‘खेतों में जुताई न करें किसान, मिलेगी अच्छी पैदावार’

‘खेतों में जुताई न करें किसान, मिलेगी अच्छी पैदावार’भारत में ज्यादातर ट्रैक्टर से होती है जुताई, जबकि छोटी जोत वाले किसान बैलों से करते हैं जुताई। फोटो-विनय गुप्ता

लखनऊ। खेती के लिहाज से मिट्टी की बहुत अहमियत होती है। लेकिन जिस तरह आजकल भारी-भरकम ट्रैक्टर से जुताई होती है, उसके दुष्परिणाम भी सामने आए हैं। जानकारों का मानना है कि लगातार जुताई से जमीन सूखने लगती है और जो पोषक तत्व फसलों के लिए जरूरी होते हैं, वे नहीं मिल पाते हैं। ऐसे में किसान अगर अपने खेतों में अच्छी फसल चाहते हैं तो अच्छा रहेगा कि वे खेतों में जुताई न करें।

किसानों को यह सलाह जबलपुर के डायरेक्टरेट ऑफ वीड रिसर्च के वैज्ञानिक देते हैं। वहीं दिल्ली और देहरादून के भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में 16 वर्ष तक काम कर चुके अजीत राम शर्मा भी यही मानते हैं कि किसानों को खेतों में जुताई नहीं करनी चाहिए।

अजीत राम शर्मा के नेतृत्व में परंपरागत खेती का यह तरीका प्रमुख कार्यक्रम बन चुका है। अजीत राम बताते हैं, "मध्य भारत में जहां काली चिकनी मिट्टी होती है, वहां खेतों में जुताई न करना अच्छी पैदावार पाने के लिए बहुत अच्छा है।" वे आगे बताते हैं, "हमने जहां भी किसानों के सामने यह साबित किया, वहां किसानों को दो गुना तक अच्छी पैदावार मिली।"

सरल भाषा में खेती के इस तरीके के पीछे धारणा यह है कि जंगल की जमीन को जोता नहीं जाता है, मगर फिर भी वहां पेड़-पौधे उगते हैं। ऐसे में परंपरागत खेती के लिए माना जाता है कि खेती के लिए जमीन को जोतने की जरुरत नहीं है।

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अजीत राम मानते हैं कि मिट्टी को बनने में सैकड़ों साल लग जाते हैं। काली चिकनी मिट्टी को जोतने से जमीन सूख कर कड़ी हो जाती है और फटने लगती है। ऐसे में मिट्टी के गुणों पर प्रभाव पड़ता है। रासायनिक और नकली कीटनाशकों के उपयोग से मिट्टी पर और भी खराब असर पड़ता है।

आदिवासी क्षेत्रों में इस विधि का होता था उपयोग

वहीं, उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले स्थित चंद्रशेखर आजाद यूनिवर्सिटी के मृदा संरक्षण और जल प्रबंधन के प्रो. आरपी सिंह बताते हैं, "आदिवासी क्षेत्रों में खेती में इस विधि का उपयोग होता आया है। आदिवासी लोगों के पास हल-बैल की उपलब्धता न होने पर वे खेत में बिना जुताई किए डिबलर या खूटी विधि के जरिए बुवाई करते रहे हैं।"

नहीं करते मिट्टी को अनावश्यक रूप से प्रभावित

प्रो. सिंह आगे बताते हैं, "इस विधि का उपयोग विदेशों में भी खेती में होता है क्योंकि वहां वर्षा आधारित खेती होती है। ऐसे में वे मिट्टी को अनावश्यक रूप से प्रभावित नहीं करते।" आगे कहते हैं, "जिस क्षेत्र में काली चिकनी मिट्टी हो, ढालू मिट्टी हो, इसके अलावा पहाड़ी क्षेत्रों के लिए खेतों में जुताई न करने की यह विधि उपयुक्त है।"

भारत में खेती के प्रकार।

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तब मिट्टी की गुणवत्ता पर बरती गई लापरवाही

भारत में हरित क्रांति के समय खाद्य सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान दिया गया, मगर मिट्टी की गुणवत्ता को लेकर लापरवाही बरती गई। मिट्टी की गुणवत्ता को नजरअंदाज करने से खेती पर असर पड़ता है। इसको देखते हुए केंद्र सरकार ने मृदा स्वास्थ्य योजना की भी शुरुआत की।

किसानों को देते हैं ये सलाह

बोरलॉग इंस्टीट्यूट ऑफ साउथ एशिया भी भारत में कुछ बदलाव के साथ परंपरागत खेती करने की सलाह देता है। इस इंस्टीट्यूट का नाम नॉरमान बोरलॉग के नाम पर है, जिन्हें हरित क्रांति का जनक कहा जाता है। इस संस्थान की लुधियाना, जबलपुर और समस्तीपुर में भी शाखाएं हैं। यह संस्थान उत्तरी-पश्चिमी भारत में बुआई से पहले लेजर लेवलिंग की सलाह देता है ताकि थोड़े से पानी से बड़े खेत का काम चल सके। वहीं, मध्य भारत में जहां जमीन की सतह लहरदार है, वहां लेजर लेविलंग की जरुरत न किए जाने की सलाह देता है।

जुताई न करें, या करें तो बहुत कम

परंपरागत खेती के तहत तीन नियम हैं, इनमें पहला है कि खेत में जुताई न करें, या करें तो बहुत कम। दूसरे नियम के तहत खरपतवार को खेत में दबाकर रखें ताकि मिट्टी की गुणवत्ता में इजाफा होते रहे। इसके साथ पिछली फसल के डंठल को खेत में ही छोड़ दें ताकि खेत में नमी बनी रहे। वहीं, तीसरा और अंतिम नियम के अनुसार, मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाने के लिए फल लगने वाले फसलों की खेती की जाए।

खेत से बैंगन तोड़ता किसान।

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