गेहूं बोने वाले किसानों के लिए : एमपी के इस किसान ने 7 हज़ार रुपये लगाकर एक एकड़ गेहूं से कमाए 90 हज़ार

गेहूं बोने वाले किसानों के लिए : एमपी के इस किसान ने 7 हज़ार रुपये लगाकर एक एकड़ गेहूं से कमाए 90 हज़ारबंशी गेहूं

जो किसान इस साल गेहूं बोने की तैयारी में हैं उन्हें मध्यप्रदेश के मंदसौर में रहने वाले इस युवा किसान की कहानी पढ़नी चाहिए, कैसे ईश्वर गुर्जर ने सिर्फ 7 हजार रुपए लगाकर गेहूं से 90 हजार रुपए कमाए थे...

लखनऊ। मध्यप्रदेश के 23 वर्षीय एक युवा किसान ने सेल्स ऑफिसर की नौकरी छोड़कर पिछले तीन वर्षों से सात बीघे जैविक खेती करना शुरू किया। इनके खेत में इस वर्ष एक एकड़ ‘बंशी’ गेहूं में लागत सात हजार आयी और मुनाफा 90 हजार हुआ, क्योंकि जैविक ढंग से किया गया बंशी गेहूं तीन गुना अधिक कीमत पर बिका।

मध्यप्रदेश के मंदसौर जिला मुख्यालय से 100 किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में गरोठ गांव के युवा किसान डाक्टर ईश्वर गुर्जर (23 वर्ष) गांव कनेक्शन संवाददाता को फोन पर जैविक खेती को लेकर अपना अनुभव साझा करते हुए बताते हैं, “जैविक ढंग से खेती करना किसानों के व्हाट्स एप ग्रुप से सीखा, ये ‘साकेत’ द्वारा बनाया हुआ ग्रुप हैं, इस ग्रुप में एक निश्चित समय पर कुछ प्रगतिशील किसान जैविक खेती को लेकर चर्चा करते थे, यहां से सीखने के बाद जैविक खेती करनी शुरू की, गेहूं की फसल जब जैविक ढंग से की तो फेसबुक पर शेयर किया, बंशी गेहूं की पोस्ट को देखकर कई जगह के लोगों ने मांग की।”

इस तरह तैयार की खाद

वो आगे बताते हैं, “पोषक तत्वों से भरपूर बंशी गेहूँ को जैविक ढंग से करने की वजह से खाने के लिए इसे खरीदने वालों ने 5000 कुंतल में खरीदा, अपने खेतों में हमने सिर्फ गाय के गोबर, गोमूत्र, बेसन और गुण के मिश्रण से तैयार खाद का ही प्रयोग किया।” डाक्टर ईश्वर गुर्जरमंदसौर जिले के पहले किसान नहीं हैं जो जैविक ढंग से खेती कर अपनी फसल से अच्छा मुनाफा कमा रहे हों बल्कि मंदसौर जिले के सैकड़ों किसानो का मानना है कि जैविक ढंग से की गयी किसी भी फसल को सामान्य दाम से तीन गुना ज्यादा कीमत पर बेच सकते हैं।

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5000 रुपये कुंतल में बिका गेहूं

गेहूं के सही मूल्य के लिए जहां एक ओर किसान आन्दोलन कर रहे हैं वहीं आयुर्वेदिक डॉक्टर ईश्वर गुर्जर अपने खेत के गेहूं को पांच हजार प्रति कुंतल बेच रहे हैं। मध्यप्रदेश शासन के ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी पीएस बारचे देशी बीज की महत्ता बताते हैं, “देशी बीज किसी भी फसल का हो उसे संरक्षित करने की जरूरत है, बंशी गेहूं वर्षों पुराना गेहूं है पंजाब और महाराष्ट्र की लैब में इस गेहूं का परिक्षण कराया जिसमे 18 पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं जबकि बाकी गेहूं में आठ नौ प्रतिशत ही पोषक तत्व होते हैं।”

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उन्होंने आगे बताया, “इस समय देश कुपोषण से गुजर रहा है इसलिए देशी बीजों को बचाना बहुत जरूरी है क्योंकि सबसे ज्यादा पोषक तत्व देशी बीजों में ही पाए जाते हैं, किसान अपने खेतों में देशी बीजों का प्रयोग कर जीरों बजट से खेती करें, जैविक ढंग से की गयी फसलों की मांग देश के साथ-साथ विदेशों में भी बहुत हैं और इन फसलों की कीमत भी सामान्य कीमत से ज्यादा होती है।”

इस तरह बढ़ा खेती पर विश्वास

डॉक्टर गुर्जर ने जब वर्ष 2014 में जैविक खेती की शुरुवात की तो सबसे पहले उड़द की फसल बोई। डॉक्टर गुर्जर बताते हैं, “उस वर्ष बारिश बहुत ज्यादा हुई ज्यादातर किसानो के उड़द खेत में ही खराब हो गये, मैंने देशी तरीके से उड़द की खेती की। एक एकड़ उड़द के खेत में लागत 500 रुपए आयी और 25 हजार का मुनाफा हुआ, तबसे जैविक खेती पर मेरा विश्वास बढ़ गया और मैंने जैविक खेती करना शुरू कर दिया।” डॉ. गुर्जर ने न सिर्फ जैविक खेती करना शुरू की बल्कि एक देशी गाय के वंश से 150 गायों की गौशाला भी शुरू की, जिससे देशी खाद और गोमूत्र के लिए इन्हें भटकना न पड़े।

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खेत में नहीं करते कीटनाशक का प्रयोग

ये अपने खेतों में बाजार से खरीदी गयी किसी भी खाद या कीटनाशक का प्रयोग नहीं करते। बोआई से पहले बीज शोधन जरुर करते हैं। भूमि के पोषक तत्व और उपजाऊंपन को बनाये रखने के लिए डॉक्टर गुर्जर जैविक खाद बनाने से लेकर कीटनाशक दवाइयां भी खुद ही बना लेते हैं। उनका मानना है, “अगर हमारे पास अपने देशी बीज संरक्षित हो, खुद की बनाई खाद हो तो हमारी निर्भरता बाजार से कम होगी, देशी बीज और जैविक खेती दोनों ही हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहतर हैं, हमारे भोजन में पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा मिलेगी साथ बाजार भाव भी अच्छा मिलेगा।”

ग्लूकोज की मात्रा होती है कम

महाराष्ट्र के प्रगतिशील किसान पद्मश्री सुभाष पालेकर अपने शिविरों में किसानों को देशी बीज और जीरो बजट खेती करने के लिए प्रेरित करते हैं। बंशी गेहूं के बारे में उनका कहना है कि इस गेहूं को खाने में मधुमेह के रोगियों को लाभ मिलता है, क्योंकि इसमें ग्लूकोज की मात्रा काफी कम रहती है। साथ ही यह अन्य गंभीर बीमारियों में भी गेहूं कारगर है। यह आसानी से पच जाता है।

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इस तरह बनाते हैं जैविक खाद

बीज शोधन के लिए बीजामृत (100 किलो बीज के लिए सामग्री)-

पांच किलो देशी गाय का गोबर, पांच किलो गोमूत्र, 20 लीटर पानी, 50 ग्राम चूना, 50 ग्राम मेड या बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी

सभी सामग्री को मिलाकर 24 घंटे प्लास्टिक के ड्रम में भरकर रख देते हैं। इसके बाद इस बीजामृत को 100 किलो बीज में मिलाकर फर्श पर कपड़े के ऊपर बिछाकर छांव में एक दिन के लिए सुखा देते हैं, ये बीज शोधन की प्रक्रिया है इसके बड़ा बीज की बोआई करते हैं।

पौधों का भोजन जीवामृत

10 किलो गोबर, 10 किलो गोमूत्र, दो किलो गुड़ या फलों का गूदा, दो किलो बेसन, 200 लीटर पानी, 50 ग्राम मेड या बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी।

सभी सामग्री को मिलाकर 48 घंटे सीमेंट या प्लास्टिक के ड्रम में भरकर रख देते हैं। 48 घंटे बाद फसल की सिंचाई के दौरान इसका प्रयोग करते हैं। जीवामृत बनाने के 15 दिन तक ही इसका इस्तेमाल कर सकते हैं, किसी भी फसल में 21 दिन बाद इसको पानी के साथ या छिड़काव करके प्रयोग कर सकते हैं। ये फसल में खाद का काम करता है इसका प्रयोग पूरी फसल में तीन से चे बार किया जा सकता है।

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खेत में पोषण और जीवाणु की पूर्ति के लिए घन जीवामृत---

100 किलो गाय का गोबर, एक लीटर गोमूत्र, एक किलो गुड़ या फलों का गूदा, दो किलो बेसन(किसी भी डाल का), 50 ग्राम मेड या बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी।

सभी सामग्री को एक साथ मिलाकर पालीथिन पर फैला देते हैं, 48 घंटे छायादार जगह पर रखकर जूट के बोरे से ढक देते हैं, इसके बाद 48 घंटे और रखकर इसे सुखाकर इसका भंडारण भी कर सकते हैं, ये खाद एक एकड़ के लिए पर्याप्त है। इससे खेत में पोषण और जीवाणु की पूर्ति होती है।

कीटनाशक और फसल की सुरक्षा के लिए अग्नियास्त्र (तनो के अन्दर कीट, इल्ली सफेद मच्छर, माहू)—

20 लीटर गोमूत्र, पांच किलो नीम के पत्ते, 500 ग्राम तम्बाकू पाउडर, 500 ग्राम हरी तीखी मिर्च, 500 ग्राम लहसुन की चटनी।

सभी सामग्री को मिट्टी के बर्तन में डालकर तीन चार उबाल लगाते हैं, इसके बाद इसे ठंडा होने के लिए 48 घंटे के लिए रख देते हैं। इसके बाद इसे छानकर किसी बर्तन में रख देते हैं। 16 लीटर की टंकी में 250 एमएल अग्नियास्त्र डालते हैं, एक एकड़ में जितनी पानी की टंकी का छिड़काव करेंगे हर टंकी में 250 एमएल अग्नियास्त्र डाल देंगे। इसके छिड़काव से फसल में कोई भी कीट नहीं लगेंगे। तीन महीने तक ही इसका उपयोग कर सकते हैं।

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