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आलू की खेती के लिए सही समय, अपने क्षेत्र के हिसाब से विकसित किस्मों की करें बुवाई

आलू की खेती का सही समय है, अच्छे उत्पादन और नुकसान बचने के लिए किसानों को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए।

Divendra SinghDivendra Singh   14 Sep 2020 8:53 AM GMT

आलू की खेती के लिए सही समय, अपने क्षेत्र के हिसाब से विकसित किस्मों की करें बुवाई

सितम्बर-अक्टूबर से किसान रबी की फसलों की बुवाई की तैयारी शुरू कर देते हैं, आलू की बुवाई के लिए ये सही समय होता है, इसलिए बुवाई से पहले किसानों को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए और बुवाई के लिए रोग अवरोधी किस्मों का ही चयन करना चाहिए।

केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान ने क्षेत्र के हिसाब से आलू की किस्में विकसित की हैं, इसलिए अपने क्षेत्र के हिसाब से विकसित की गईं किस्मों का ही चयन करना चाहिए। सीपीआरआई, मोदीनगर के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. विजय कुमार गुप्ता बताते हैं, "देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग समय में आलू की खेती होती है, इसलिए आलू की खेती करते समय अपने क्षेत्र के हिसाब से विकसित किस्मों की बुवाई करनी चाहिए, साथ ही रोग प्रतिरोधी किस्मों को देखना चाहिए, जिससे किसानों को बाद में कोई नुकसान न उठाना पड़े।"

कुफरी अंलकार

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों के लिए ये किस्म विकसित की गई है, जिसका औसत उत्पादन 200 से 250 कुंतल प्रति हेक्टेयर मिलता है। अगेती झुलसा रोग के प्रति अति संवदेनशील होता है, जबकि पछेती झुलसा रोग के प्रतिरोधी होता है। इसके साथ ही दूसरे वायरस जनित रोगों से बचाना होता है।

कुफरी आनंद

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों के लिए विकसित किस्म है, 350 से 400 कुंतल प्रति हेक्टेयर उत्पादन मिलता है। पछेती झुलसा रोग प्रतिरोधी और इस किस्म की सबसे खास बात होती है, ये किस्म पाला को सहने की क्षमता रखती है और सर्दियों में इससे अच्छा उत्पादन मिलता है।

कुफरी अरुण

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों के लिए विकसित इस किस्म से प्रति हेक्टेयर 300 से 350 कुंतल प्रति हेक्टेयर उत्पादन मिलता है। पछेती झुलसा रोग से इसको नुकसान नहीं होता है।

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कुफरी अशोक

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों के लिए विकसित की गई है, जिससे 250 से 300 कुंतल प्रति हेक्टेयर उत्पादन मिलता है। ये किस्म पछेती झुलसा, सिस्ट निमेटोड और वायरस जनित कई बीमारियों के प्रति अति संवेदनशील होती है।

कुफरी बादशाह

ये किस्म भी उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों के लिए विकसित की गई है, जिसका उत्पादन प्रति हेक्टेयर 300 से 350 कुंतल प्रति हेक्टेयर होता है। कुफरी बादशाह किस्म अगेती और पछेती झुलसा रोग प्रतिरोधी किस्म होती है।

कुफरी बहार

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों के लिए विकसित इस किस्म से प्रति हेक्टेयर 300 से 350 कुंतल प्रति हेक्टेयर उत्पादन मिलता है। ये किस्म अगेती और पछेती झुलसा के साथ ही कई बीमारियों के प्रति संवेदनशील होती है।

कुफरी चिप्सोना-1

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों के लिए विकसित इस किस्म से प्रति हेक्टेयर 300-350 कुंतल प्रति हेक्टेयर उत्पादन मिलता है। पछेती झुलसा और दूसरी वायरस जनित बीमारियों के प्रति संवेदनशील होता है। ये किस्म चिप्स और फ्रेंच फ्राइज बनाने के लिए उपयुक्त किस्म होती है।

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कुफरी चिप्सोना-2

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों के लिए ये किस्म विकसित की गई है, जिसका औसत उत्पादन 300 से 350 कुंतल प्रति हेक्टेयर मिलता है। पछेती झुलसा रोग प्रतिरोधी और सर्दियों के मौसम में ये अच्छा उत्पादन देती और पाला सहने की क्षमता भी रखती है।

कुफरी चिप्सोना-3

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों के लिए ये किस्म विकसित की गई है, जिसका औसत उत्पादन 300 से 350 कुंतल प्रति हेक्टेयर मिलता है। पछेती झुलसा रोग प्रतिरोधी किस्म को लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता है।

कुफरी देवा

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में खेती के लिए विकसित ये किस्म देर से तैयार होती है, जिससे उत्पादन 200-250 कुंतल हेक्टेयर मिलता है। इसे लंबे समय तक सुरक्षित किया जा सकता है और इसकी फसल पर पाला का भी कोई असर नहीं पड़ता है।

कुफरी फ्राईसोना

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में खेती के लिए विकसित किस्म 300 से 350 कुंतल प्रति हेक्टेयर उत्पादन देती है। इसे लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता और फ्रेंच फ्राई बनाने के लिए किस्म बिल्कुल सही होती है।

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कुफरी गरिमा

इस किस्म की खेती उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में कर सकते हैं। इसका उत्पादन 300 से 350 कुंतल प्रति हेक्टेयर मिलता है। इसे भी लंबे समय तक स्टोर कर सकते हैं।

कुफरी गौरव

पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्र और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए इस किस्म को विकसित किया गया है। देरी से तैयारी होने वाली कुफरी गौरव किस्म के आलू को लंबे समय के लिए स्टोर किया जा सकता है।

कुफरी गिरधारी

भारत के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए विकसित कुफरी गिरधारी किस्म से प्रति हेक्टेयर 300 से 350 कुंतल आलू का उत्पादन होता है। ये किस्म पछेती झुलसा प्रतिरोधी किस्म होती है।

कुफरी गिरिराज

उत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए विकसित इस किस्म से प्रति हेक्टेयर 200 से 250 कुंतल उत्पादन होता है।

कुफरी जवाहर

उत्तर भारत के मैदानी और पठारी क्षेत्रों के लिए विकसित कुफरी जवाहर किस्म जल्दी तैयार हो जाती है। इसका उत्पादन 250 से 300 कुंतल प्रति हेक्टेयर होता है। ये जल्दी खराब नहीं होता और सहफसली खेती के लिए ये किस्म सही होती है।

कुफरी जीवन

उत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए विकसित इस किस्म से प्रति हेक्टेयर 150 से 200 कुंतल उत्पादन मिलता है। देर तैयार होने वाली ये किस्म पछेती झुलसा रोग प्रतिरोधी होती है।

कुफरी ज्योति

पहाड़ी, मैदानी और पठारी क्षेत्रों में इस किस्म की खेती की जा सकती है, जिसका उत्पादन प्रति हेक्टेयर 250 से 300 कुंतल हेक्टेयर होता है। इसे लंबे समय तक स्टोर भी किया जा सकता है।

कुफरी कंचन

ये किस्म उत्तर-बंगाल की पहाड़ियों और सिक्किम के लिए विकसित की गई है, इससे प्रति हेक्टेयर 250-300 कुंतल उत्पादन होता है।

कुफरी खासीगारो

उत्तर-पूर्वी पहाड़ी क्षेत्रों के लिए विकसित इस किस्म से प्रति हेक्टेयर 200 से 250 कुंतल प्रति हेक्टेयर आलू का उत्पादन होता है।

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