कभी दाने-दाने को मोहताज ऊषा बंसल के आचार के कारोबार की पहुंच अब विदेशों तक

कभी दाने-दाने को मोहताज ऊषा बंसल के आचार के कारोबार की पहुंच अब विदेशों तकgaonconnection

लखनऊ। ऊषा बंसल आज जिस तरह आत्मविश्वास से लबरेज हैं वे आज से ग्यारह साल पहले दाने-दाने को मोहताज थीं। पति का टिम्बर का बिजनेस लगातार घाटे में होने के कारण घर का सारा सामान बिक गया। बच्चे जो महंगे स्कूल में पढ़ते थे उनकी पढ़ाई रुक गई थी। किसी तरह मेहनत मजदूरी कर वे अपना गुजारा करने को मजबूर थे। उषा को यह सब स्थितियां अंदर तक हिला रही थीं।

उनके बेटे के एक मित्र ने उनका बनाया अचार चखा और तारीफ के पुल बांधते हुए बोला आंटी आप अचार का बिजनेस क्यों नहीं करतीं। बात आई गई हो गई। लेकिन जब उषा ने अपने बल पर परिवार को खड़ा करने की ठानी तो उन्हें बेटे के दोस्त की बात याद आई और इस तरह महाराजा अचार का बिजनेस शुरू हुआ जिसकी आज देश में ही नहीं बल्कि कनाडा, यूएस और चीन तक महाराजा अचार की मांग है।  

मुश्किलें किसके सामने नहीं आतीं। लेकिन कुछ लोग मुश्किलों के आगे टूट जाते हैं और कुछ लोग दुश्वारियों की भट्टी में तप कर कुंदन बन जाते हैं। 

मेरठ की उषा बंसल भी कुछ ऐसी मिट्टी की बनीं हुई हैं जो बुरे समय के थपेड़ों को चीर कर अपनी राह बना लें। उषा उस समय को सोचकर आज भी सिहर उठती हैं जब उनके पति जितेन्द्र बंसल के टिम्बर के बिजनेस में लगातार घाटा हो रहा था और नौबत यहां तक आ गई कि उन्हें अपना बिजनेस बंद करना पड़ा। घर का काफी सामान तो पहले ही बिक चुका था अब फांके की नौबत आ गई थी। फिर एक दिन आशा की एक किरण नजर आई और देखते-देखते उनकी दुनिया ही बदल गई।

उषा कोई बड़ा कदम उठाने से पहले वे अपने आत्मविश्वास की परखना चाहती थीं। पहले उन्होंने अपने पास रखे साठ रुपए से अपना बिजनेस रूह आफजा जैसी गुलाब शर्बत नाम से दो बोतल पेय तैयार किया और किस्मत से जल्द ही एक सौ बीस में बिक गया। 

उषा बताती हैं, “मैंने और मेरे पति ने दिन रात मेहनत की। बच्चों ने झोले में रखकर घर-घर तक अचार पहुंचाया। हमने पैसा बचाने के लिए पांच साल तक किसी लेबर को नहीं रखा। हमने तय कर रखा था कि हम अचार की क्वालिटी से कभी भी समझौता नहीं करेंगे। हम स्वयं सारा सामान नम्बर वन क्वालिटी का खरीदते हैं। यही वजह है कि हमारा बनाया अचार बाजार में उपलब्ध अचारों से महंगा है।”

आज ये अचार उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली तक जा रहा है। यही नहीं देश की सीमाएं लांघकर कनाडा, चीन और यूएस तक पहुंच रहा है। आज उषा के साथ बीस-पच्चीस महिलाएं भी रोजगार पा रही हैं। 

उषा के पति जितेन्द्र बंसल बताते हैं, “वह वक्त काफी कठिन था। बिजनेस में हम कंगाल हो चुके थे। खादी ग्रामोद्योग से हमें साढ़े तीन लाख का वर्किंग कैपिटल मिला जिससे हम अपना काम कर सके। आज हमने सभी तरह का कर्ज उतार दिया है।”

उषा जल्द ही आंवले का शुद्ध रस बोतलों में बंद कर बेचने की तैयारी कर रही हैं। उनका कहना है कि जैसे-जैसे ग्राहकों की डिमांड आएगी वे उन्हें जरूर बनाकर देंगी।

रिपोर्टर- प्रेमेन्द्र श्रीवास्तव

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