यूपी में शुरू हुई अजवाइन की खेती 

यूपी में शुरू हुई अजवाइन की खेती अजवाइन की खेती

लखनऊ। उत्तर प्रदेश अब देश के उन राज्यों में शुमार होने जा रहा है जहां अजवाइन की खेती शुरू हो गई है। प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के हमीरपुर और बांदा वह जिले हैं जहां पर पिछले कुछ साल से प्रयोग के तौर पर किसानों ने इसकी खेती शुरू की और वह बहुत ही सफल रही। ऐसे में इस साल भी यहां पर अजवाइन की खेती करके किसान समृद्ध बने इसके लिए कृषि वैज्ञानिक किसानों को इसकी खेती करने की सलाह दे रहे हैं। यह फसल अक्टूबर से लेकर मध्य नवंबर तक बोई जाती है और मई के महीने में फसल तैयार होकर काटी जाती है।

जो किसान इस बार अजवाइन की खेती करना चाहते हैं उनको यूपी सरकार का कृषि विभाग मदद भी कर रहा है। उत्तर प्रदेश देश का ऐसा राज्य है जहां पर मसालों की खेती कम होती है इसलिए मसालों को लिए यूपी को देश के दूसरे राज्यों खासकर दक्षिण भारत के राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता है। यूपी सरकार प्रदेश में मसालों की खेती को बढ़ावा देने के लिए काम कर रही है। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. एसपी सोनकर अपने स्तर से अजवाइन की खेतों को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहे हैं।

हमीरपुर के किसान ने यूपी में शुरू की थी अजवाइन की खेती

बुंदलेखंड के हमीरपुर जिले के शंकरपुर गाँव के बलिराम निषाद ने चार साल पहले 2012 में अपने खेतों में पहली बार अजवाइन की खेती की थी। उन्होंने उस समय बारह बीघा में अजवाइन की खेती की थी। उस समय कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. एसपी सोनकर ने बलिराम बलिराम के खेत का जायजा लिया था और अजवाइन की खेती देखकर बेहद खुश हुए थे। बलिराम ने अजवाइन की खेती का पहला प्रयोग किया था। परंपरागत खेती से हटकर औषधीय या सब्जी की खेती करने के शौक ने बलिराम को उस समय प्रसिद्ध कर दिया था।

पेट की तकलीफों में फायदेमंद अजवाइन

कृषि मामलों के जानकार डॉ. तख्त सिंह पुरोहित का कहना है कि तमाम बीजीय मसालों में अजवायन की खास जगह है। इसका इस्तेमाल सब्जियों और अचारों में मसाले के रूप में किया जाता है। इसके बीज पेट की तकलीफों में दवा का काम करते हैं। अजवाइन में प्रोटीन, वसा, रेशा, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, फास्फोरस व लोहा जैसे गुणकारी तत्व पाए जाते हैं। इसकी खास महक इसमें मौजूद तेल के कारण होती है। अजवाइन के बीजों में दो से चार फीसदी तक थाईमोलयुक्त तेल पाया जाता है, जिसे बहुत सी आयुर्वेदिक औषधियों व कई उद्योगों में इस्तेमाल किया जाता है।

सिंचाई

अजवाइन की फसल में करीब चार-पांच सिंचाइयों की जरूरत पड़ती है। एक हल्की सिंचाई बुवाई के फौरन बाद कर सकते हैं। मौसम व मिट्टी की किस्म के आधार पर 15-25 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की जा सकती है।

बुवाई की विधि

अजवाइन की बुवाई छिटककर या कतारों में की जाती है। कतारों में बुवाई 45 सेंटीमीटर की दूरी पर की जाती है। पौधे से पौधे की दूरी 15 से 20 सेंटीमीटर होनी चाहिए। छिटकवां विधि में बीजों को समतल क्यारियों में समान रूप से बिखेर कर हाथ से मिट्टी में मिला देना चाहिए।

कैसे करें खेत की तैयारी

अजवाइन के लिए खेतों की तैयारी के लिए कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. एसपी सोनकर ने बताया कि जो किसान इसके खेती करना चाहते हैं वह अभी से इसकी तैयारी शुरू कर दें। इसके लिए सबसे पहले खेत को तैयार करें। इसको लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के बाद दो-तीन जुताई करनी चाहिए। इसके बाद पाटा लगा कर मिट्टी को बारीक करके खेत को समतल करें। अच्छे अंकुरण के लिए खेत में पर्याप्त नमी होना जरूरी है। इसके लिए पलेवा कर के ही खेत तैयार करें।

खाद व उर्वरक

अच्छी पैदावार के लिए बुवाई के करीब तीन हफ्ते पहले खेत में 10 से 15 टन प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की सड़ी खाद या कंपोस्ट खाद डालनी चाहिए। सामान्य उर्वरता वाली जमीन के लिए 40 किलोग्राम नाइट्रोजन और 20 किलोग्राम फास्फोरस की प्रति हेक्टेयर की दर से जरूरत पड़ती है। नाइट्रोजन की आधी मात्रा व फास्फोरस की पूरी मात्रा खेत में बुवाई से पहले डालनी चाहिए। पोटाश खाद मिट्टी की जांच के मुताबिक जरूरत पड़ने पर डालनी चाहिए। नाइट्रोजन की बची मात्रा बुवाई के 30 व 60 दिनों के अंतर पर दो बार में डालनी चाहिए।

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