कॉफी की घटती खेती को रोकेंगे आदिवासी किसान

कॉफी की घटती खेती को रोकेंगे आदिवासी किसानकॉफी की खेती।

लखनऊ। मौसम अनुकूल नहीं होने के कारण इस साल देश में काफी उत्पादन में आठ प्रतिशत की गिरावट के अनुदान लगाए गए हैं। काफी के मुख्य उत्पादक राज्य कनार्टक, केरल, तमिलनाडु में कॉफी की खेती भी घट रही है।

ऐसे में भारत सरकार के वाणिज्य और इंडस्ट्री मंत्रालय के अंतगर्त आने वाले कॉफी बोर्ड ने देश के पूर्वोत्तर राज्यों के आदिवासी किसानों को झूम खेती की जगह काफी की खेती करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। कॉफी की पैदावार बढ़ाने के लिए गैर कॉफी उत्पादक क्षेत्रों में कॉफी की खेती को बढ़ावा देने के लिए भी काम किया जा रहा है।

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इस बारे में जानकारी देते हुए काफी बोर्ड के चेयरमेन एमएस बोजे गौड़ा ने बताया '' पूर्वात्तर के असम, मिजोरम, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड, अरूणाचल प्रदेश और मणिपुर में अभी 6039 हेक्टेयर में काफी की खेती की जाती है लेकिन इस खेती को बढ़ावा देने के लिए काफी देने के लिए इंट्रीग्रेटेड ट्राइबल डेवलपमेंट एजेंसी के जरिए इन राज्यों के अलावा उड़ीसा अैर आंध्रप्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में भी काफी की खेती का रकबा और पैदवार बढ़ाने के लिए किसानों को प्रति हेक्टेयर की खेती पर 25 प्रतिशत की सब्सिडी दी जा रही है। ''

आंध्रपद्रेश में 58131 हेक्टेयर में काफी की खेती की जा रही है वहीं उड़ीसा में 3935 हेक्टेयर में खेती की जा रही है। काफी बोर्ड के अनुसार इस दोनों राज्यों में मौसम और भूमि की अनुकूलता को देखते हुए काफी की खेती का रकबा बढ़ाया जा सकता है।

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काफी पैदावार को बढ़ाने के लिए काफी की एक नई किस्म चंद्रगिरि को भी विकसित किय गया है। केन्द्रीय कॉफी अनुसंधान संस्थान (सीसीआरआई) ने नए किस्म की कॉफी के पौधे चंद्रगिरि के बीज से परिचित कराया है। भूरे सोने की खुशबू नाम से प्रसिद्ध यह काफी अपने रंग और स्वाद से विश्व में अपनी अलग जगह बनाई है।

चंद्रगिरि की झाड़ियां छोटी किंतु कॉफी की अन्य किस्मों कावेरी और सान रेमन की तुलना में घनी होती हैं। इसके पत्ते बड़े, मोटे और गहरे हरे रंग के होते हैं। कॉफी की यह किस्म अन्य किस्मों के मुकाबले लंबे और मोटे बीज पैदा करती है। कॉफी उत्पादकों से इस किस्म के पैदाबार के बारे में बहुत उत्साहजनक जानकारी मिली है। इसकी अनुवांशिकी एकरूपता और शुरूआती पैदावार भी अच्छी होती है। इसके अलावा अधिकतर उत्पादक चंद्रगिरि को अपने खेतों में खाली समय की भरपाई के लिए इस्तेमाल करते हैं।

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काफी के बारे में प्रचलित लोक कथा के अनुसार लगभग चार सौ साल पहले एक युवा फकीर बाबा बुदान मक्का की यात्रा पर निकले। यात्रा से थक कर चूर होने के बाद वे सड़क के किनारे एक दुकान पर नाश्ते के लिए रूके। वहां उन्हें काले रंग का मीठा तरल पदार्थ एक छोटे कप में दिया गया। उसे पीते ही युवा फकीर में गजब की ताजगी आ गयी।

उन्होंने उसे अपने देश ले जाने का निश्चय कर लिया। लेकिन उन्हें जानकारी मिली कि अरब के लोग अपने रहस्यों की कड़ाई से रक्षा करते हैं और स्थानीय कानून उसे अपने साथ ले जाने की अनुमति नहीं देंगे। बाबा ने अरब के कॉफी के पौधे के सात बीज अपने कमर में अपने चोले के नीचे छिपा लिए।

स्वदेश लौटने पर बाबा बुदान ने कर्नाटक की चंद्रगिरि पहाड़ियों में बीज को बोया। आज वे सात बीज विभिन्न किस्मों में बदल गए हैं और एक देश में विश्व की तरह-तरह की कॉफी पैदा होने लगी है।

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