कैसे सुधरेंगी भारतीय रेलें, जब समय पर चलेंगी नहीं

कैसे सुधरेंगी भारतीय रेलें, जब समय पर चलेंगी नहींgaonconnection, कैसे सुधरेंगी भारतीय रेलें, जब समय पर चलेंगी नहीं

अंग्रेजों ने अपने स्वार्थ के लिए ही सही दो काम किए थे, एक तो आईसीएस (अब आईएएस) अफसरों का प्रशासनिक ढांचा और दूसरे रेल व्यवस्था। अब दोनों ही जर्जर हो चले हैं। प्रधानमंत्री को पता होगा कि रेलवे को सुधारने का एक ही रास्ता है इसे प्राइवेट कम्पनियों के हाथों में दे देना। जिन देशों में रेलों का सफल संचालन है वहां यह प्राइवेट हाथों में हैं, वहां प्रतिस्पर्धा रहती है और निरन्तर सुधार होता रहता है। हमारे देश में रेलवे कर्मचारी और अधिकारी ऐसा होने नहीं देंगे क्योंकि प्राइवेटाइज़ेशन के बाद इनकी छंटनी हो जाएगी, कोई भी कम्पनी अक्षम लोगों को नौकरी नहीं देगी।

हमारी सरकार के सामने प्राथमिकता स्पष्ट नहीं है कि रेलवे जन-कल्याण के लिए है अथवा लाभ कमाने के लिए या फिर फ़र्ज अदायगी के लिए। आमतौर से हमारी रेलवे घाटे में चलती है और किराया बढ़ता रहता जब प्रत्येक रेलगाड़ी में गरीबों के लिए होते हैं बस एक या दो डब्बे और उनकी आबादी है 80 प्रतिशत है तो रेलें चलाने में जन कल्याण की भावना तो नहीं है। यदि सब को रेल सुविधा देनी है तो अपनाना होगा मधु दंडवते का रेल मॅाडल, जिसमें सभी नई रेलें केवल जनता गाड़ियां चलाई गई थीं। वर्तमान में न तो देश की तिजोरी भर रहीं है और न गाँव के गरीब को सुकून से यात्रा का अवसर ही मिल रहा है। 

समय पर चलने वाली तेज रफ्तार रेलगाडि़यों को टीवी पर देखकर तसल्ली कर सकते हैं या फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की स्पीड वाली बुलेट ट्रेन की बातें सुनकर। मोदी की बातें तो वैसी ही लगती हैं जैसे गाँव की माताएं अपने बच्चों को लुभाती हैं ‘चन्दा मामा दूर के, लड्डू मोती चूर के’। हमारे देश में नाकारा रेलवे प्रशासन ना तो काम करेगा और ना ही प्राइवेटाइजेशन होने देगा। कम से कम नए मार्गों पर तो प्राइवेट रेलें चलाने का काम आरम्भ हो।

हम गाड़ी में अपनी बर्थ या सीट आरक्षित कराते हैं कि शान्ति से यात्रा कर सकेंगे लेकिन सभी डिब्बों के अन्दर चाय बेचने वालों से लेकर चना पकौड़ी, कोल्ड ड्रिंक, पानी की बोतल, चिप्स आदि कितनी चीजें बेचने वाले चीखते रहते हैं। इन खान-पान की चीजों की जांच होती होगी ऐसा तो नहीं लगता। नाम की एक्सप्रेस गाड़ियां भी हर छोटे-छोटे स्टेशनों पर रुकती चलती हैं। आरक्षित कोच में झुंड के झुंड चढ़ जाते हैं। टिकट जांचने वाला कोई आता नहीं। इससे तो नहीं लगता रेलें सुधरेंगी। 

रेलवे सुधार की शुरुआत मौजूदा रेलगाडि़यों को समय पर चलाने और उनकी गति बढ़ाने से होगी। जर्जर पटरियों पर गति बढ़ाना सुरक्षित रहेगा इसमें सन्देह है। कम से कम इतना तो किया ही जा सकता है कि जिन क्षेत्रों में रेलवे लाइन है ही नहीं वहां रेलवे के विस्तार और संचालन का काम प्राइवेट हाथों में दे दिया जाए। रेलवे तंत्र को अपने नाकारापन का एहसास हो जाएगा। जो रेलवे सेक्टर घाटे में चल रहे हों उन्हें प्राइवेट हाथों में दे दिया जाए। 

रेलगाडि़यों की समस्या किराया नहीं है, वह तो यात्री दे ही देगा जब उसे यात्रा करनी ही है। समस्या है समय पर सुरक्षित पहुंच जाना। हम आपातकाल की खूब आलोचना करते हैं अनेक कारणों से लेकिन अगर रेलगाड़ियां कभी समय से चली हैं तो आपात काल में। यदि लोकतंत्र की कीमत पर सुधार हुआ तो दुर्भाग्य होगा।

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