जुलाई के पहले सप्ताह से करें भिन्डी की बुवाई

जुलाई के पहले सप्ताह से करें भिन्डी की बुवाईgaon connection

लखनऊ। भिण्डी भारत की एक लोकप्रिय सब्ज़ी है, जो देश के लगभग सभी भागों में उगाई जाती है। ताज़ी भिण्डी की निर्यात की काफी सम्भावनाएं है। इस समय निर्यात की जाने वाली सब्ज़ियों में लगभग 60 प्रतिशत भिन्डी निर्यात की जाती है।

उन्नतशील किस्में

बीआरओ-6: यह प्रजाति पीत सिरा मोजैक और प्रारम्भिक पत्ती मरोण विषाणु रोग से अवरोधी है। इसमें फूल 28 से 40 दिनों में आ जाता है। इसकी पैदावार गर्मी के दिनों में 235 कुन्तल और बरसात की फसल में 260 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक होती है।

बीआरओ-5: यह भिण्डी की बौनी प्रजाति है। इसकी बढ़वार 60 से 80 सेंटीमीटर तक सीमित है। इसमें फूल 40 दिन में आ जाते हैं। यह किस्म बौनी होती है एवं अच्छी उपज देती है। इसकी पैदावार बरसात की फसल में 150 कुन्तल व गर्मी में 120 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक होती है।

परभनी क्रान्ति: यह किस्म पीत सिरा मोजैक विषाणु के प्रति अवरोधी है यह बुआई के 50-55 दिनों में तुड़ाई योग्य हो जाती है। फलियां पांच धारियों वाली मुलायम, चिकनी, 12-15 सेंटीमीटर लम्बी होती है। इसकी पैदावार 85-90 कुन्तल प्रति हेक्टेयर होती है।

आईआईवीआर-10: यह भिण्डी की सात धारियों वाली किस्म है। पौधों में फूल बोने के 42 दिन बाद आ जाते हैं। यह प्रजाति भी पीत सिरा मोजैक व प्रारम्भिक पत्ती मरोण विषाणु से अवरोधी है। इसकी पैदावार बरसात के दिनों में लगभग 150 कुन्तल प्रति हेक्टेयर होती है।

बीज की मात्रा: बीज की मात्रा बोने के समय व दूरी पर निर्भर करती है। खरीफ की खेती के लिए 9-10 किलोग्राम और ग्रीष्मकालीन फसल के लिए 12-15 किलोग्राम बीज की प्रति हेक्टेयर आवश्यकता होती है।

बुआई: भिन्डी की बुआई समतल क्यारियों एवं मेड़ों पर करते हैं, जहां मिट्टी भारी तथा जल निकास का अभाव हो वहां बुआई मेड़ों पर करते है। गर्मी के दिनों में अगेती फसल लेने के लिए बीज को 24 घण्टे तक पानी में भिगो कर और छाया में थोड़ी देर सुखा कर बुआई करनी चाहिए। बुआई के पहले कैप्टाफ या थिरम नामक कवकनाशी दवा से (2.5-3) ग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज से उपचारित कर लेना चाहिए । 

खाद एवं उर्वरक: भिण्डी की अच्छी पैदावार के लिए भूमि में 8-10 टन सड़ी गोबर की खाद 80 किलोग्राम यूरिया, 41 किलोग्राम डीएपी और 33 किलोग्राम म्यूरेट अॉफ पोटाश (एमओपी) प्रति एकड़ की दर से देना चाहिए। गोबर की खाद खेत की तैयारी के समय अच्छी प्रकार मिट्टी में मिला लें। यूरिया की एक तिहाई मात्रा तथा (डीएपी) और पोटाश की पूरी मात्रा बुआई के पूर्व मिट्टी में मिला लेना चाहिए। यूरिया की शेष मात्रा बुआई के 30 व 50 दिन के बाद फसल में टॉपड्रेसिंग के रुप में दें।

सिंचाई: यदि भूमि में अंकुरण के समय पर्याप्त नमी न हो तो बुआई पलेवा देकर करना चाहिए। अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें। बरसात में यदि वर्षा होती रहती हैं तो सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती। वर्षा ऋतु में भिण्डी की फसल में पानी के निकास का उचित प्रबन्ध होना चाहिए ।

खरपतवार नियंत्रण: भिण्डी के पौधे के विकास और बढ़वार पर खरपतवार प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। खरपतवार के नियंत्रण के लिए डयअल (मेटोलेक्लोर-50 ईसी) की 2 लीटर मात्रा या स्टाम्प (पेन्डिमेथलीन 30 ईसी) की 3.3 लीटर दवा 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई के 24 घंटे के अन्दर छिड़काव करने से खरपतवार नष्ट हो जाते हैं तथा पैदावार अच्छी प्राप्त होती है। आवश्यकतानुसार निराई गुड़ाई करते रहना चाहिए।

जलवायु

भिण्डी के लिए लम्बे गर्म मौसम की आवश्यकता पड़ती है। इसकी खेती के लिए औसत ताममान 25 से 30 डिग्री सेन्टीग्रेट उपयुक्त पाया गया है। भिन्डी की बुवाई औसतन 20 डिग्री सेन्टीग्रेट से अधिक तापमान होने पर करनी चाहिए । 

भूमि और भूमि की तैयारी

इसकी खेती जीवांशयुक्त गहरी दोमट या बलुई दोमट मिट्टी में की जा सकती है। इसकी अच्छी खेती के लिए 6 से 9 पीएच मान वाली मिट्टी सबसे अच्छी है। यदि खेत में नमी की कमी हो तो पलेवा कर खेत की 3-4 जुताई करके पाटा लगा देना चाहिए।

बुआई का समय

बरसात की फसल जून-जुलाई और ग्रीष्म ऋतु की फसल की बुआई फरवरी-मार्च में करते हैं। उत्तर भारत में व्यवसायिक दृष्टि से अगेती फसल का काफी महत्व है। बहुत अगेती फसल की बुवाई का समय फरवरी माह का प्रथम सप्ताह है। अगेती फसल आकस्मिक मौसम पर भी निर्भर करती है।

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