मुद्दा: आर्थिक आजादी की लड़ाई बाकी है इसीलिए आज का किसान कल का मजदूर है

मुद्दा: आर्थिक आजादी की लड़ाई बाकी है इसीलिए आज का किसान कल का मजदूर हैकर्ज़ में डूबता जा रहा है देश का किसान।

देश में किसान आजादी की लड़ाई से पूर्व से लेकर आज तक किसान आर्थिक आजादी की लड़ाई लड़ रहा है,आजादी के पहले किसानों ने नील के भाव कम मिलने से नील आन्दोलन किया था तो किसी ने अधिक कर वसूली को लेकर अपनी आवाज बुलंद की थी, जिसके कारण देश में आजादी की आवाज का आगाज और आजाद हुआ परन्तु 70 साल की आजादी बाद भी किसानों को आर्थिक आजादी अभी तक नहीं मिली है।

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जिसकी आवाज आज भी हम लागत मूल्य, लाभकारी लागत मूल्य ,कर्जमाफी और सुनिश्चित आय के नाम से सुन रहे हैं ,जिसको राजनातिक दल हर बार चुनाव में किसानों के सामने एक सपने के रूप में रखकर सत्ता हासिल करते रहे है और किसान भी वादों और उम्मीद में राजनैतिक दलों के जाल में फसते रहे है। परन्तु अब समय आ गया है की देश की एक बड़ी आबादी को उसका हक़ मिलना चाहिए ,उसको अपने उत्पाद की आर्थिक आजादी मिलनी चाहिए क्योंकि आज भी किसान के उत्पाद को बेचते समय और किसान की आवश्यकता के लागत उत्पाद को खरीदते समय कीमत सिर्फ व्यापारी ही तय करता है दोनों जगह किसान का शोषण हो रहा हैं जिससे उत्पाद सस्ते दाम पर और कृषि के आदान महंगे दामों पर खरीदना पड़ता जो की किसानों की खेती को घाटे की और ले जा रहा है।

इस नीतियों के चलते किसान हमेशा से गरीबी के दुष्चक्र में फसता जाता है जब सारे रास्ते बंद हो जाते है तो अंतिम रास्ता आत्महत्या का अपना लेता है, जिसके कारण आज देश की कृषि आत्महत्या का किला बन गई है, जो की देश और समाज के लिए चिंता का विषय है,किसानों पर कर्ज का सीधा सा कारण है फसलों के मूल्य का नहीं मिलना है,जबकि यही कृषि ने देश को सोने की चिड़िया बनाया है।

आलू की दरों में गिरावट से यूपी समेत कई राज्यों के आलू किसान परेशान हैं।

देश में हर राजनैतिक दल द्वारा कृषि को लाभ का धंधा बनाने की बात करते है परन्तु कृषि को एक इंडस्ट्रीज की सुविधा देने से परहेज किया जाता रहा है ,जिसके कारण आज तक किसानों को व्यापार के लिए दी जाने वाली मूलभूत सुविधा का एक अंश तक उपलब्ध नहीं जबकि खेती में इन्वेस्टमेंट,इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ इफिसिएँट मार्केट की जरुरत है। देश में कृषि को लाभ का धंधा और आय दुगनी करने का मुख्य उदेश्य किसानों का जीवन स्तर सुधारना है ,कर्ज मुक्त करना है , खरीदने की ताकत बढाना है मुख्यतः आर्थिक मजबूती या आर्थिक आजादी देना है जिसकी लड़ाई किसान लड़ रहा है इसके लिए सरकार को न्यूनतम आय सुनिश्चित करना होगा।

परन्तु इन सब के बीच देश के किसानों की हालत बेहद चिंताजनक है,आज देश में किसानों और उद्योगपतियों से अलग-अलग तरह से व्यवहार किया जा रहा है। एक तरफ हरियाणा की पंजाब नेशनल बैंक किसानों की जमीन को खुलेआम नीलामी कर रही है तो दूसरी और मध्यप्रदेश के शिवपुरी में किसानों के ट्रेक्टर की क़िस्त और केसीसी लोन नहीं चुकाने के कारण उनकी कटी हुई फसलों को तहसीलदार के द्वारा जब्त की जा रही।

वहीं तीसरी खबर है कि बुंदेलखंड में किसानों से ट्रैक्टर की किश्त नहीं चुका पाने के कारण नीलामी की जाना है, इसी बीच विदर्भ में एक किसान के पास बैल खरीदने के पैसे नहीं होने के कारण उसको बैल के साथ जुटकर खेती का काम करना पड़ रहा है। ऐसे हालातों में किसानों की आय दुगनी करना ,कर्ज माफ़ी करना ,लाभ का धंधा बनाना सिर्फ चुनावी रंग लगता है ।

पिछले दिनों देश के दो प्रमुख कृषि राज्यों में चुनाव हुए। जिसमें सभी दलों ने किसानों की आत्महत्या और कर्ज को माफ़ करने का जोर शोर से प्रसार-प्रचार किया। दोनों राज्यों में किसानों पर कर्ज हर साल तेजी से बढता जा रहा है। इन दोनों राज्य का हरित क्रांति और फसल उत्पादन में बेहद बड़ा योगदान रहा है यहां के किसानों के पास उपजाऊ जमींन और सिचाई के साधन के साथ साथ तकनीकी में भी आगे है , हरित क्रांति के जरिये देश के अनाज में आत्मनिर्भर बनाने वाला पंजाब का किसान आज खुद संकट में उलझा है। पिछले साढ़े तीन साल में किसान का कर्ज 35 हजार करोड़ से उछल कर अस्सी हजार करोड़ के नजदीक पहुंच गया है।

वर्ष 2014-15 में किसान एवं खेत मजदूरों पर 69,355 करोड़ का कर्ज था, इनमें संस्थागत लोन 54481 करोड़ एवं साहूकार का कर्ज 12874 करोड़ है। वर्ष 2017 तक यह बढ़ कर अस्सी हजार करोड़ का आंकड़ा पार कर लेगा। यही हाल यूपी में करीब 2.5 करोड़ किसान हैं, जिनपर करीब 1.27लाख करोड़ रुपये बैंकों पर कृषि ऋण के तौर पर बकाया है।

वहीं लघु और सीमांत किसानों पर करीब 92,121 करोड़ रुपये का कर्ज फसली ऋण का है। यह यूपी के कुल बजट का करीब एक चौथाई है। जबकि देश में किसानों पर कुल कर्ज 7 से 8 लाख करोड़ है जिसमे से 47 हजार करोड़ एनपीए है ,जो कुल कर्ज किसानों के नाम पर दिखाया जा रहा है जिसमे वेयरहाउस रिसिप्ट फायनांस , कोल्ड स्टोरेज, वेयरहाउस, फार्म मशीन कई नाम से व्यापारियों और उद्योगपतियो ने बैंक से लोन ले रखा है जो की किसानों के नाम पर होता है और उसका उपयोग व्यापार के लिए किया जाता है।

बुंदेलखंड में 19 किसानों के ट्रैक्टर जल्द नीलाम किए जाने हैं।

देश में कुल 52 फीसदी किसान जिन पर औसतन 47 हजार का कर्ज है। देश के सबसे शिक्षित राज्य केरल में प्रति किसान केरल में 2.13 लाख , आंध्र प्रदेश में 1.23 लाख , पंजाब में 1.19 लाख परन्तु वहीं असाम में 3400 झारखण्ड में 5700 और छत्तीसगढ़ में 10200 रुपए का कर्ज है। जबकि देश में कुल कर्ज औसतन 76 फीसदी संस्थागत और 24 फीसदी गैर संस्थागत से लिया जाता है, जिसमें गरीब या छोटी किसानी वाले राज्यों में संस्थागत कर्ज आसाम में 17 फीसदी झारखण्ड में 29 फीसदी और छत्तीसगढ़ में 38 फीसदी। इन सभी आकड़ों में एक बात स्पष्ट होती है की जहाँ गरीबी है ,जहाँ किसान छोटे हैं ,जिनका शिक्षा स्तर कमजोर है वहां आज भी प्राइवेट फाइनेंस ज्यादा है और जहां प्राइवेट फाइनेंस ज्यादा है।

आज देश में जो लोग सिर्फ खेती पर आश्रित है जिनका कोई सहायक व्यापर नहीं है, वो सभी कर्ज में हैं और जो छोटे सीमांत किसान हैं वह तो आज भी प्राइवेट फाइनेंस के सहारे ही जी रहे है और ब्याज के कारण किसान से मजदूर बनते जा रहे हैं। जबकि पूरे भारत में आरबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को जिन बड़े लोन डिफॉल्टरों की लिस्ट सौंपी हैं, उनमें 72 कंपनियों पर 5,53,167 करोड़ रुपये का कर्ज है। इसमें से सिर्फ 5 कंपनियों पर कुल 1.4 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है। 72 में से 40 कंपनियां 3 साल से लोन चुकाने में नाकाम हैं। देश में उद्योगपतियों पर 7.4 लाख करोड़ का एनपीए लोन है जिसमे से हर बर्ष सरकार द्वारा माफ़ कर दिया जा रहा है।

वहीं देश की सर्वोच्च न्यालय ने भी माना की देश में किसानों की आत्महत्या का कारण कर्ज है। देश के सर्वोच्च न्यालय ने यह तो पता लगा लिया है की किसानों की आत्महत्या का कारण कर्ज परन्तु कर्ज का कारण क्या ? किसानों के अनुसार कर्ज का कारण सिर्फ उपज का आधा मूल्य मिलना रहा है जिस दिन उपज का पूरा मूल्य मिलेगा उस दिन से कर्ज ख़त्म होगा ,गरीबी का दुष्चक्र टूटेगा और किसान आत्महत्या का किला डह जायेगा।

देश की सरकार द्वारा जिस तरह का व्यहवार उद्योगपतियों से किया जाता है तो उसी प्रकार का व्यवहार किसानों से क्यों नहीं किया जाता है। किसानों पर राजनैतिक दल सिर्फ चुनाव में चर्चा करते हैं, जब सरकार बन जाती है तो उद्योगपतियो के लिए काम करती है और किसानों को भूल जाती हैं। इसलिए कृषि और किसान से सौतेला व्यवहार हो रहा है अगर किसानों को वास्तविकता में आर्थिक आजादी देनी है तो किसानों को भी एक उद्योग की सुविधा और सुनिश्चित आय देना होगा नहीं तो आज का किसान कल का मजदूर होगा।

लेखक- आम आदमी किसान यूनियन, मध्यप्रदेश से जुड़े हैं, ये उनके निजी विचार हैं।

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