शकरकंद की खेती से मुनाफा कमा रहे बाराबंकी के किसान 

शकरकंद की खेती से मुनाफा कमा रहे बाराबंकी के किसान अपने शकरकंद के खेत दिखाते शिवराजपुर गाँव के पारस सिंह

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क/दीपांशू मिश्रा

शिवराजपुर (बाराबंकी)सर्दियों में खाए जाने वाले कंदों में शकरकंद काफी प्रचलित हैं। आलू की तरह शकरकंद भी जमीन में पैदा होती है और इसमें स्टार्च भरपूर मात्रा में होती है, इसलिए इसका प्रयोग शरीर में ऊर्जा बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसमें आंखों की रोशनी बढ़ाने वाला कैरोटीनॉयड रसायन भी भरपूर मात्रा में पाया जाता है।

शकरकंद की खेती वैसे तो पूरे भारत में की जाती है लेकिन ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल व महाराष्ट्र में इसकी खेती सब से अधिक होती है। शकरकंद की खेती में भारत दुनिया में छठे स्थान पर आता है। बाराबंकी जिले में भी शकरकंद भारी मात्रा में उगाई जाती है।

लखनऊ मुख्यालय से 75 किलोमीटर उत्तर दिशा में स्थित बाराबंकी जिले के शिवराजपुर गाँव के किसान शकरकन्द की खेती में अपना हाथ आजमा रहे हैं। उन्हें इस खेती से काफी फायदा हो रहा है। शिवराजपुर गाँव के पारस सिंह (42 वर्ष) बताते हैं, ‘शकरकन्द की खेती काफी सरल है। इस खेती से कम लागत में अधिक मुनाफा मिल रहा है।’ पारस आगे बताते हैं, ‘मैंने अपने दो बीघे के खेत में शकरकन्द बोई थी जिससे मुझे अच्छा फायदा हुआ है। मैंने जुलाई माह में शकरकन्द की बेलों के छोटे-छोटे टुकड़े करके बुवाई कर दी थी। उसके तीन से चार दिन बाद सिंचाई कर दी थी। उसके बाद आवश्यकतानुसार उसमें खाद डाली व समय- समय पर पानी देता रहा। करीब छह महीने के बाद फसल तैयार हो गयी।’

ये भी पढ़ें- #स्वयंफेस्टिवल: स्वयं अवॉर्ड से सम्मानित हुए बाराबंकी के सितारे

शकरकंद

हैदरगढ़ गाँव के किसान जोगिन्दर सिंह (35 वर्ष) बताते हैं, ‘मैंने अपने एक बीघे खेत में शकरकन्द की खेती की थी जिससे मुझे बढ़िया फायदा हुआ।’ बाराबंकी कृषि विभाग के खण्ड तकनीकी प्रबंधक सुशील कुमार अग्निहोत्री बताते हैं, ‘शकरकंद की कई प्रजातियां होती हैं। पूसा सफ़ेद, पूसा लाल, एस10 -10 ओ पी -1 काल मेघ आदि। इसकी खेती के लिए दोमट व रेतीली मिट्टी होनी चाहिए। इसकी बुवाई से पहले 200 कुंतल प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद डालनी चाहिए। बुवाई के लिए छह से सात कुंतल प्रति हेक्टेयर पौध रोपड़ या बेलों के 40-70 हज़ार टुकड़े करके बुवाई करनी चाहिए। बुवाई के बाद उर्वरक का प्रयोग करते हैं फिर बुवाई के चार से पांच दिन बाद सिंचाई करते हैं। इसके बाद हर 15 दिनों पर सिंचाई करते रहना चाहिए। बाराबंकी जिले में इसकी पैदावार 150 से 200 कुंतल प्रति हेक्टेयर होती है।’

ये भी पढ़ें- स्वयं फेस्टिवल के दौरान बाराबंकी में हुए 50 से ज्यादा कार्यक्रम, देखें झलकियां

Share it
Top