जवाहरबाग में प्रशासन की हत्या हुई या उसने हाराकीरी की है

जवाहरबाग में प्रशासन की हत्या हुई या उसने हाराकीरी की हैgaonconnection

छले सप्ताह मथुरा में रामवृक्ष यादव और उनके 3000 आतंकी मानसिकता वाले लोगों के साथ पुलिस की मुठभेड़ में दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शहीद हो गए। राजनीति इतनी गरम है कि भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने शिवपाल यादव का नाम लेकर दोषारोपण किया है और मायावती ने बिना नाम लिए। देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सीबीआई जांच का सुझाव दिया है। कानून व्यवस्था प्रदेश सरकार का विषय है इसलिए सरकार को केन्द्र से ऐसी जांच की मांग स्वयं करनी चाहिए थी लेकिन प्रदेश सरकार इसके पक्ष में नहीं दिखती। आम आदमी के मन से तभी शंका दूर होगी जब पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच हो जाएगी।

यह कोई साधारण घटना नहीं है जिस पर दस बीस लाख का मुआवजा देकर सन्तोष कर लिया जाए। कुछ सिरफिरे लोगों ने सरकार को खुली चुनौती दी है। भले ही प्रशासन ने ढाई सौ के करीब लोगों को गिरफ्तार किया है लेकिन सवाल है कि बाकी कहां गए। क्या वे दोबारा संगठित नहीं हो जाएंगे और तीन हजार लोग 240 एकड़ जमीन के चारों ओर बाउन्ड्री बनाकर दो साल तक कैम्प चलाते रहे वह भी स्थानीय प्रशासन की नाक के नीचे और उसे पता तक नहीं चला। यदि यह सच है कि स्थानीय प्रशासन से कोई चूक नहीं हुई तो क्या इस बात में सच्चाई है कि खुफिया विभाग की जानकारियों की लगातार अनदेखी की गई।   

यदि स्थानीय प्रशासन को पूरी जानकारी थी तो क्या प्रशासन ने पुलिस को हाराकीरी करने के लिए भेजा था। कितना दुखद है कि एक निहत्थे एसपी मुकुल द्विवेदी को पीट-पीट कर मार डाला गया और उन्हें बचाने की कोशिश में दरोगा सन्तोष यादव को भी अपनी जान गंवानी पड़ी। यदि स्थानीय खुफिया तंत्र मुस्तैद था तो उसे पता रहा होगा कि रामवृक्ष और उसके साथियों के पास असलहों का जखीरा है, उसमें से महिलाएं भी अचूक निशाना लगाती हैं, स्थानीय प्रशासन को यह भी पता होगा कि इनका इतिहास क्या है। जब इन लोगों ने दो दिन विश्राम करने की अनुमति ली थी तो दो साल तक सरकारी तंत्र को जवाहर बाग की याद नहीं आई और माननीय उच्च न्यायालय को जगह खाली कराने के लिए आदेश पारित करना पड़ा। 

सबसे दर्दनाक है द्विवेदी के साथ चल रहे सिपाहियों का अपने अधिकारी को अकेला छोड़कर भाग जाना। ऐसी घटनाएं कश्मीर में भी हुई हैं। या तो सिपाहियों के प्रशिक्षण में खामी है या फिर उनके पास अपनी रक्षा करने भर के भी हथियार नहीं थे। जो भी हो, इससे यह तो स्पष्ट होता है कि अपने प्रदेश की कानून व्यवस्था के लचर होने का कारण क्या है। एक आदमी अपनी फौज के साथ स्वयंभू साम्राज्य की स्थापना करने की बातें करता रहा और शस्त्रों का खुला प्रदर्शन करता रहा तो भी इसे देश के खिलाफ सशस्त्र बगावत नहीं माना गया। स्वयंभू साम्राज्य का मतलब तो प्रशासन जानता होगा।

टीवी पर दिखाया जा रहा है वहां सैकड़ों की संख्या में गैस सिलेंडर मौजूद थे ये बिना कनेक्शन नहीं मिले होंगे। तमाम वाहनों का रजिस्ट्रेशन भी बिना अभिलेखों के नहीं हुआ होगा। अब सोचिए यदि इतनी बड़ी संख्या में आतंकवादी इस प्रकार प्रशासन की नाक के नीचे प्रशिक्षण कैम्प दो साल चलाने का मौका पा जाएं तो क्या नहीं कर सकते, इसका अन्दाजा लगाया जा सकता है।

रामवृक्ष यादव अपने को नेताजी का अनुयायी कहता था। पता नहीं वह नेताजी के बारे में कितना जानता था जो कहता था भारतीय सिक्का बन्द होना चाहिए, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का चुनाव रद होना चाहिए वगैरह। ये नेताजी को बदनाम करने के अलावा कुछ नहीं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उसने 2012 में मौजूदा सरकार बनने के बाद ही अपने को आगरा, बरेली और मथुरा में स्थापित किया था और आरोप लग रहे हैं कि सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री का उसे संरक्षण प्राप्त था। ऐसे सन्देह से बाहर निकलने के लिए सीबीआई जांच से डरना नहीं चाहिए। आशा है मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी छवि धूमिल नहीं देंगे।    

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