जानें भारत में कितनी हैं बकरियों की प्रजातियां, किससे कितना होता है फायदा

जानें भारत में कितनी हैं बकरियों की प्रजातियां, किससे कितना होता है फायदाएनडीडीबी 2016 के आंकड़ों के मुताबिक प्रतिवर्ष 5 मीट्रिक टन रोज बकरी के दूध का उत्पादन।  

लखनऊ। जहां एक ओर पशुओं के दाने चारे और दवाइयां मंहगी होने से पशुपालन आर्थिक दृष्टि से कम लाभकारी हो रहा है। वहीं बकरी पालन कम लागत, साधारण आवास, सामान्य रख-रखाव में गरीब किसानों और खेतिहर मजदूरों की जीवकोपार्जन का एक साधन बन रहा है।

पशुपालक अच्छी नस्ल की बकरी का पालन करके अच्छा मुनाफा कमा सकते है। 19वीं पशुगणना के अनुसार पूरे भारत में बकरियों की कुल संख्या 135.17 मिलियन है, उत्तर प्रदेश में इनकी संख्या 42 लाख 42 हजार 904 है। एनडीडीबी 2016 के आंकड़ों के मुताबिक प्रतिवर्ष 5 मीट्रिक टन बकरी का दूध उत्पादन होता है, जिसका अधिकांश हिस्सा गरीब किसानों के पास है।

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भारत में बकरियों की 21 प्रजाति की नस्लें पाई जाती है। इन नस्लों की अपनी अपनी खासियत होती है। जो पशुपालक बकरी पालन शुरू करना चाहते है। वो इन बकरियों की विशेषताओं को जानकार पाल सकते है और मुनाफा ले सकते है।

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जमुनापारी- यह इटावा, मथुरा आदि जगहों पर पाई जाती है। यह दूध तथा माँस दोनों उद्देश्यों की पूर्ति करती है, यह बकरियों की सबसे बड़ी जाति है। इसक रंग सफेद होता है और शरीर पर भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं, कान बहुत लम्बे होते हैं। इनके सींग 8-9 से.मी. लम्बे और ऐठन लिए होते हैं। जमुनापारी जाति की बकरियों का दूध उत्पादन 2-2.5 लीटर प्रतिदिन तक होता है।

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बरबरी- यह बकरी एटा, अलीगढ़ तथा आगरा जिलों में पाई जाती है। यह माँस उत्पादन के उपयोग में लाई जाती है यह आकार में छोटी होती है। इनमें रंग की भिन्नता होती है। कान नली की तरह मुड़े हुए होते हैं। सफेद शरी पर अधिकर भूरे धब्बे तथा भूरे पर सफेद धब्बे पाए जाते हैं। यह नस्ल दिल्ली क्षेत्र के लिए उपयुक्त है।

बीटल- यह नस्ल दूध उत्पादन के लिए उपयुक्त है। यह गुरदासपुर के पास पंजाब में पाई जाती है इसका शरीर आकार से बड़ा तथा काले रंग पर सफेद या भूरे धब्बे पाए जाते है बाल छोटे तथा चमकीले होते हैं। कान लम्बे लटके हुए तथा सर के अन्दर मुड़े हुए होते हैं।

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ब्लैक बंगाल- यह नस्ल पूरे पूर्वी भारत में विशेषकर पश्चिम बंगाल, उड़ीसा तथा बिहार में पाई जाती हैं। यह छोटे पैर वाली नस्ल है। इनका कद छोटा होता है। इनका रंग काला होता है। नाक की रेखा सीधी या कुछ नीचे दबी हुई होती है। बाल छोटे तथा चमकीले होते हैं। पैर कुछ नीचे कान छोटे चपटे तथा बगल में फैले होते हैं। दाढ़ी बकरे बकरी दोनों में होती है।

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ओस्मानाबादी- यह नस्ल महाराष्ट्र के ओस्मानाबादी जिले में पाई जाती है। यह भी माँस के लिए पाली जाती है। बकरियों का रंग काला होता है। साल में आसानी से दो बार बच्चे देती है। यह बकरी लगभग आधे ब्याँत में जुड़वा बच्चे देती है। 20-25 से.मी. लम्बे कान होते हैं। रोमेन नाक होती है।

सूरती- यह नस्ल सूरत (गुजरात) में पाई जाती है। यह दुधारू नस्ल की बकरी है। इसका रंग अधिकतर सफेद होता है। कान मध्यम आकार के लटके हुए होते हैं, सींग छोटे तथा मुड़े हुए होते हैं। यह लम्बी दूरी चलने में असमर्थ होती है।

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मारवारी- यह बकरी की त्रिउद्देशीय जाति (दूध, माँस व बाल) के लिए पाली जाती है, जो राजस्थान के मारवार जिले में पाई जाती है यह पूर्णतः काले रंग की होती है। कान सफेद रंग के होते हैं। इसके सींग कार्कस्क्रू की तरह के होते हैं। यह मध्यम आकार की होती है।

सिरोही- यह बकरी की नस्ल राजस्थान के सिरोही जिले में पाई जाती है। यह नस्ल दूध तथा माँस के काम आती है। इनका शरीर मध्यम आकार का होता है। शरीर का रंग भूरा जिस पर हल्के भूरे रंग के या सफेद रंग के चकते पाए जाते हैं। कान पत्ते के आकार के लटके हुए होते हैं, यह लगभग 10 से.मी. लंबे होते हैं, थन छोटे होते हैं।

कच्छी- यह नस्ल गुजरात के कच्छ जिले में पाई जाती है। यह बड़ें आकार की दुधारू नस्ल है। बाल लंबे एवं नाक उभार लिए हुए होती है। सींग मोटे, नुकीले तथा ऊपर व बाहर की ओर उठे हुए होते हैं। थन काफी विकसित होते हैं।

गद्दी- यह हिमांचल प्रदेश के काँगडा कुल्लू घाटी में पाई जाती है। यह पश्मीना आदि के लिए पाली जाती है कान 8.10 सेमी. लंबे होते हैं। सींग काफी नुकीले होते हैं। इसे ट्रांसपोर्ट के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। प्रति ब्याँत में एक या दो बच्चे देती है।

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इन बकरियों के बारे में अधिक जानकारी के लिए मथुरा स्थित केंद्रीय बकरी अनुसन्धान संस्थान में बकरी पालन का समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाता है। इच्छुक किसान इस नंबर पर कर सकते हैं संपर्क :- फोन नं 0565-2763320

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