कैंसर, पीलिया, मधुमेह और हृदय संबंधी बीमारियों की रोकथाम में कारगर धान की ‘कालाभात’ किस्म 

कैंसर, पीलिया, मधुमेह और हृदय  संबंधी बीमारियों की रोकथाम में कारगर धान की ‘कालाभात’ किस्म एक हेक्टेयर में कालाभात चावल खेती में तीन से चार कुंतल मिलती है उपज

लखनऊ। देश में किसानों का रुझान हाइब्रिड बीजों की तरफ तेज़ी से बढ़ रहा है। इसके चलते किसान फसलों की खास किस्मों को भूल रहे हैं। ऐसी ही धान की खास किस्म है काला भात, जिसकी खेती करके किसान कम उत्पादन में अच्छी कमाई कर सकते हैं।

फैजाबाद ज़िले के सोहावल ब्लॉक के बहराएं गाँव किसान राकेश (50 वर्ष) दूबे ने 4.2 हेक्टेयर खेत में धान की पुरानी किस्मों की खेती कर रहे हैं। राकेश बताते हैं, ‘’हमारे खेत में काला नमक, काला भात, जवा फूल, चिन्नावर जैसी धान की किस्मों को लगी हैं। आज कल काला नमक और काला भात चावल की मांग बहुत अधिक हो गई है। धान की इन पुरानी किस्मों में औषधीय गुण होने के कारण बड़े बाज़ारों में इन वराइटी की मांग बहुत ज़्यादा है।’’ केंद्रीय औषध अनुसंधान संस्थान, लखनऊ व्दारा भारत में प्रयोग होने वाले फसलों के बीजों में पाने जाने वाले औषधीय गुणों पर जारी की गई शोध के अनुसार धान की पुरानी किस्मों में काला भात नामक धान में औषधीय तत्वों से भूरपूर होता है। इस चावल के सेवन से बुखार व पीलिया जैसे बीमारियों का प्रभाव कम हो जाता है।

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‘’धान की इन किस्मों को लगाने से ज्यादा उत्पादन तो नहीं मिलता, लेकिन अच्छी किस्म का धान तो हो जाता है।भारत में कालाभात धान की खेती पश्चिम बंगाल, असम और उत्तराखंड में की जाती है।” राकेश आगे बताते हैं।

सिद्धार्थनगर जिले में किसानों के लिए काम करने वाली गैर सरकारी संस्था शोहरतगढ़ इनवायरमेंट सोसाइटी धान की पुरानी किस्मों को बचाने की पहल कर रही है। ये संस्था किसानों को जैविक विधि से काला भात व काला नमक जैसे औषधीय गुण वाले चावल की खेती का प्रशिक्षण देती है और इसके साथ ही उन्हें उचित बाज़ार भी उपलब्ध कराती है। सिद्धार्थनगर जिले में की गैर सरकारी संस्था शोहरतगढ़ इनवायरमेंट सोसाइटी पिछले कई वर्षों से धान की पुरानी किस्मों को बढ़ावा देने के क्षेत्र में काम कर रही है। संस्था के परियोजना अधिकारी देवेंद्र सिंह बताते हैं, ‘’पुराने किस्मों के धान जैसे कि काला नमक और कालाभात उत्पादन के मामलें में अधिक कारगर नहीं हैं, इसलिए सरकार इन धान की किस्मों को खेती के लिए कोई योजना नहीं चलाती है। इसके साथ ही अधिक गुणवत्ता के कारण ये अनाज अन्य किस्मों की तुलना में महंगे बिकते हैं। इसलिए इनका बाज़ार भी सीमित है।’’

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कृषि निदेशालय, पश्चिम बंगाल व्दारा संचालित कृषि प्रशिक्षण केंद्र के अनुसार कालाभात धान में धान की अन्य किस्मों की तुलना में आयरन और फाइबर तत्व सबसे अधिक होते हैं। अपने औषधीय गुणों के कारण कालाभात कैंसर, पीलिया, मधुमेह और हृदय संबंधी बीमारियों की रोकथाम में कारगर है।

प्राकृति में पाए जाने वाले औषधीय खाद्यों पर आधारित ज़ीरो इमीशन रिसर्च इनीशिएटिव (ZERI) प्रोग्राम में डॉ. साकेत कुश्वाहा ने 14 वर्षों तक दक्षिण अफ्रीका के ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर अध्यन किया है।बनारस हिंदू विश्व विद्यालय में कृषि विज्ञान विभाग के कृषि विशेषज्ञ डॉ. कुश्वाहा बताते हैं, ‘’कालाभात धान की खोज सबसे पहले सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट में हुई थी। इस धान में औषधीय गुण पाएं जाते हैं। काला भात धान का साइंटिफिक नाम (केआरए - 23928) है।’’ ‘’कालाभात चावल की 50 से 100 ग्राम के बीज को अगर रात में पानी में भिगो दिया जाए और अगले दिन उसे पीस कर 200 ग्राम कालाभात चावल के साथ किसी लोहे के बरतन में पकाया जाए, तो यह पीलिया का प्रभाव कम करने में सार्थक साबित होता है।’’ यह बताया डॉ. साकेत कुशवाहा ने।

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काला भात धान का साइंटिफिक नाम है (केआरए - 23928)

एक हेक्टेयर में चार कुंतल मिलती है पैदावार

एक हेक्टेयर में कालाभात चावल खेती में तीन से चार कुंतल की उपज मिलती है, वहीं साधारण किस्मों के धान एक हेक्टेयर में 15 से 16 कुंतल पैदावार देते हैं। उत्पादन में कालाभात भले ही कम हो लेकिन बाज़ार में इस धान का भाव अन्य धान की अपेक्षा कहीं अधिक है। एक किलो कालाभात चावल का दाम 300 से 500 रुपए है।

विदेशी फार्मा कंपनियों की पसंद बन रही कालाभात चावल

राकेश दूबे अपने खेत में उगाए गए कालाभात चावल को इस वर्ष कनाडा भेजने की तैयारी कर रहे हैं। कासगंज की एक फार्मास्यूटिकल कंपनी ने उन्हें कालाभात धान खरीदने का प्रस्ताव दिया है। राकेश बताते हैं,’’ पिछले वर्ष हमने कालाभात धान की टेस्टिंग लखनऊ की सरकारी प्रयोगशाला में करवाई थी, वहां पर धान का सैंपल व्यापार के लिए पास कर दिया गया था। इस बार विदेश भेजने के लिए एपीडा कालाभात धान की टेस्टिंग करवा रहा है। अगर इसमें सैंपल पास हो गया तो, हम अपना धान विदेश भी भेजेंगे।’’

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