महिला किसान दिवस विशेष: कीजिए सलाम, पूरी दुनिया में खेती-किसानी में पुरुषों से आगे हैं महिलाएं

महिला किसान दिवस विशेष: कीजिए सलाम, पूरी दुनिया में खेती-किसानी में पुरुषों से आगे हैं महिलाएंखेती-किसानी में ग्रामीण महिलाओं का अमूल्य योगदान। (सभी फोटो साभार: गूगल)

लखनऊ। यहां बात सिर्फ भारत की नहीं, पूरे विश्व की है। पूरी दुनिया में कृषि क्षेत्र में ग्रामीण महिलाओं का अहम योगदान है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि दुनियाभर में ग्रामीण महिलाओं का कृषि क्षेत्र में योगदान 50 प्रतिशत से भी ज्यादा है। मतलब, पूरे विश्व खाद्य उत्पादन में से आधे उत्पादन का योगदान ग्रामीण महिलाओं का है। खाद्य और कृषि संगठन (Food & Agriculture Organisation) के आंकड़ों की मानें तो कृषि क्षेत्र में कुल श्रम में ग्रामीण महिलाओं का योगदान 43 प्रतिशत है, वहीं कुछ विकसित देशों में यह आंकड़ा 70 से 80 प्रतिशत भी है। इनमें एक बड़ी बात यह भी है कि वे चावल, मक्का जैसे अन्य मुख्य फसलों की ज्यादा उत्पादक रही हैं, जो ग्रामीण गरीब भोजन के रूप में 90 प्रतिशत तक सेवन करते हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि पूरी दुनिया में महिलाएं ग्रामीण और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं के विकास की रीढ़ हैं। ऐसे में महिला किसान की खेती किसानी में बड़ी भूमिका को देखते हुए भारत में 15 अक्टूबर को पहली बार महिला किसान दिवस मनाया जा रहा है।

वैश्विक स्तर पर ग्रामीण महिलाओं की भूमिका

खाद्य और कृषि संगठन के आंकड़ों की मानें तो वैश्विक स्तर पर आधे से ज्यादा खाद्य उत्पादन में ग्रामीण महिलाओं की भूमिका है। अफ्रीका में 80 प्रतिशत कृषि उत्पादन छोटे किसानों से आता है, जिनमें अधिकतर ग्रामीण महिलाएं हैं। गौर करने वाली बात यह है कि महिलाओं का कृषि क्षेत्र में कार्यबल का सबसे बड़ा प्रतिशत शामिल है, मगर खेतिहर भूमि और उत्पादक संसाधनों पर महिलाओं की पहुंच और नियंत्रण नहीं है। हालांकि पिछले 10 सालों में कई अफ्रीकी देशों ने महिलाओं के भूमि अधिकार स्वामित्व को मजबूत करने के लिए नये भूमि कानून को अपनाया है। इस पहल ने कृषि क्षेत्र में ग्रामीण महिलाओं की स्थिति को काफी हद तक मजबूत किया है।

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आंकड़ों की जुबानी ग्रामीण महिलाओं के योगदान की कहानी

उप सहारा अफ्रीका और कैरेबियन में, ग्रामीण महिलाएं बुनियादी खाद्य पदार्थों में 80 प्रतिशत तक उत्पादन करने में सफल हैं। वहीं, एशिया में वे चावल की खेती में 50 से 90 प्रतिशत तक खेती के लिए श्रम प्रदान करती हैं। इसके दूसरी ओर, अगर हम लेटिन अमेरिका की बात करें तो यह आंकड़ा 40 प्रतिशत तक पहुंचता है। हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं लगभग विशेष रूप से अपने बच्चों के पोषण के लिए जिम्मेदार हैं। मुख्य रूप से यह माना जाता है कि स्त्रियों का कार्य क्षेत्र पारिवारिक कार्यों तक ही केंद्रित है और उन्हें आर्थिक व सामाजिक उत्पादन कार्यों से विरत रहना चाहिए। इसके बावजूद, वे मुख्य फसलों की उत्पादक रही हैं और अपने परिवार के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। सामान्य रूप से ज्यादातर खाद्य उत्पादन वे घर के बगीचे या सामुदायिक भूमि का उपयोग करती हैं। इतना ही नहीं, यह भी देखा गया है कि ग्रामीण महिलाएं अपनी घरेलू आय से एक महत्वपूर्ण हिस्सा खर्च करती आई हैं और यह आंकड़ा पुरुष के अनुपात में एक बड़ा हिस्सा रहा है।

हर दिन पांच घंटे भोजन व्यवस्था पर

एफएओ (FAO) के आंकड़ों पर गौर करें तो दुनिया के कई क्षेत्रों में महिलाएं प्रतिदिन अपना पांच घंटे का समय ईंधन के लिए लकड़ियों को एकत्र करना, पानी और लगभग चार घंटे भोजन की तैयारियों पर समय व्यतीत करती हैं। इसके बावजूद, ग्रामीण महिलाएं खेती के लिए सबसे ज्यादा श्रम करती हैं, खेती के मिट्टी तैयार करने से लेकर फसल तक। फसल तैयार होने के बाद ग्रामीण महिलाएं फसल का भंडारण, हैंडलिंग, मार्केटिंग समेत अन्य कार्यों में भी अपनी भूमिका निभाती हैं। ऐसे में ग्रामीण महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा काम का अधिक बोझ उठाने में योगदान रहता है। अफ्रीका के कुछ क्षेत्रों में ग्रामीण महिलाएं 60 प्रतिशत तक अपने परिवारों में योगदान देती हैं।

भारत में यह है ग्रामीण महिलाओं की स्थिति

भारत में कृषि क्षेत्र में महिलाओं का अहम योगदान है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कृषि क्षेत्र में कुल श्रम की 60 से 80 फीसदी हिस्सेदारी ग्रामीण महिलाओं की है। एफएओ की एक शोध के अनुसार, हिमालय क्षेत्र में एक ग्रामीण महिला प्रति वर्ष औसतन 3485 घंटे प्रति हेक्टेयर काम करती हैं, वहीं पुरुष औसतन 1212 घंटे काम करते हैं। इस आंकड़े से कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी को आंका जा सकता है और महिलाओं के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। इतना ही नहीं, कृषि कार्यों के साथ ही महिलाएं मछली पालन, कृषि वानिकी और पशुपालन में भी अपना योगदान दे रही हैं।

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शोध में सामने आए आंकड़े

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और डीआरडब्लूए की ओर से नौ राज्यों में किये गये एक शोध से पता चलता है कि प्रमुख फसलों के उत्पादन में महिलाओं की भागीदारी 75 फीसदी तक रही है। इतना ही नहीं, बागवानी में यह आंकड़ा 79 प्रतिशत और फसल कटाई के बाद के कार्यों में 51 फीसदी तक ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी है। इसके अलावा पशुपालन में महिलाओं की भागीदारी 58 प्रतिशत और मछली उत्पादन में यह आंकड़ा 95 प्रतिशत तक है। सिर्फ इतना ही नहीं, नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन (NSSO) के आंकड़ों की मानें तो 23 राज्यों में कृषि, वानिकी और मछली पालन में ग्रामीण महिलाओं का कुल श्रम की हिस्सेदारी 50 है। इसी रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और बिहार में ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी का प्रतिशत 70 प्रतिशत रहा है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल, पंजाब, तमिलनाडु और केरल में महिलाओं की भागीदारी 50 फीसदी है। वहीं, मिजोरम, आसाम, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ और नागालैंड में यह संख्या 10 प्रतिशत है। शोध के अनुसार, पौध लगाना, खरपतवार हटाना और फसल कटाई के बाद ग्रामीण महिलाओं की सक्रिय भागीदारी शामिल है।

असीम संभावनाएं मगर भागीदारी कम

कई देशों में कृषि के क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका सिर्फ एक "मदद" मानी जाती रही है, बल्कि कृषि उत्पादन और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं में ग्रामीण महिलाओं का एक महत्वपूर्ण योगदान रहा है। कृषि में अहम योगदान देने के बावजूद भी महिला श्रमिकों का कृषि संसाधनों और कृषि क्षेत्र में मौजूद असीम संभावनाओं पर भागीदारी काफी कम रही है। यह कहना गलत नहीं होगा कि इस भागीदारी को बढ़ाकर ही महिलाओं को कृषि से होने वाले मुनाफे को बढ़ाया जा सकता है।

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