कठिया गेहूं की खेती करके अधिक उपज ले सकते हैं किसान

Ashwani NigamAshwani Nigam   21 Oct 2017 4:04 PM GMT

कठिया गेहूं की खेती करके अधिक उपज ले सकते हैं किसानकठिया गेहूं

लखनऊ। अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में कठिया गेहूं की मांग तेजी से बढ़ रही है और स्थिति यह है कि यह साधारण गेहूं के मुकाबले इस गेहूं को 20 प्रतिशत अधिक कीमत मिल रही है। भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान, संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक कठिया गेहूं जिसे ड्यूरम गेहूं कहते हैं अपने विशिष्ट गुणों के कारण सूखा सह सकती है।

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असिंचित क्षेत्र में भी साधारण गेहूं के मुकाबले अधिक उपज देती है। बीमारी और कीट का प्रकोप भी इसमें नहीं लगता है, इसलिए किसानों को इसकी अधिक से अधिक खेती करनी चाहिए। कठिया गेहूं के बारे में जानकारी देते हुए कृषि वैज्ञानिक राजेश कुमार आर्य बताया '' भारत में मुख्य रूप से दो तरह के गेहूं प्रचलित हैं साधारण गेहूं जिस एस्टविम कहते और कठिया गेहूं जिसे ड्यूरम कहते हैं। कठिया गेहूं के पौधे मोटे होते हैं और इसकी पत्तियां चौड़ी होती है। इसके दाने बड़े और लंबे होते हैं। ''

उन्होंने बताया कि ऐसे समय में जब रासायनिक खादों और कीटनाशकों के अधिक प्रयोग के कारण परंपरागत गेहूं की गुणवत्ता और पौष्टिकता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। ऐसे में कम खाद-पानी और उवरर्क के कम इस्तेमाल के बाद भी अधिक ऊपज देने वाला कठिया गेहूं किसानों के लिए बेहतर विकल्प है। गेहूं में लगने वाले सबसे खतरनाक रोग करनाल बंट रोग भी कठिया गेहूं में नहीं लगता है। इस रोग के प्रति यह प्रतिरोधी है।

इस गेहूं की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें सामान्य गेहूं के मुकाबले प्रोटीन की अच्छी होती है, जो 12 से लेकर 13 प्रतिशत होती है। इसमें बीटा कैरोटीन नामक एक पदार्थ पाया जाता है, जिससे विटामिन ए बनता है, जबकि साधारण गेहूं में यह नहीं मिलता है। ऐसे में आंख की बीमारियों के लिए यह फायदेमंद होता है। इसमें ग्लूटन भी पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है। जिससे सूजी-रवा, पिज्जा, स्पेघेटी, सेवइंया, नूडल्स और शीघ्र पचन वाले पौष्टिक आहारों के लिए कठिया गेहूं बेहतर होता है।

पूरे देश में कठिया गेहूं की खेती लगभग 25 लाख हेक्टेयर में की जाती है। इस बारे में जानकारी देते हुए भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डा. रतन तिवारी ने बताया '' कठिया गेहूं की खेती मध्य और दक्षिण भारत के उष्ण जलवायु क्षेत्र में की जाती है। यह गेहूं ट्रिटकम परिवार में दूसरे स्तर का महत्वपूर्ण गेहूं है। गेहूं के तीनों उप परिवारों एस्टिवम, डयूरम और कोकम में उत्पादन की दृष्टि से ड्यूरम का दूसरा स्थान है।''

उन्होंने बताया कि भारत में इसकी खेती बहुत पुरानी है। पहले यह उत्तर-पश्चिम भारत के पंजाब में अधिक उगाया जाता था, इसके बाद दक्षिण भारत के कनार्टक, गुजरात के काठियावाड़ और पूर्व से पश्चिम बंगाल में फैला। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में भी इसकी बड़ी मात्रा में खेती होती थी लेकिन बदलते समय के साथ इसकी खेती कम होती चली गई। लेकिन एक बार फिर से मध्य भारत खासकर मध्यप्रेश के मालवा क्षेत्र, गुजरात के सौराष्ट और काठियावाड़, राजस्थान का कोटा, मेवाड़, उदयपुर और उत्तर पद्रेश के बुंदेलखंड में इसकी खेती होने लगी है।

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इस बार के रबी सीजन में किसान कठिया गेहूं की उन्नत प्रजातियों की खेती कर सकें इसके लिए कृषि विभाग की तरफ से सिंचित और असिंचित क्षेत्रों के लिए कठिया गेहं की नई प्रजातियों को लांच किया गया है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई की बेहतर सुविधा वहां के किसान इस बार कठिया गेहूं की पी.डी.डब्लू. 34, पी.डी.डब्लू 215, पी.डी.डब्लू 233, राज 1555, डब्लू. एच. 896, एच.आई 8498 एच.आई. 8381, जी.डब्लू 190, जी.डब्लू 273 और एम.पी.ओ. 1215 प्रजाति की बुवाई कर सकते हैं।

जिन क्षेत्रों में पानी की कमी हैं वहां के किसान कठिया गेहूं की आरनेज 9-30-1, मेघदूत, विजगा यलो जे.यू.-12, जी.डब्लू 2, एच.डी. 4672, सुजाता और एच.आई. 8627 प्रजातियों की बुवाई कर सकते हैं।

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