कृषि आंकड़ों से हेरफेर करती हैं सरकारें ?

कृषि आंकड़ों से हेरफेर करती हैं सरकारें ?गेहूं की कटाई करते किसान।

नई दिल्ली। आने वाले एक दो महीने में गेहूं की कटाई शुरु हो जाएगी। मौसम की मेहरबानी से पैदावार अच्छी होने की उम्मीद है, बुआई का रकबा भी बढ़ा है। सरकार का दावा है कि लेकिन अच्छी पैदावार होगी।

पिछले वर्ष के आखिरी में महीने में केंद्र सरकार ने दावा किया कि देश में 2015 -16 के दौरान 94 मिलियन टन गेहूं की पैदावार हुई है। इसकी वजह कृषि बीमा योजना और अच्छी बुवाई भी हो सकती है, लेकिन सरकार के ये आंकड़े उनके ही मंत्रालय के आंकड़ों से मैच नहीं कर रहे थे। बंपर बुवाई के बढ़े हुए जो आंकड़े सरकार द्वारा दिखाए जा रहे हैं वो कृषि बीमा योजना की सफलता पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं।

दो साल बाद जब अच्छा मॉनसून आया तो किसानों और कृषि व्यापारियों में उम्मीद जगी कि इस बार भी अच्छी पैदावार होगी लेकिन नोटबंदी के असर ने इस उत्साह पर पानी फेर दिया। बावजूद इसके सरकार आॅल इज वेल कहकर इस नुकसान को सकारत्मक रुख देने का प्रयास कर रही है। नोटबंदी के बाद मंत्रालय हर सप्ताह प्रेस विज्ञप्ति जारी कर ये बताने का प्रयास कर रही है कि नोटबंदी का फसल पैदावार पर व्यापक असर नहीं पड़ा है। वहीं दूसरी ओर सरकार ने आयत शुल्क माफ़ करने की भी घोषणा की है और यूक्रेन, ऑस्ट्रेलिया से सस्ते आयात को प्रोत्साहन देने का भी निर्णय लिया है। गेहूं की कीमते चार महीने में 30 प्रतिशत तक बढ़ गयी हैं।

उत्पादन के आंकड़ों पर एक नजर

मौजूद समय में देश के पास 16.4 मिलियन मीट्रिक टन गेहूं का भंडारण है जो कि पिछले 8 वर्षों में सबसे कम स्तर पर है। दिसंबर 2008 में गेहूं का भंडारण 19.5 मिलियन मीट्रिक टन था। बावजूद इसके सरकार दावा कर रही है कि उसके गोदाम भरे हुए हैं। सरकार ने मॉनसून आधारित गेहूं उत्पादन के अलग-अलग आंकड़े पेश किये हैं जो आंकड़ों को संदेहास्पद बना रहे हैं। सूखा वर्ष 2014-15 में सरकार का गेहूं उत्पादन का लक्ष्य 94 मिलियन मीट्रिक टन था लेकिन सही उत्पादन 86.53 मिलियन टन हुआ जो निर्धारित लक्ष्य से 8 मिलियन मीट्रिक टन कम था। जिस कारण गेहूं उत्पादन मामले में बड़ा देश होने के बावजूद भारत को आयात का सहारा लेना पड़ा। 2015-16 भी सूखे की चपेट में रहा। इस वर्ष सरकार ने गेहूं उत्पादन का लक्ष्य 94.75 मिलियन मीट्रिक टन रखा लेकिन इस बार भी उत्पादन कम होकर 93.5 मिलियन मीट्रिक टन ही रहा। दरअसल में उत्पादन के वास्तविक आंकड़े जनवरी 2017 में थे लेकिन सरकार ने इससे पहले ही गेहूं आयात करने का फैसला ले लिया।

आंकड़ों पर क्या कहते हैं समीक्षक

बाजार समीक्षकों के अनुसार सही पैदावार 80 से 85 मिलियन मीट्रिक टन होगा। कृषि मामलों के विशेषज्ञ भास्कर गोस्वामी ने बताया “पिछले साल लगभग 3 मिलियन हेक्टेयर कम बुवाई हुई थी जिसका व्यापक असर पैदावार पर दिखा। सरकार ने तब भी पैदावार के सही आंकड़ों को मानने से इनकार किया था और इस बार भी वैसी ही स्थिति है। इस बार भी पैदावार का ज्यादा लक्ष्य निर्धारित किया गया है। ये सभी आंकड़ें सरकार के दावों पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं।” वहीं मुज़फ्फरनगर के किसान नेता धर्मेंद्र मालिक का कहना है “सरकार किसान और कारोबारी, दोनों को भटका रही है। मलिक के मुताबकि कम पैदावार होने से किसानों की ज्यादा दाम मिलेगा और वे फायदे में रहेंगे। दो साल सूखा झेलने के बाद आयात का फैसला किसानों के लिए कष्टदायक है।”

कृषि बीमा का नहीं मिल रहा लाभ

कृषि बीमा योजना (प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ) का लाभ अब भी किसानों की ठीक ढंग से नहीं मिल पा रहा। इस योजना से लोन न लेने वाले ज्यादातर किसान वंचित हैं, जबकि सरकार इसे सफल योजना करार दे रही है। आंकड़ों में ये बात सामने आ चुकी है कि इस योजना का लाभ ज्यादातर लोन लेने वाले किसानों को ही मिल पा रहा है।

साभार: डाउन टू अर्थ

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