सके उसके लिए झारखंड ग्रामीण विकास विभाग एवं झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी प्रयासरत है। नवरनागू उन्हीं दुर्गम गाँव में से एक हैं जहाँ विभाग की कोशिश से न केवल सखी मंडल का गठन किया गया बल्कि स्वच्छ भारत मिशन के तहत बनने वाले शौचालय का लाभ भी इन तक पहुंचाया गया। विभाग की मदद से योजना तो इस गाँव में पहुंच गयी थी लेकिन उसे रफ्तार सखी मंडल से जुड़ी उन दर्जनों महिलाओं ने दी जिन्होंने शौचालय निर्माण में ईंट की समस्या को बाधा नहीं बनने दिया।

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आदर्श आजीविका स्वयं सहयता समूह की सचिव तारामुनी देवी (24 साल) अपने गाँव में लगी पानी टंकी की तरफ इशारा करते हुए कहा, "जब हम लोगों ने इतनी मुश्किलों से शौचालय बनाया तो इसकी तारीफ़ दूर-दूर तक हुई। हमारे पास के गाँव में जिलाधिकारी और कई अधिकारी आये जिन्होंने हमारे साथ चौपाल की और हमारे काम को सराहा।" वो आगे कहती हैं, "इससे हम महिलाओं का बहुत आत्मविश्वास बढ़ा। एक बार हम लोग जिलाधिकारी के पास गये और उनसे कहा साहब हमारे यहाँ पानी की बहुत दिक्कत है। वो हमारे काम से पहले से खुश थे इसलिए उन्होंने हमारे गाँव में सौर उर्जा से चलने वाली ये समर्सिबल और टंकी लगवा दी। जिससे हमारी पानी की समस्या भी समाप्त हो गयी।

पहाड़ों और जंगलों पर बसे सुदूर और दुर्गम गाँव में मुश्किलें तो अनगिनत होती हैं लेकिन ये कुछ सुखद तस्वीरें बदलाव की कहानियाँ गढ़ती हैं। उत्साह जगाती हैं और उन लोगों के लिए उदाहरण होती हैं जो आज भी मुश्किलों में रास्ता नहीं निकाल पाते हैं। झारखंड में ऐसे कई गाँव हैं जहाँ की महिलाओं ने विषम हालातों से निकलने के तरीके खोज निकाले हैं आज ये गाँव इन महिलाओं की वजह से बदलाव की नई इबादत लिख रहे हैं।

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