टमाटर की देसी किस्मों से बढ़ रही पैदावार

टमाटर की देसी किस्मों से बढ़ रही पैदावारप्रतीकात्मक फोटो

लखनऊ। सब्जियों का सरताज अगर आलू है तो टमाटर भी उससे कम नहीं है। पूरी दुनिया में घरों से लेकर फूड इंडस्ट्री तक सबसे ज्यादा उपयोग टमाटर का सब्जी के तौर पर किया जाता है। अपने देश में फूड प्रोसेसिंग यूनिट में भी टमाटर सबसे ज्यादा डिमांड में रहता है। लेकिन पिछले एक दशक से हाइब्रिड टमाटर और इस पर रासायनिक प्रयोग से इसके स्वाद पर भी बहुत असर पड़ा है। हाइब्रिड टमाटर की खेती करने से इसकी पैदावार भले ही बढ़ी है, लेकिन इसकी पोष्टिकता कम हुई है। यह देश के कृषि वैज्ञानिकों के लिए चिंता का सबब था।

टमाटर की छह देसी किस्म इजाद किये

इसी को देखते हुए सालों मेहनत करके भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान वाराणसी के दो वैज्ञानिकों ने एक नहीं, बल्कि टमाटर की छह देसी किस्मों को इजाद किया है। इन टमाटर की पूरे देश में डिमांड बढ़ गई है। काशी अमृत, काशी विशेष, काशी हेमंत, काशी शरद, काशी अनुपम और काशी अभिमा नामक टमाटर की इस वैराइटी की चर्चा भी देशभर में हो रही है।

यूपी, बिहार, झारखंड के किसानों की पहली पसंद बना काशी अमृत

भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान के कृषि वैज्ञानिक और वेजिटेबल क्राप्स के प्रोजेक्ट क्वार्डिनेटर डा. मेजर सिंह और डा. प्रसन्ना ने कई सालों की मेहनत के बाद टमाटर की इन नई किस्मों को विकसित किया। इसके बाद इनके बीजों को किसानों के बीच वितरित किया। जिसको किसानों ने अपने खेत में लगाया और इसकी पैदावार भी अच्छी हुई। सबसे खास बात यह है कि टमाटर की सभी छह किस्मों को अलग-अलग प्रदेश की जलवायु और खेती की जमीन को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। काशी अमृत नामक वैराइटी को उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के लिए विशेषतोर पर विकसित किया गया है। काशी अमृत लाल रंग का औसत आकार और वजन का टमाटर है, जिसमें रोग लगने की संभावना भी नहीं रहती है। एक हेक्टेयर में 620 कुंतल इसकी पैदावार होती है। भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान के कृषि वैज्ञानिक और वेजिटेबल क्राप्स के प्रोजेक्ट क्वार्डिनेटर डा. मेजर सिंह ने बताया कि देसी टमाटर की इस वैराइटी को खाने के लिए विशेषरूप से विकसित किया गया है। जिसके कारण यूपी, बिहार और झारखंड के किसान इस वैराइटी की और आकर्षित हो रहे हैं।

छत्तीसगढ़, ओड़िसा, आंध्रप्रदेश और एमपी के लिए काशी हेमंत

छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश और एमपी में टमाटर की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है, लेकिन पिछले कुछ सालों से वहां के किसानों को इससे नुकसान हो रहा था। टमाटर की फसल पर वायरस के हमले से उसकी पत्तियां सूख जाती थी। ऐसे में भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान के कृषि वैज्ञानिकों ने वहां के लिए काशी हेमंत नामक से एक नई टमाटर की किस्त विकसित की। जिससे वहां के किसानों को अब फायदा मिल रहा है।

पहाड़ी क्षेत्रों में किसानों की पहली पसंद बना काशी शरद

जम्म-कश्मीर, हिमांचल प्रदेश और उत्तराखंड में टमाटर की खेती करने वाले किसान टमाटर में पाला लगने से परेशान रहते थे। इससे टमाटर की पैदावार पर असर पड़ रहा था। ऐसे में ठंडे प्रदेश के इन राज्यों के लिए भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान वाराणसी ने काशी शरद नामक नई किस्म इजाद की। पिछले एक साल से यहां के किसान इसको उगाकर अच्छी पैदावार कर रहे हैं।

गरम प्रदेशों के लिए काशी अनपुम

गरम जलवायु के क्षेत्र माने जाने वाले हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के किसान टमाटर की खेती अच्छे से कर सकें, इसको लेकर सब्जी अनुसंधान संस्थान ने काशी अनुपम नामक टमाटर की वैराइटी को विकसित किया है। 75 से लेकर 80 दिन में तैयार होने वाले इस टमाटर की प्रति हेक्टेयर उपज 500 से 600 क्विंटल होती है।

कहीं भी उगाया जा सकता है काशी विशेष टमाटर

भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान सालों से एक ऐसी वैराइटी को विकसित करने में लगा था जो पूरे भारत में कहीं भी उगाई जा सके। ऐसे में यहां के कृषि वैज्ञानिकों की सालों की मेहतन के नतीजे के बाद काशी विशेष नामक टमाटर की किस्म विकसित हुई। लगभग 80 ग्राम के बड़े आकार वाला यह टमाटर गहरा ग्रीन और लाल रंग का होता है। यह 70 से 75 दिन में तैयार होता है। प्रति हेक्टेयर 400 से लेकर 450 क्विंटल इसकी पैदावार होती है। देश के सभी राज्यों में इसकी पैदावार हो सकती है।

सब्जियों को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहा भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान

भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली का एक घटक संस्थान है। सब्जियों की महत्ता को देखते हुए वर्ष 1992 में सातवीं पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत सब्जी अनुसंधान परियोजना निदेशालय के रूप में इसकी स्थापना वाराणसी में की गईl निदेशालय के विस्तृत कार्य क्षेत्र, उपलब्धियां एवं सब्जी पर अनुसंधान की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, 17 अगस्त, 1999 को इसे राष्ट्रीय संस्थान “भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान” के रूप में मान्यता प्रदान की गईl यह संस्थान, 150 एकड़ में वाराणसी से दक्षिण-पश्चिम दिशा में शहँशाहपुर (अदलपुरा के निकट) में वाराणसी स्टेशन से 20 तथा बाबतपुर हवाई अड्डे से लगभग 40 किमी. की दूरी पर स्थित है l भारत में पूरी तरह सब्जी अनुसंधान पर समर्पित यह अकेला संस्थान है, जहां सब्जी की नई उन्नतशील किस्में, उसकी प्रोद्योगिकी एवं कीट तथा बीमारियों के प्रभावकारी नियंत्रण के लिए अनुसंधान कार्य किया जा रहा हैl इसके साथ-साथ सब्जियों की नई किस्मों की खोज और बीज का उत्पादन भी किया जा रहा है।

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