सिंचाई के पानी की कमी झेल रहे किसान बदलें ढर्रा, उगाएं ये फसलें

सिंचाई के पानी की कमी झेल रहे किसान बदलें ढर्रा, उगाएं ये फसलेंकम बारिश और घटते भूगर्भ जल ने देश के किसानों को आगे नया संकट खड़ा कर दिया है। फोटो: अजय राजपूत

लखनऊ। यह खबर उन किसानों के लिए नज़ीर है जो सिंचाई के लिए पानी न होने के संकट से जूझ रहे हैं। पानी की कमी से खेत बंजर हो रहे हैं। धान या गेहूं की पारंपरिक खेती उनके लिए आसान नहीं रही। वे अब किसी और कम पानी की खपत वाली फसल मसलन दलहन, तिलहन, सब्जियों और मक्के को उगाने के बारे में सोच रहे हैं। तो यही वक्त है पुरानी परिपाटी को तोड़ने का।

पंजाब देश में सर्वाधिक चावल और गेहूं की पैदावार वाला राज्य है। देश की राशन दुकानों पर यही से अनाज की सर्वाधिक आपूर्ति होती है। अनुमान के मुताबिक देश में सवा दो अरब रुपए का अनाज बीपीएल परिवारों में वितरित होता है। लेकिन हाल के वर्षों में पंजाब और इसके जैसे अन्य राज्यों में गेहूं और धान की पैदावार निरंतर घट रही है। कारण, भूगर्भ जल स्रोत पर निर्भरता, जोकि लगातार घट रहा है। अकेले पंजाब के दो तिहाई खेतों की सिंचाई भूगर्भ जल से होती है। हालात यहां तक बदतर हो चुके हैं कि कई खेतों में भूगर्भ जल स्तर जमीन से सैकड़ों फुट नीचे जा चुका है।

200 फुट नीचे जा चुका है भूगर्भ जल स्तर

हालात और भयावह होते, इससे पहले कृषि विशेषज्ञों ने इस समस्या पर पड़ताल की। उन्होंने बताया कि राज्य में हरेक वर्ष 16 से 20 इंच तक भूगर्भ जलस्तर घट रहा है जो चौंकाने वाला है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राजन अग्रवाल ने बताया कि राज्य में भूगर्भ जल स्तर तेजी से घट रहा है। बारिश भी जलवायु परिवर्तन के कारण कम हो रही है। हमने कई स्थानों पर भूगर्भ जल स्तर की जांच की। कई जगहों पर तो 200 फुट जमीन के नीचे भी पानी नहीं मिला।

खेत बेचकर कराई नई बोरिंग पर पानी नहीं मिला

जालंधर से कुछ दूर एक गाँव में किसानों को खेत तक बेचने पड़ रहे हैं क्योंकि सिंचाई के लिए पानी न मिलने से वे खेती नहीं कर पा रहे। खेत बेचकर उन्होंने नई बोरिंग कराई। ये किसान करीब तीन दशक से गेहूं और धान की खेती कर रहे हैं। किसान पवनजीत सिंह ने बताया कि उसने मजबूरन खेत बेचकर नई बोरिंग कराई क्योंकि इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं था। लेकिन वहां भी पानी नहीं मिला।

प्रो. अग्रवाल के मुताबिक राज्य के 138 ब्लाकों में से 110 में भूगर्भ जल का भयंकर दोहन हुआ है। उन्होंने आगाह किया कि अगर सिंचाई का 73 फीसदी हिस्सा भूगर्भ जल पर निर्भर रहेगा तो हालात बेकाबू हो जाएंगे। केंद्रीय भूगर्भ जल बोर्ड के क्षेत्रिय निदेशक सुनील जैन ने कहा कि पंजाब में जल स्तर में गिरावट 1985 से शुरू हुई। हाल के वर्षों में इसमें तेज गिरावट दर्ज की गई है। तीस साल पहले हमें जमीन से 30 फुट नीचे पानी मिल जाता था जो 2015 में घटकर 20 मीटर तक जा पहुंचा। अब यह 30 मीटर से भी नीचे चला गया है। जैन ने कहा कि धान की खेती में अधिक पानी की खपत होती है और पंजाब में बारिश भी हाल के वर्षों में कम हुई है।

विशेषज्ञ बोले-सरकारी योजनाएं भी हैं जिम्मेदार

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के कृषि अर्थशास्त्री अमित कार ने बताया कि सिंचाई के लिए मुफ्त बिजली, पंपिंग सेट खरीदने के लिए सस्ता कर्ज जैसी सरकारी योजनाएं भी भूगर्भ जल स्तर घटाने के लिए जिम्मेदार हैं। इन योजनाओं ने एक तरह से किसानों की परेशानी बढ़ाई है। उस वक्त किसी ने इस बात पर गौर नहीं किया कि मुफ्त बिजली और पंपिंग सेट के लिए सस्ते कर्ज से फसलों की पैदावार कब तक अच्छी रहेगी। प्राकृतिक संपदाओं का दोहन हमारी खेती को प्रभावित करेगा। भूगर्भ वैज्ञानिकों ने यहां तक चेताया है कि अगर यही हाल रहा तो एक दशक में भूगर्भ जल स्तर एकदम नहीं मिलेगा।

अब सवाल यह उठता है कि किसान करे तो क्या। इसके लिए विशेषज्ञों ने सुझाया है कि किसान पानी की कम खपत वाली फसलों को उगाएं। मसलन दलहन, तिलहन, मक्का, सब्जियां और गन्ने की खेती करें। पंजाब देश में चावल और गेहूं की खेती का 81 फीसदी का योगदान करता है।

यूपी के कई जिले भी हैं प्रभावित

पश्चिम यूपी के शाहजहांपुर, मैनपुरी में भी किसानों के सामने सिंचाई के लिए पानी लाना टेढ़ी खीर है। पंपिंग सेट तो हैं लेकिन पानी कहां से लाएं। विशेषज्ञ बताते हैं कि धान में मक्का, दलहन या तिलहन के मुकाबले चार गुना पानी की खपत होती है। इसलिए बेहतर है कि इसका विकल्प सोचा जाए। यही नहीं सरकार को भी इस दिशा में सार्थक प्रयास करना होगा कि किसान को मक्का, दलहन या तिलहन का उचित दाम मिले। इस दिशा में सरकारी नीति बनानी होगी ताकि किसान बिना किसी भय के पारंपरिक खेती का विकल्प तलाश सकें। पंजाब के विशेषज्ञों ने हालांकि केंद्र सरकार के पास प्रस्ताव किया है कि वह इस दिशा में नीति बनाए।

तेलंगाना ने निकाला उपाय: जहां पानी मिलेगा, वहीं होगी धान की खेती

राज्य सरकार गाँवों में अनूठी योजना शुरू करने जा रही है। वह यह कि अब राज्य के किसान अनाज, सब्जी, दलहन-तिलहन की खेती उसी अनुपात में करेंगे जिस अनुपात में उसकी मांग होगी। इस योजना को क्राप कालोनी (कृषि परिक्षेत्र) प्रोजेक्ट नाम दिया गया है।

कृषि मंत्री पोचरम श्रीनिवास रेड्डी की मानें तो जलवायु परिवर्तन से किसानों को पैदावार में काफी परेशानी हो रही है। इस कारण विपक्ष भी सरकार से किसी ठोस योजना पर काम करने की मांग कर रहा था। इसी के मद्देनजर सरकार ने राज्य में सब्जियों के परिक्षेत्र समेत 54 क्रॉप कालोनी क्लस्टर बनाने की योजना बनाई। इस योजना की शुरुआत रंगारेड्डी जिले से हुई है।

मंत्री के मुताबिक इस योजना का उद्देश्य एक या उससे अधिक गाँव में एक ही तरह की फसल होगी। यानि राज्य में सब्जियों समेत विभिन्न फसलों की पैदावार सुनिश्चित हो सके ताकि राज्य में जिस जिंस की जैसी मांग हो वह पूरी हो सके। इसमें सब्जी, अनाज, दलहन सभी शामिल हैं। इसके बाद जो भी जिंस अधिक होगा उसे प्रसंस्कृत किया जाएगा।

योजना के तहत धान की खेती उन्हीं इलाकों में होगा जहां सिंचाई का उपयुक्त प्रबंध है क्योंकि इसमें ज्यादा पानी की खपत होती है, जबकि मक्का उन इलाकों में होगा जहां पानी की कमी है। सरकार इसके लिए किसानों को प्रशिक्षित भी करेगी ताकि खेती को बढ़ावा मिले।

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