जीएम सरसों पर फिर मची रार, किसान से लेकर कृषि विशेषज्ञ तक विरोध में  

जीएम सरसों पर फिर मची रार, किसान से लेकर कृषि विशेषज्ञ तक विरोध में  जीएम सरसों 

लखनऊ। देश में जीएम सरसों का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर निकला है। भारत सरकार के वन एंव पर्यावरण मंत्रालय के अंतगर्त आने वाली जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी (जीईएसी) ने जेनेटिकली मोडिफाइड सरसों के व्यवसायिक इस्तेमाल को लेकर अपनी सिफारिश भेजी है।

माना जा रहा है कि जल्द ही पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी मिलने के बाद जीएम सरसों की देश में व्यवसायिक खेती शुरू हो जाएगी। जीएम सरसों को लेकर देश के जानेमाने कृषि एवं पर्यावरण विशेषज्ञ और किसानों ने विरोध करना शुरू कर दिया है।

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देश की जानीमानी पर्यावरणविद कार्यकर्ता वंदना शिवा ने कहा, ''जीएम सरसों के मंजूरी की सिफारिश करके मंत्रालय की कमेटी ने साबित कर दिया है कि उसको देश के नागरिकों के स्वास्थ्य और पर्यावरण से कोई मतलब नहीं है। भारत सरकार को चाहिए कि वह सिर्फ जीएम सरसों किसी भी कीमत पर मंजूरी न दें।'' जीएम सरसों का विरोध बीजेपी के पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के फ्रंटल संगठन स्वदेशी जागरण मंच ने भी किया है। इस संगठन की प्रीति सिन्हा का कहना है कि जीएम सरसों का हम लोग विरोध करते हैं, क्योंकि हमारी परंपरागत कृषि व्यवस्था को तहस-नहस कर देगा।

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भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता और कृषि मामलों के जानकर धर्मेन्द्र मल्लिक ने बताया, ''जीएम फसलें देश के किसानों और कृषि को बर्बाद कर देंगी, इसलिए हम जीएम सरसों समेत सभी प्रकार की जीएम फसलों का विरोध करते हैं।'' उन्होंने बीटी काटन का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे बीटी काटन के व्यवसायिक खेती के मंजूरी देने के बाद देश के कपास उत्पादक किसान कर्ज में डूब गए और आत्महत्या करने पर मजबूर हुए। जीएम फसलों का देश में पिछले कई दशक से विरोध हो रहा है। देश में अभी तक केवल जीएम फसलों के रूप में बीटी काटन की ही व्यवसायिक खेती हो रही है।

भारत में साल 2003 में बीटी काटन की व्यवसायिक खेती को मंजूरी मिली मिली थी। बीटी काटन से देश के कपास उत्पादक किसानों पर क्या प्रभाव पड़ा इसको लेकर संसद की कृषि मामालें की स्थायी समिति ने संसद में 37वीं रिपोर्ट में काफी कुछ कहा था। ''कल्टीवेशन आफ जेनेटिक माडीफाइड फूड क्राप- प्रास्पेक्ट्स एंड इफेक्ट्स '' नामक इस रिपोर्ट में बताया गया है कि बीटी काटन की व्यवसायिक खेती करने कपास उत्पादक किसानों की माली हालत सुधरने की बजाया बिगड़ गई। बीटी काटन की खेती में किसानों को अधिक लागत लगानी पड़ी। बीटी काटन में कीटनाशकों को अधिक प्रयोग करना पड़ा। इसके साथ ही बीज के लिए किसान बीज कंपनियों पर निर्भर हो गए और कर्ज में डूब गए।

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मजदूर किसान शक्ति संगठन के निखिल डे कहना है कि जीएम फसलों को अपनाना मतलब प्रकृति को बदलना है। यह देश की खेती-किसानी को बर्बाद कर देगा। जीएम फसलों से खेत की उर्वरा शक्ति भी बर्बाद होगी। उन्होंने बताया कि जीमए सरसों में हर्बीसाइड टालरेंस होने से खेत की उर्वरता प्रभावित होती है। जीमए फसलों को लेकर दावा किया जाता है कि इनमें बीमारियों नहीं लगेंगे लेकिन बीटी काटन का अनुभव बताता है कि जीएम में तरह-तरह की बीमारियां लगती हैं और उनको दूर करने के लिए अधिक कीटनाशकों का इस्तेमाल करना पड़ता है।

जीएम फसलों की खेती से मधुमक्खियों के जीवन पर खतरा उत्पन्न हो सकता है। ऐसे में इसके विरोध में मधुमक्खी पालक किसान भी हैं। महराजगंज जिल के सोनबरास गांव के मधुमक्खी पालक किसान रामनगीना तिवारी ने बताया '' भ्रारत में 60 फीसदी शहद उत्पादन सरसों के फूल पर निर्भर है। जीमए सरसों से मधुमक्खियां रस नहीं ले पाएंगी जिसका शहद उत्पादन पर असर पड़ेगा।'' भारतीय मधुमक्खी पालक संघ के अध्यक्ष देवव्रत शर्मा ने एक रिपोर्ट का हवाल देते हुए बताया कि जीएम काटन की जहां खेती हो रही हैं वहां से मधुमक्खियां समाप्त हो गई हैं। अंतराष्ट्रीय संगठन ''जीएम वाच'' ने एक शोध रिपोर्ट को प्रकाशित करते हुए बताया है कि जीएम फसलों को कीटरोधी बनाने के लिए ग्लाइफोसेट का इस्तेमाल किया जाता है, जो मधुमक्खियों के लिए घातक है।

अधिक उत्पादन के लिए जीएम सरसों की वकालत

जीएम सरसों का विरोध कर रहे लेागों कहना है कि जीएम सरसों की खेती से पर्यावरण के नुकसान के साथ ही लोगों की सेहत पर खराब असर पड़ेगा। वहीं दूसरी तरफ जीएम सरसों के पक्ष में इससे जुड़े लोगों को तर्क है कि देश में जिस तरह से खाद्यान्न तेलों की मांग बढ़ रही है उसके अनुपात में खाद्ध् तेलों का उत्पादन नहीं हो रहा है क्योंकि सरसों की पैदावार जितनी होनी चाहिए वह नहीं हो रही है। ऐसे में जीएम सरसों की खेती करके खाद्यान्न तेलों की इस बढ़ती मांग को पूरा किया जा सकता है। देश में इस समय सरसो का सालाना उत्पादन 70 लाख टन है। कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार जीएम सरसों की मंजूरी मिलने के बाद साल 2025 तक 150 लाख टन सरसों का उत्पादन हो सकता है।

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