टपका-फव्वारा सिंचाई विधि, कम लागत में ज्यादा मुनाफा

टपका-फव्वारा सिंचाई विधि, कम लागत में ज्यादा मुनाफाटपका-फव्वारा सिंचाई विधि।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। अंधाधुंध जल दोहन के कारण भू-जल स्तर तेजी से कम हो रहा है, खेती के पुराने तरीकों में स्तर लगातार कम हो रहा है, ऐसे में किसान सिंचाई की नयी विधि को अपना कर कम पानी में ही बेहतर सिंचाई कर सकता है।

खेती किसानी से जुड़ी सभी बड़ी खबरों के लिए यहां क्लिक करके इंस्टॉल करें गाँव कनेक्शन एप

यही नहीं ड्रिप सिंचाई व स्प्रिंकलर विधि का इस्तेमाल कर किसान कम पानी में फसलों को अधिक पानी दे सकते हैं। उद्यान विभाग सिंचाई के इन साधनों के लिए किसानों को सब्सिडी भी देता है। सिंचाई के दौरान पानी की बर्बादी को रोकने के लिए उद्यान विभाग ने भी कवायद तेजी की है। प्रदेश में सिंचाई के लिए ड्रिप सिंचाई को बढ़ावा दिया जा रहा है। किसानों को प्रेरित किया जा रहा है कि वह ड्रिप इरीगेशन को अपना कर फसल का उत्पादन बढ़ा सकते हैं। वहीं अनुदान मिलने से भी उन्हें फायदा होगा।

बरेली जिले के पिथरी चैनपुर ब्लॉक के केशरपुर गाँव के किसान हरीश तंवर (41 वर्ष) खेती करते हैं। ड्रिप सिंचाई के बारे में हरीश बताते हैं, "पहले नालियों से सिंचाई करते थे जिसमें समय और पानी दोनो बहुत लगता था, लेकिन अब उद्यान विभाग की मदद से ड्रिप विधि से ही सिंचाई करते हैं। इससे कम पानी में ही पूरी सिंचाई हो जाती है।"उद्यान विभाग के अंतर्गत राष्ट्रीय बागवानी मिशन के निदेशक धर्मेंद्र पांडेय बताते हैं, "सिंचाई के दौरान पानी की बर्बादी रोकने के लिए बेहतर विकल्प है। फसल के उत्पादन पर भी इसका अच्छा असर होता है। किसानों को इन नयी विधियों के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, उद्यान विभाग इसके लिए सब्सिडी देता है।"

टपक (ड्रिप) सिंचाई

अगर किसान खेत में साधारण सिंचाई के बजाय ड्रिप सिंचाई विधि का प्रयोग करे तो तीन गुना ज्यादा क्षेत्र में उतने ही पानी में सिंचाई कर सकते हैं। ड्रिप सिंचाई का प्रयोग सभी फसलों की सिंचाई में करते हैं, लेकिन बागवानी में इसका प्रयोग ज्यादा अच्छे से होता है। बागवानी में जैसे केला, पपीता, नींबू जैसी फसलों में सफलतापूर्वक करते हैं। बागवानी की तरह ही ड्रिप सिंचाई विधि का प्रयोग गन्ना और सब्जियों में भी कर सकते हैं।

ड्रिप सिंचाई से लाभ

टपक सिंचाई में पेड़ पौधों को नियमित जरुरी मात्रा में पानी मिलता रहता है ड्रिप सिंचाई विधि से उत्पादकता में 20 से 30 प्रतिशत तक अधिक लाभ मिलता है। इस विधि से 60 से 70 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है। इस विधि से ऊंची-नीची जमीन पर सामान्य रुप से पानी पहुंचता है। इसमें सभी पोषक तत्व सीधे पानी से पौधों के जड़ों तक पहुंचाया जाता है तो अतिरिक्त पोषक तत्व बेकार नहीं जाता, जिससे उत्पादकता में वृद्धि होती है।

इस विधि में पानी सीधा जड़ों तक पहुंचाया जाता है और आस-पास की जमीन सूखी रहती है, जिससे खरपतवार भी नहीं पनपते हैं। ड्रिप सिंचाई में जड़ को छोड़कर सभी भाग सूखा रहता है, जिससे खरपतवार नहीं उगते हैं, निराई-गुड़ाई का खर्च भी बच जाता है।

फव्वारा (स्प्रिंकल) सिंचाई

स्प्रिंकल विधि से सिंचाई में पानी को छिड़काव के रूप में किया जाता है, जिससे पानी पौधों पर बारिश की बूंदों की तरह पड़ता है। पानी की बचत और उत्पादकता के हिसाब से स्प्रिंकल विधि ज्यादा उपयोगी मानी जाती है। ये सिंचाई तकनीक ज्यादा लाभदायक साबित हो रहा है। चना, सरसो और दलहनी फसलों के लिए ये विधि उपयोगी मानी जाती है। सिंचाई के दौरान ही पानी में दवा मिला दी जाती है, जो पौधे की जड़ में जाती है। ऐसा करने पर पानी की बर्बादी नहीं होती।

विधि से लाभ

इस विधि से पानी वर्षा की बूदों की तरह फसलों पर पड़ता है, जिससे खेत में जलभराव नहीं होता है। जिस जगह में खेत ऊंचे-नीचे होते हैं वहां पर सिंचाई कर सकते हैं। इस विधि से सिंचाई करने पर मिट्टी में नमी बनी रहती है और सभी पौधों को एक समान पानी मिलता रहता है। इसमें भी सिंचाई के साथ ही उर्वरक, कीटनाशक आदि को छिड़काव हो जाता है। पानी की कमीं वाले क्षेत्रों में विधि लाभदायक साबित हो रही है।

अनुदान देता है विभाग

टपक व फव्वारा सिंचाई के लिए लघु एवं सीमांत किसान को 90 फीसदी अनुदान सरकार की तरफ से दिया जाता है। इसमें 50 प्रतिशत केंद्रांश व 40 फीसदी राज्यांश शामिल है। दस फीसदी धनराशि किसानों को लगानी होती है। सामान्य किसानों को 75 प्रतिशत अनुदान मिलेगा। 25 प्रतिशत किसानों को अपनी पूंजी लगानी होती है।

ताजा अपडेट के लिए हमारे फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए यहां, ट्विटर हैंडल को फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें।

Share it
Top