कंबाइन के उपयोग से घटा भूसे का उत्पादन

दिति बाजपेईदिति बाजपेई   22 April 2017 7:41 PM GMT

कंबाइन के उपयोग से घटा भूसे का उत्पादनभूसे के एकत्र करती महिला।

लखनऊ। भूसे की कमी के लिए किसान और पशुपालक से लेकर अधिकारी तक कंबाइन को जिम्मेदार मानते हैं। उत्तर प्रदेश के कृषि क्षेत्र में मशीनीकरण तेजी से बढ़ा है। पहले सिर्फ बढ़े किसान ही गेहूं-धान कंबाइन से कटवाते थे लेकिन पिछली बार मार्च-अप्रैल में गेहूं की कटाई के समय बारिश से काफी फसल बर्बाद हो गई, इसलिए इस बार छोटे किसानों ने भी कंबाइन से खेत कटवा लिए, फसल तो सुरक्षित सबके घर पहुंच गई लेकिन भूसा सिर्फ कुछ किसान ही ले जा सके।

लखनऊ जिले में छठामील के पास लहुंगपुर गांव के हनुमान यादव (70 वर्ष) के पास पांच भैंसे और एक एकड़ खेत भी है लेकिन वो भूसा बाजार से ही खरीदते हैं।

दूध मंडी में मुलाकात के दौरान उन्होंने बताया, हम लोगों का (पशुपालकों) का सबसे ज्यादा खर्च पशुओं के रातिब (चारा-दाना) पर ही खर्च होता है, भूसा अभी 500-600 में मिल रहा है। आगे जाने क्या होगा।

भूसे को ट्राली में भरते किसान।

वहीं पास में खड़े चंदरकोटा के मुन्ना बताते हैं, खेत में गेहूं तो बोए थे लेकिन मशीन से कटवा लिए। सोचा था किसी और के यहां सस्ता मद्दा भूसा ले लेंगे लेकिन अभी मिला नहीं है। यूपी पशुधन परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. बीबीएस यादव ने बताया, मजदूरों की कमी और जल्दबाजी के चलते किसान कंबाइऩ से गेहूं-धान कटवाने लगे हैं। ज्यादातर किसान कंबाइन चलवाने के बाद डंठल जला देते हैं, जिससे चारा बिल्कुल नहीं बचता। कुछ ही किसान भूसे के लिए कंबाइन के बाद रीपर चलवाते हैं, इसलिए कंबाइन पर रोक लगा देनी चाहिए।

यह सही है कि कंबाइन से भूसा नहीं बनता लेकिन मजदूरों की समस्या और समय को देखते हुए कंबाइन किसानों के लिए उपयुक्त है। लखनऊ में कुम्हरावां कस्बे के पास सरदार फार्म के सुखदेव सिंह बताते हैं, मेरे पास खुद की कंबाइन है साथ में रीपर भी है, कंबाइन चलाने के बाद स्ट्रा रीपर से भूसा काट लेते हैं, दूसरे किसानों को भी यही करना चाहिए। मुश्किल से 2000 रुपए प्रति एकड़ की लागत आएगी लेकिन भूसा कई हजार का निकलेगा।

इस साल भूसा हो गया था काफी महंगा।

भूसा है या अफीम

भूसे की महंगाई के पीछे कारोबारी पुलिस की चुंगी को भी वजह मानते हैं। भूसा कारोबारियों का कहना है पुलिस हर चौराहे पर पैसे लेती है और 100 रुपए से कम में तो सिपाही भी नहीं मानता। बीकेटी के पास उनईदेवी गांव में रहने वाले भगवानदीन ने अपने टैक्टर लदे भूसे को दिखाते हुए कहते हैं, भूसा नहीं अफीम हो गया पुलिस सूंघती रहती है। उनईदेवी से निकलते ही पहले पहाड़पुर में 100 रुपये, फिर बक्शी का तालाब में 100 रुपये, फिर छठामील, फिर आईएम रोड यानि जहां-जहां चौराहा वहां पैसे देने ही पड़ते हैं। नहीं तो पुलिस कभी ओवरलोड या ट्रैक्टर कागज न होने पर गाड़ी खड़ी करवा लेती है।

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