झुग्गी में चल पड़ी 'हमारी पाठशाला'

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इलाहाबाद। देश के कानून ने शिक्षा का अधिकार तो सबको दे दिया है और सरकारों ने इसके लिए स्कूल भी खुलवा दिए हैं, इसके वावजूद देश में अभी भी बहुत से बच्चे हैं जो स्कूल नहीं जा पाते हैं। आईएस की फैक्ट्री कहलाने वाले इलाहाबाद में भी ऐसे ही बहुत से बच्चे है जो स्कूल नहीं जा पाते, जिस संगम के लिए ये शहर मशहूर है उसी संगम के किनारे सैकड़ों झुग्गियां बनीं हुई हैं, जिनमें बहुत से गरीब बच्चे रहते हैं, जो स्कूल नहीं जाते हैं, लेकिन अब उनकी बस्ती में ही पाठशाला लगने लगी है। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों ने मिलकर इन बस्ती वाले बच्चो के लिए 'हमारी पाठशाला' नाम की एक संस्था खोली है जो इन गऱीब बच्चों को मुफ्त में पढ़ाती है, किताबें देती है और साथ ही इनको पास के ही प्राइमरी स्कूल में दाखिला भी दिलवाती है।

हमारी पाठशाला की शुरुआत करने वाले राजीव कृष्ण द्विवेदी हमें बातातें है, ''मैं अक्सर संगम के किनारे वाले मंदिरों में आता था और यहां बच्चों को यूंही घूमते रहते देखता था, फिर मैने सोचा की इनके लिए कुछ किया जाय, लेकिन मैंने फिर सोचा की आगे हम खुद कुछ बन जाएं फिर इनके लिए कुछ करें, लेकिन फिर सोचा कि हम अपने शाम का समय यूं ही बर्बाद कर देते हैं, अगर हम अपने उस समय को इन बच्चो के हित में लगा दे तो अच्छा रहेगा। बस इसी सोच के साथ मैंने 'हमारी पाठशाला' खोली, जो यहां पर आकर इन बच्चों को पढ़ाती है।"

''शुरुआत में तो मैं अकेला ही यहां आता था और बच्चों को पढ़ाने की कोशिश करता था पर यहां पर लोग इसका विरोध करते थे तो मैंने अपने कुछ दोस्तों से बात की और फिर मेरे दोस्त भी यहां आने लगे और यहां के लोगो को शिक्षा के बारे में समझाया तब जाकर यहां के कुछ बच्चे हमे पढ़ाने के लिए मिले, लेकिन अब समस्या थी की कौन सी जगह पर पाठशाला लगाई जाए, क्योंकि वहां पर कोई जगह देने को तैयार नहीं था फिर हमने बच्चो के साथ मिलकर एक नीम के पेड़ के नीचे जहां पर लोग कचरा फेंकते थे उसकी सफाई की और वहां पर 'हमारी पाठशाला' शुरू की। अब हमारी पाठशाल में 60 बच्चे पढ़ते हैं।" राजीव आगे  बताते हैं।

आप बनारस की ओर से जैसे ही शास्त्री पुल पार करके इलाहाबाद में प्रवेश करेंगे वैसे ही आपको संगम का अद्भुत नज़ारा देखने को मिलेबा और उसी नज़ारे के बीच में बांई ओर दिखतीं है सैकड़ो झुग्गी-झोपड़ी, जिनमें रहता है शहर का एक गरीब वर्ग जो रिक्शा चलाकर अपना पेट पालते हैं। उनके पास इतने पैसे नहीं है की अपने बच्चों को स्कूल भेज सकें, लेकिन 'हमारी पाठशाला' के प्रयास से अब इन झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले बच्चे अनपढ़ नहीं कहलायेंगे। 

इन्ही झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाला कमलेश (12 वर्ष) बताता है, ''पहले मैं स्कूल जाता था, लेकिन वहां पर अच्छी पढ़ाई न होने के कारण पढ़ाई छोड़ दी, पापा के साथ रिक्शा चलने लगा, लेकिन जब दो साल पहले बस्ती में पाठशाला खुली तो मैने फिर से पढ़ाई चालू कर दी। मैं पढ़-लिख कर एक पुलिस ऑफिसर बनाना चाहता हूं।"

हमारी पाठशाला के सचिव वेद दूबे बताते है, ''हम बच्चों को सिर्फ पढ़ाते ही नहीं बल्कि उनके साथ हर उत्सव मानते हैं, जैसे एक बच्चे को लगता है दिवाली है तो नए कपड़े पहनें, मीठा खाएं वैसे ही इन्हें भी लगता है इसलिए हम इन्हें नए कपडे देते है मिठाई बांटते हैं, इसके लिए हम आपस में ही चंदा लगा कर पैसा इकट्ठा कर लेते है। कुछ हमारे शिक्षक है और कुछ हमारे जान पहचान के लोग हैं जो हमारी इस कार्य मेें मदद करते हैं। बस इन सब लोगों के कारण ही हमारी पाठशाल चल रही है और हम इस पाठशाला को धीरे-धीरे पूरे देश में चलायेंगे और देश के किसी भी बच्चे को अशिक्षित नहीं रहने देंगे।"

बस्ती में रहने वाली कुसुम (45 वर्ष) कहतीं है, ''जबसे ये भैया लोग आने लगे हैं, यहां हम लोगों का बहुत अच्छा लगता है। हमारे बच्चे भी अच्छे रहने लगे हैं। सब पढ़तें भी है अब तो यहां पर प्राइमरी स्कूल है जो दूर है जिससे बच्चे वहां नहीं जाते है और वहां पढ़ाई भी नहीं होती है, लेकिन जबसे भैया लोग यहां आयें तब से बच्चे स्कूल जाते हैं और पढ़ाई भी करते हैं।"

रिपोर्टर - आकाश द्विवेदी 

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