इस विधि से कम पानी में भी 30 प्रतिशत तक बढ़ेगी धान की पैदावार 

इस विधि से  कम पानी में भी 30 प्रतिशत तक बढ़ेगी धान की पैदावार सरकार की कई योजनाओं के बावजूद धान की उत्पादकता स्थिर है।

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में गेहूं के मुकाबले धान की बुआई का क्षेत्रफल और पैदावार नहीं बढ़ पा रहा है। सरकार की कई योजनाओं के बावजूद धान की उत्पादकता स्थिर है। ऐसे में उत्तर प्रदेश में सिस्टम ऑफ राईस इनटेन्सीफिकेशन यानि एसआरआई विधि से धान की खेती को बढ़ावा देने के लिए काम किया जा रहा है। पंजाब और हरियाणा के किसान इस विधि से खेती को करके कम पानी में अधिक पैदावार भी प्राप्त कर रहे हैं। आम बोलचाल की भाषा में इसे श्रीविधी भी कहते हैं।

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एसआरआई विधि से धान की खेती के बारे में जानकारी देते हुए कृषि विभाग के निदेशक ज्ञान सिंह ने बताया "एसआरआई धान बुवाई की ऐसी पद्धति है, जिसमें पानी की कम जरूरत पड़ती है और परंपरागत विधि से धान की बुवाई के मुकाबले इस विधि से 10-30 प्रतिशत तक अधिक पैदावार हो रही है।’’ उन्होंने बताया कि एसआरआई विधि से धान की बुवाई की शुरुआत मेडागास्कर में 1983 में हुई थी। इस विधि से धान की बुवाई करके कई देशों ने धान की पैदावार को बढ़ाने के साथ ही पर्यावरण का संरक्षण भी किया।

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ऐेसे में उत्तर प्रदेश में भी इस विधि से धान की बुवाई किसान करके इसको लेकर प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। धान की फसल के विशेषज्ञ और बिरसा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी रांची के कृषि वैज्ञानिक डॉ. डीएन सिंह ने बताया कि एसआरआई विधि से धान की खेती करने से जहां 50 प्रतिशत तक सिंचाई जल की बचत होती है। वहीं 90 प्रतिशत तक बीज की बचत, मृदा स्वास्थ्य में सुधार और 30 से 40 प्रतिशित तक रासायनिक उर्वरकों कम जरूरत पड़ती है।

ऐसे में इस विधि से धान की खेती में किसानों को पानी, खाद और बीज की कम जरूरत पड़ती है, जिसके नतीजे में खेती की लागत घटती है। देश के जानेमाने पौधा रोग विशेषज्ञ डॉ. हेमचंद्र लाल का कहना है कि एसआरआई पद्धति को धान की खेती में स्थायी उत्पादन पद्धति के रूप में पूरी दुनिया में मान्यता मिल चुकी है।

उत्तर प्रदेश में पिछले खरीफ सीजन- 2016 में 5965.657 हेक्टेयर में धान की खेती हुई थी, जिसमें 14396 मीट्रिक टन धान का उत्पादन हुआ था। धान का उत्पादकता प्रति हेक्टेयर 24.13 कुंतल था। वहीं इस साल खरीफ सीजन 2018 में कृषि विभाग ने 5966.08 हेक्टेयर में धान की बुवाई और धान के उत्पादन का लक्ष्य 15130 मीट्रिक टन रखा है।

खरीफ में धान की खेती।

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उत्तर प्रदेश में पिछले खरीफ सीजन- 2016 में 5965.657 हेक्टेयर में धान की खेती हुई थी, जिसमें 14396 मीट्रिक टन धान का उत्पादन हुआ था। धान का उत्पादकता प्रति हेक्टेयर 24.13 कुंतल था। वहीं इस साल खरीफ सीजन 2018 में कृषि विभाग ने 5966.08 हेक्टेयर में धान की बुवाई और धान के उत्पादन का लक्ष्य 15130 मीट्रिक टन रखा है। साथ ही इस बार धान उत्पादकता का लक्ष्य प्रति हेक्टेयर 25.36 कुंतल रखा गया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कृषि विभाग सिस्टम ऑफ राईस इनटेन्सीफिकेशन विधि से धान की खेती करने के लिए किसानों को जागरूक कर रहा है।

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इस विधि से जल्द तैयार होती है फसल

एसआरआई पद्धति से धान की खेती से एक फायदा यह भी है कि जहां परंपरागत पद्धति के मुकाबले धान की नर्सरी के लिए जहां प्रति हेक्टेयर 6 किलो बीज की जरुरत पड़ती है, वहीं नर्सरी मात्र 8 से लेकर 12 दिन में रोपनी के लिए तैयार हो जाती है। इसके अलावा एसआरआई विधि से धान की खेती दूसरी पद्धतियों के मुकाबले 7 से लेकर 10 दिन पहले ही तैयार भी हो जाती है। इस विधि से धान की खेती के मध्यम और भारी भूमि, जिसमें सिंचाई और जल निकासी की व्यवस्था हो, वहां पर की जा सकती है।

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