कुम्हड़ा में लागत कम और मुनाफा ज़्यादा

Neetu SinghNeetu Singh   1 Oct 2016 10:59 PM GMT

कुम्हड़ा में लागत कम और मुनाफा ज़्यादाgaonconnection

लखनऊ। पेठे की मिठास की तरह ये भारी बारिश कुम्हड़ा के किसानों की जिंदगी में भी रस घोल देगी। लाभ देने वाली इस फसल से ही आगरा के विश्व प्रसिद्ध पेठे की पहचान है। इस बार अच्छी मानसूनी बारिश कुम्हड़ा (पेठा) की खेती के लिए वरदान साबित हो रही है |

एक एकड़ पेठे की फसल पर लागत चार से पांच हजार रुपए आती है। ये 20 से 40 हजार रुपए तक प्रति एकड़ बिक्री हो जाती है।मध्य यूपी के विभिन्न जिलों में पेठा बहुतायत में होता है। यहां से आगरा के मेन मार्केट में भी पेठा जाता है। उत्तरप्रदेश के कई जिलों में कुम्हड़ा या खबहा की खेती की जाती है। जिसमे मुख्य रूप से कानपुर, बरेली, झांसी, घाटमपुर में होती है।

इस फसल में किसानों को लागत कम और मुनाफा ज्यादा होता है। तीन से चार महीने में होने वाली कुम्हड़ा की फसल से बनने वाले पेठे की मिठास विदेशों तक फैली है। राजपुर ब्लॉक से से 4 किलोमीटर दूर पश्चिम दिशा में इटखुदा गाँव है। यहां के किसान संतोष कटियार (48 वर्ष) कुम्हड़ा की फसल को लेकर कहते हैं कि मई के आख़िरी सप्ताह या जून के पहले सप्ताह में जो बुवाई होती वो सितम्बर में तैयार हो जाती है। उसे अगैती फसल कहते हैं जो जुलाई के प्रथम सप्ताह में बुवाई होती है वो नवम्बर में तैयार हो जाती है।

इसे हम लोग पक्की फसल मानते हैं। वो आगे कहते हैं कि कुम्हड़ा की खेती में अगर मंडी का भाव अच्छा रहा तो किसानों के लिए ये फसल नगदी फसल मानी जाती है। कुम्हड़ा के खेत में हम दो से तीन फसलें एक साथ ले लेते हैं। पेठा बनाने में इस्तेमाल कुम्हड़ा की मांग आगरा, कानपुर और बरेली की मंडियों में बहुत ज्यादा है। यह स्वाद के साथ-साथ किसानों की अर्थव्यवस्था में भी मिठास घोल रहा है। किसानों का ये भी मानना है कि कुम्हड़ा के फल के सेवन से पेट की बहुत सारी बीमारियां समाप्त हो जाती हैं। इसकी तासीर बहुत ठंडी होती है।

इटखुदा गाँव के ही निवासी शिवनारायण (54 वर्ष) कहते हैं कि कुम्हड़ा की खेती हमारे पूर्वजों के समय से होती आ रही है। पहले खेतों में गोबर की पांस ज्यादा पड़ती थी तो खेत में उपजाऊपन ज्यादा था। अब मिट्टी की ताकत खत्म हो गयी है। फिर भी कुम्हड़ा हमारी परम्परा में शामिल है। जब कभी आगरा बेचने जाते हैं तो खूब सारा पेठा खरीद कर लाते हैं। घर के बच्चे महीनों पेठा खाया करते हैं। “राजपुर ब्लॉक में हमारी पेठा की भट्टी है। हम किसानों का कुम्हड़ा सीधे आगरा के भाव पर खरीद लेते हैं।

जो छोटी जोत के किसान है वो आसानी से हमारे पास बेच देते हैं। अगर उनकी फसल खेत में भी पड़ी है और किसानों को पैसों की जरूरत है। वो हमसे एडवांस में भी पैसा ले लेते हैं। नजदीक भट्टी होने के कारण किसान फुटकर दुकानों की बजाय थोक में हमारे यहां से पेठा लेते हैं। कृष्ण कुमार, राजपुर ब्लॉक, पेठा भट्टी मालिक। कुम्हड़ा का धंधा जुआ के समान होता है। अगर मंडी में भाव अच्छा है तो बहुत मुनाफा होता है। हजारों टन हर साल कुम्हड़ा खरीदते हैं। कई बार हम खरीदते तो बहुत महंगा है लेकिन मंडी पहुंचते-पहुंचते उसका भाव कम हो जाता है। मंडी का भाव बढने के चक्कर कई बार आगरा में हफ़्तों रुकना पड़ता है। कई सालों से पेठा का बिजनेस कर रहे हैं। कम पैसों के साथ ही इस बिजनेस की शुरुवात की थी। कुम्हड़ा का बिजनेस और खेती एक साथ हो जाती हैं। राजू कटियार,इटखुदा ,कुम्हड़ा के व्यापारी।

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