सरसों की फसलों को इन कीटों से कैसे बचाएं, इन बातों का रखें ध्यान

Astha SinghAstha Singh   14 Dec 2017 3:00 PM GMT

सरसों की फसलों को इन कीटों से कैसे बचाएं, इन बातों का रखें ध्यानसरसों में लगने वाला माहू कीट।

हरियाणा,राजस्थान,मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की एक प्रमुख फसल है सरसों। यह एक प्रमुख तिलहन फसल है। इसकी खास बात है कि यह सिंचित और बारानी दोनों ही अवस्थाओं में उगाई जा सकती है। पर पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि सिंचित क्षेत्रों में फसल पर बीमारियों का हमला ज्यादा हुआ है, खासकर रसचूसक कीटों और फंगस का, जिससे सरसों उत्पादन में काफी कमी आई है।

केवीके अम्बेडकरनगर के कृषि वैज्ञानिक डॉ रवि प्रकाश मौर्या बताते हैं, "अगर सरसों की खेती वैज्ञानिक तरीके से की जाए और बुवाई से लेकर कटाई तक कुछ विशेष बातों का ध्यान रखा जाए तो फसल को रोगों से बचाया जा सकता है और उपज भी अधिक ली जा सकती है।"

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डॉ मौर्या आगे बताते हैं कि, "दिसम्बर के आखिरी सप्ताह में माहू और कातरा का खतरा बढ़ जाता है । इनपर समय से ध्यान दे दिया जाए तो, सरसों की फसल को बर्बाद होने से बचाया जा सकता है।"

वो बताते हैं कि मुख्यतः 2 तरह के कीड़े सरसों को नुकसान पहुंचाते हैं -

चेपा (माहू/अल)

डॉ मौर्या बताते हैं, "यह कीड़ा हल्के हरे-पीले रंग का 1.0 से 1.5 मि.ली. लम्बा होता है। यह प्रौढ़ एवं शिशु पत्तियों की निचली सतह और फूलों की टहनियों पर समूह में पाये जाते है। इसका प्रकोप दिसम्बर मास के अंतिम सप्ताह में (जब फसल पर फूल बनने शुरू होते हैं) होता है व मार्च तक बना रहता है। यह कीड़े प्रौढ़ व शिशु पौधों के विभिन्न भागों से रस चूसकर नुकसान पहुँचाते है।

लगातार नुकसान करने पर पौधों के विभिन्न भाग चिपचिपे हो जाते हैं, जिन पर काला कवक लग जाता है। परिणामस्वरूप पौधों की भोजन बनाने की ताकत कम हो जाती है, जिससे पैदावार में कमी हो जाती है। कीट ग्रस्त पौधे की वृद्धि रुक जाती है, जिसके कारण कभी-कभी तो फलियां भी नहीं लगती और यदि लगती हैं तो उनमें दाने पिचके एवम् छोटे हो जाती हैं।"

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नियंत्रण कैसे करें

  • समय पर बिजाई की गई फसल (10-25 अक्तूबर तक) पर इस कीट का प्रकोप कम होता है।
  • राया जाति की किस्मों पर चेपा का प्रकोप कम होता है।
  • दिसम्बर के अन्तिम या जनवरी के प्रथम सप्ताह में जहां इस कीट के समूह दिखाई दें, उन टहनियों के प्रभावित हिस्सों को कीट सहित तोड़कर नष्ट कर दें।
  • जब खेत में कीटों का आक्रमण 20 प्रतिशत पौधों पर हो जाये या औसतन 13-14 कीट प्रति पौधा हो जाए तो निम्नलिखित कीटनाशियों में से किसी एक का प्रयोग करें।
  • आक्सीडिमेटान मिथाईल (मैटासिस्टाक्स) 25 ई.सी. या डाइमैथोएट (रोगोर) 30 ई.सी. की 250, 350 व 400 मि.ली. मात्रा को क्रमशः 250, 350 व 400 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ कीट ग्रस्त फसलों पर पहला, दूसरा तथा तीसरा छिड़काव 15 दिन के अन्तराल पर करें।
  • अगर कीड़ों का आक्रमण कम हो तो छिड़कावों की संख्या कम की जा सकती है। छिड़काव सायं के समय करें, जब फसल पर मधुमक्खियां कम होती है। मोटर चलित पम्प में कीटनाशक दवाई की मात्रा ऊपर लिखित होगी ,लेकिन पानी की मात्रा 20 से 40 लीटर प्रति एकड़ हो जायेगी ।

बालों वाली सुण्डी (कातरा)

डॉ मौर्या बताते हैं, "इस कीट की तितली भूरे रंग की होती है, जो पत्तियों की निचली सतह पर समूह में हल्के पीले रंग के अण्डे देती है। पूर्ण विकसित सुण्डी का आकार 3-5 से.मी. लम्बा होता है। इसका सारा शरीर बालों से ढ़का होता है तथा शरीर के अगले व पिछले भाग के बाल काले होते है।"

"इस सुण्डी का प्रकोप अक्तूबर से दिसम्बर तक सरसों की फसल पर ज्यादा रहता है । नवजात सुण्डियां आरम्भ में 8-10 दिन तक समूह में पत्तियों को खाकर छलनी कर देती है तथा बाद में अलग-अलग होकर पौधों की मुलायम पत्तियों, शाखाओं, तनों व फलियों की छाल आदि को खाती रहती हैं ,जिससे पैदावार में भारी नुकसान होता है।"

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नियंत्रण कैसे करें

  • फसल की कटाई के बाद खेत की गहरी जुताई करें ताकि मिट्टी में रहने वाले प्युपे को बाहर आने पर पक्षी उन्हें खा जाएं अथवा धूप से नष्ट हो जाएं ।
  • ऐसी पत्तियां जिन पर अण्डे समूह में होते हैं, को तोड़कर मिट्टी में दबाकर अण्डों को नष्ट कर दें। इसी तरह छोटी सुण्डियों सहित पत्तियों को तोड़कर मिट्टी में दबाकर अथवा केरोसीन या रसायन युक्त पानी में डूबोकर सुण्डियों को नष्ट कर दें।
  • इस कीडे़ का अधिक प्रकोप हो जाने पर 250 मि.ली. मोनोक्रोटोफास या 500 मि.मी. एण्डोसल्फान (थायोडान) 35 ई.सी. या 500 मि.ली. क्विनलफास (इकालक्स) 25 ई.सी.या 200 मि.ली. डाईक्लोरवास (नूवान) 76 ई.सी. को 250 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें ।

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