नई खेती की दौड़ में खो गईं मंडुआ, टागुन और सांवा जैसी फसलें

Ashwani NigamAshwani Nigam   4 Oct 2016 6:05 PM GMT

नई खेती की दौड़ में खो गईं मंडुआ, टागुन और सांवा जैसी फसलेंये देशी प्रजातियां अब खेतों से गायब हो चुकी हैं। फोटो- विनय गुप्ता

लखनऊ। दो दशक पहले तक खरीफ के समय खेतों में मंडुआ, टागुन और सांवा की फसल खेत में लहलहाती थी। ये प्रजातियां अब खेतों से गायब हो चुकी हैं। नई पीढ़ी के किसानों को तो इनके बारे में पता भी नहीं हैं। गाँव के रहने वाले बुजुर्ग और पुराने किसान ही इन फसलों के बारें में जानकारी दे पाते हैं।

यह हाल तब है जब देशभर में अपनी देशी प्रजाति की फसलों को बचाने और उनको संरक्षित करने और उनको बढ़ाने के लिए भारत सरकार का कृषि मंत्रालय कोशिश कर रहा है। उत्तर प्रदेश में नब्बे के दशक तक पूर्वांचल, बुंदेलखंड से लेकर पश्चिम तक इन फसलों की खेती होती थी। लेकिन आज स्थिति यह है कि इन फसलों की बात तो दूर इनके बीज तक किसानों के पास उपलब्ध नहीं हैं।

पहले हम भी अपने खेतों में मंडुआ, टागुन और सांवा की खेती करते थे। कम मेहनत और कम खर्च में इसकी अच्छी फसल हो जाती थी। लेकिन बदलते समय के अनुसार धीरे-धीरे इसकी खेती बंद हो गई। इन देशी प्रजातियों की जगह धान की नई-नई प्रजातियों और हाईब्रीड ने ले लिया है, जिसके कारण यह फसलें समाप्त हो चुकी हैं।
रामदेव, किसान (70 वर्ष) गाँव- दुघारा, चिनहट

पूरे देश में देशी प्रजाति की फसलों को बचाने के अभियान में शामिल इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर के कृषि वैज्ञानिक डा. गजेन्द्र सिंह तोमर का कहना है कि देसी प्रजाति की फसलों को एक साजिश के तहत समाप्त किया जा रहा है। सरकार भी इसके लिए कोई ध्यान नहीं दे रही है जिसके नतीजे में मंड़ुआ, टागनु और सांवा जैसी खरीफ की फसलें देश के कई राज्यां में विलुप्त होकर इतिहास बन गई हैं।

दक्षिण भारत में होती है इसकी खेती

मंडुआ, सांवा और टागुन की खेती एक तरफ जहां यूपी जैसे राज्य से गायब हो रही है वहीं दक्षिण भारत के राज्यों में अब भी इसकी खेती को किया जा रहा है। नई पीढ़ी के लिए यह बताना जरुरी है कि, मंडुआ टागुन और सांवा के दानें सरसों के आकार के होते थे, जिन्हें ओखली और ढेका से कूट कर चावल निकाला जाता था। ये अनाज गरीबों के लिए वरदान थे। बड़े किसान कुटाई की जहमत से बचने के लिए इसे अधिया पर कूटने के लिए गरीबों को देते थे, जिसके कारण भरपूर चावल उन्हें मिल जाता था। टांगुन फसल तो खेत में देखते बनती थी। इसकी बालियां जब खेत में लटकती थी, तो यह शोभा देखने लायक होती थी। इन प्रजातियों का गुण यह भी था कि ये खराब से खराब खेत में भी अच्छी उपज दे देती थी।

बीमारियों को दूर भगाते थे ये अनाज

बदलते समय के अनुसार देशी प्रजाति खरीफ फसलों मड़ुआ, सांवा और टांगुन की जगह धान की हाइब्रिड फसलें किसान उगाने लगे हैं। जिसके नतीजे में हाइब्रिड अनाज खाने से लोगों के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ने लगा। इंडियन डायेटिक एसोसिएशन की सीनियर डायटिशियन डा विजयश्री प्रसाद का कहना है कि देशी प्रजाति की फसलों से जो अनाज होता था वह लोगों को कई बीमारियों से दूर भगाता था। नइका प्रयोग दवा और पौष्टिक तत्व के रूप में प्रयोग होता था। शरीर में कमजोरी और गांठों एवं कमर दर्द के उपचार हेतु इसे पीस कर लडडू और रोटी के रूप में लोग खाते थे। जिससे उनको राहत मिलती थी। मधुमेह के रोगियों के लिए मंड़ुआ विशेष रूप से उपयोगी है। मधुमेह पीड़ित व्यक्तियों के लिए चावल के स्थान पर मंडुआ का सेवन सही होता है।

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