जल केवल प्यास नहीं बुझाता, ऊर्जा का बड़ा स्रोत भी है

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आजकल देश में पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची है और किसानों का तो जीवन ही संकट में है। यदि नदियों को जोड़ने की रिपोर्ट सरकारी दफ्तरों में धूल न खा रहीं होती तो शायद हालात कुछ बेहतर होते। शायद गरीबी, भुखमरी, अकाल पर राजनीति हमेशा भारी पड़ती है। जल संकट आज है और अन्न संकट कल होगा फिर ऊर्जा संकट परसों। छुद्र राजनीति से ऊपर उठने की जरूरत है। 

सच कहा जाए तो जल संकट की ही तरह ऊर्जा संकट की परछाईं सारे देश और विशेषकर उत्तर प्रदेश पर लम्बी होती जा रही है। इस पर विवाद नहीं हो सकता कि हमारी सरकारें कृषि, उद्योग, परिवहन और घरेलू उपयोग के लिए पर्याप्त ऊर्जा उपलब्ध करा पा रही हैं। टिकाऊ विकास का लक्ष्य पूरा करने के लिए ऊर्जा के स्थाई स्रोत खोजने का कोई गम्भीर प्रयास भी नहीं हो रहा है। ऊर्जा उत्पादन मुख्य रूप से कोयला और पेट्रोलियम पर निर्भर है जो खुद ही निरन्तर घटते हुए स्रोत हैं। घटती हुई उपलब्धता के साथ ही इनके कचरा विसर्जन और अम्लीय वायु प्रदूषण की समस्या है। ऊर्जा संकट से निपटने में जलशक्ति पहली प्राथमिकता होनी चाहिए थी। यह स्रोत सस्ता, साफ सुथरा और आसानी से उपलब्ध है।

ऊर्जा स्रोत के दूसरे विकल्प हैं सूरज, वायु, बायो मास और पानी के गरम सोते। जलशक्ति हमें ज्वार-भाटा, तरंगों, जलताप और जलविद्युत के रूप में मिल सकती है और मिलती है। विकसित देशों के विकास में जलविद्युत का योगदान कुल आवश्यकता का 50 प्रतिशत से अधिक रहता है जबकि भारत में यह 15 प्रतिशत के लगभग है। ध्यान रहे भारत के पास जलशक्ति उत्पादन की सम्भावना दुनिया के किसी भी देश से अधिक है। पानी में यह ऊर्जा है कहां पर।

पानी, दो गैसों हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन से दो और एक के अनुपात में मिलकर बना है। इनमें से हाइड्रोजन अत्यधिक ज्वलनशील होती है और बड़ी मात्रा में ताप ऊर्जा तथा तापशक्ति दे सकती है। यह सत्य है कि ऑक्सीजन और हाइड्रोजन बन्धन बहुत मजबूत और 400 करोड़ साल पुराना है जब धरती पर पहली वर्षा हुई थी। वह ऊर्जा जो इन दो तत्वों के परस्पर मिलने में खर्च हुई थी वह इनके टूटने पर मुक्त होगी। भारत के चारों ओर इतना समुद्री पानी उपलब्ध होने के कारण हाइड्रोजन शक्ति की सम्भावना असीमित है। इसके साथ ही ऊंचाई पर स्थित पानी में स्थिर ऊर्जा होती है जो बहाव के साथ गतिज ऊर्जा में बदल जाती है। यह गतिज ऊर्जा टर्बाइन घुमाकर बिजली पैदा कर सकती है।

इसी तरह समुद्र सतह पर चलने वाली हवाएं धाराओं और लहरों के माध्यम से अपनी पवन ऊर्जा समुद्र को दे देती है। समुद्र तट पर दिन रात टकराती लहरों में टाइडल एनर्जी होती है जो विद्युत पैदा करने की क्षमता रखती हैं। इसी प्रकार नदियों पर बहुउद्देशीय बांध बनाकर जलविद्युत पैदा की जाती है। बांधों से जलाशय में बड़ी मात्रा में पानी रोका जाता है जिसे टनलों से टर्बाइनों तक ले जाया जाता है जो जेनेरेटर्स को घुमाते हैं और बिजली पैदा होती है।

 देश में अनेक बड़े बांध हैं जैसे भाखड़ा नंगल, रिहन्द, नागार्जुन सागर, सरदार सरोवर और टिहरी बांध। विद्युत उत्पादन के साथ ही इन बांधों से सिंचाई, मछली पालन और पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। इन बड़े बांधों से कुछ हानियां भी होती हैं जैसे जंगलों, खनिज सम्पदा का धरोहर का जलमग्न होना और निवासियों का विस्थापन। फिर भी यदि भारत को विकसित देशों की जमात में जाना है तो यह हानि सहन करनी होगी। यदि नदियों द्वारा ऊर्जा उत्पादन से बाढ़ और सूखा को नियंत्रित किया जा सके तो देश का कल्याण होगा।

उत्तर भारत की नदियों में प्रायः अतिरिक्त जल रहता है जबकि दक्षिण की नदियों में कमी रहती है। चूंकि उत्तर से दक्षिण को जमीन का ढलान है इसलिए गंगा को कावेरी या अन्य नदियों को परस्पर जोड़ा जा सकता है। इस विषय पर अनेक रिपोर्टें सरकारी दफ्तरों में धूल खा रही हैं। यदि नदियों को जोड़ने का काम रोका न गया होता तो आज का अकाल इतना नहीं सताता और शायद भारत दुनिया का अनाज भंडार बना होता।

sbmisra@gaonconnection.com

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