काॅपियां सादी पर पास करना जरूरी

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लखनऊ। परिषदीय स्कूलों में कॉपियों का मूल्यांकन शुरू हो चुका है। 30 मार्च को प्रदेश के सभी स्कूलों में उत्सव दिवस मनाया जाएगा जिसमें बच्चों को रिजल्ट भी दिया जाएगा।

सरकारी स्कूलों में इस बार बोर्ड की तर्ज पर परीक्षाएं कराई गई थीं, जिसमें स्कूलों में कॉपियां और प्रश्नपत्र की व्यवस्था भी की गई थी। परीक्षाएं 21 मार्च को समाप्त हुई हैं और अब मूल्यांकन प्रक्रिया चल रही है। राइट टू एजुकेशन के तहत हर बच्चे को पास करना शिक्षकों के लिए मुसीबत बन रहा है। सादी कॉपियों पर भी उन्हें बच्चों को पास करना पड़ रहा है।

लखनऊ जिला मुख्यालय से लगभग 25 किमी दूर प्राथमिक विद्यालय बंधौरी की अध्यापिका कंचन मिश्रा बताती हैं, “सरकार का आदेश है कि हर बच्चे को पास करो। कॉपियों में कुछ बच्चों ने तो लिखा ही नहीं है कुछ भी, ऐसे में हम टीचर बड़ी दुविधा में फंस जाते हैं कि क्या करें। पास करना हमारी मजबूरी है लेकिन ये नियम बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।”

परिषदीय स्कूलों में लगातार शिक्षा का स्तर गिर रहा है, जिसके चलते अभिवावकों का रुझान निजी स्कूलों की तरफ बढ़ रहा है। भोजन, ड्रेस और किताबें मुफ्त मिलने के बाद भी अभिवावक केवल मजबूरी के कारण ही बच्चे को सरकारी स्कूल भेज रहे हैं। लखनऊ से लगभग 20 किमी दूर बेहटा गाँव की रहने वाले अजय कुमार (40 वर्ष) के तीन बच्चे हैं जो सरकारी में जाते हैं। अजय कहते हैं, “स्कूलों में पढ़ाई के नाम पर कुछ नहीं है मेरा एक बेटा कक्षा पांच में पहुंच गया है, लेकिन उसे हिंदी के आसान शब्द इमला बोल दो तो नहीं लिख सकता। मजबूरी है पैसे नहीं है तो सरकारी में पढ़ा रहे हैं।”

स्कूलों में बच्चे लगातार पास होकर दूसरी कक्षा में पहुंच रहे हैं लेकिन उन्हें जानकारी के नाम पर कुछ नहीं पता। लखनऊ के मोहनलालगंज ब्लॉक के प्राथमिक विद्यालय बसारा के अध्यापक राजेश चन्द्र बताते हैं, “कहा जाता है टीचर पढ़ाते नहीं, हम करें क्या जब बच्चों को फेल होने का डर ही नहीं तो पढ़ेंगे क्या। सादी कॉपियों पर भी पास होने भर का नम्बर देना हमारी मजबूरी है।”

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