कौन हैं बेबाक लड़कियां

कौन हैं बेबाक लड़कियांगाँव कनेक्शन

मैं जहां से आती हूं वहां आमतौर पर महिलाओं की बहुत इज्ज़त है। दूर से देखने पर उनका दर्जा भी बराबरी का नज़र आता है। बस कुछ अनकहे नियम हैं, जिनका पालन औरतें बहुत जतन से करती हैं। सिर से पल्ला नहीं गिरने देना, पति की बात का उल्टा जवाब ना देना, घर के पुरुष सदस्यों से पहले किसी हाल में ना खाना। औरतों को इन जैसे सैकड़ों नियमों से कोई आपत्ति नहीं इसलिए घर में अक्सर शांति बनी रहती है। 

ये बहुत साल पहले की बात है, मैं शायद सात या आठ साल की रही होंगी। दादाजी का श्राद्ध था, इसलिए पूरा परिवार एकत्र हुआ था। जैसा कि ऐसे मौकों पर होता है खीर, रायता या चटनी जैसी चीज़ें कम पड़ ही जाती हैं। मुझे और दीदी को तो अक्सर बची-खुची खीर मिल जाती थी पर मम्मी, ताईजी वगैरह के हिस्से में सिर्फ खुरचन ही आती थी। उस दिन दादी ने मेरे चचेरे भाई की प्लेट की ओर इशारा करते हुए मम्मी से बची हुई खीर खा लेने को कहा। मैं बची हुई क्यों खाऊं, इतने लोगों के लिए बनाया है तो अपने लिए दुबारा भी बना सकती हूं। मम्मी ने कहा, तो सबने उन्हें ऐसे देखा जैसे कोई अनहोनी बात कह दी हो। कमरे में मौजूद दादी, ताईजी, बुआ सबके लिए अपने पति और बच्चों की थाली में बचा हुआ खाना खत्म करना आम बात थी। त्याग करो, सिर्फ दूसरों के बारे में सोचो, अपनी इच्छाएं अपने दिल में रखो, सदियों से यही तो सीखा था उन्होंने, इसलिए मम्मी की बात सबके कानों को खटकी थी। पड़ोस की एक ताईजी ने तो उन्हें एक ताना भी मार दिया था, पर मैं उस पल शायद पहली बार समझी थी कि बेबाकी क्या होती है।

बेबाकी बड़े-बड़े फ़ैसले करने से नहीं आती, बड़ी क्रांतियों से नहीं आती, इसके लिए कोई जुलूस नहीं निकालने होते। हर वो लड़की बेबाक है जो दूसरों के साथ थोड़ा सा अपने लिए भी जीना जानती है, अपने फर्ज़ के साथ अपनी ख्वाहिशों की भी परवाह करना जानती है, सवाल करना जानती है, जवाब पाने की उम्मीद रखती है। औरतों को आगे बढ़ने के लिए किसी आरक्षण की बैसाखी चाहिए ना किसी की दया की उन्हें ज़रा सी बेबाकी चाहिए, जो उन्हें अपनी इज्ज़त करना, अपनी कदर करना सिखा सके।

(पेशे से स्वतंत्र पत्रकार व लेखिका हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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