चकबंदी का चक्रव्यूह पार्ट -2 : नहीं हुई चकबंदी तो भूखे मरने की आ सकती है नौबत

चकबंदी का चक्रव्यूह पार्ट -2 : नहीं हुई चकबंदी तो भूखे मरने की आ सकती है नौबतग्राफिक्स डिजाइन: कार्तिकेय उपाध्याय

गांव कनेक्शन की विशेष सीरीज चकबंदी का चक्रव्यूह के दूसरे भाग में पढ़िए चकबंदी न होने के नुकसान। ये इतनी बड़ी समस्या है कि आने वाले दिनों में देश में अनाज का संकट तक हो सकता है।

सीरीज का पहला भाग यहां पढ़ें- चकबंदी का चक्रव्यूह: भारत में 63 साल बाद भी नहीं पूरी हुई चकबंदी

आजादी के बाद जमीन की पैमाइश को लेकर 1954 में चकबंदी शुरु। जिसका मकसद था, खेती योग्य जमीन को की नापजोख और छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखरे खेतों को एक साथ करना। ताकि किसान एक बड़े खेत में आसानी से सिंचाई आदि का इंतजाम कर सके। इसके साथ ही उस भेदभाव को सीलिंग के माध्यम से मिटाना था, जिसमें एक व्यक्ति के पास सैकड़ों बीघे जमीन थी, जबकि दूसरा भूमिहीन। लेकिन आज 63 साल बाद भी पूरे भारत में चकबंदी नहीं हो पाई है।

चकबंदी नहीं होने के कारण जहां एक तरफ गाँवों में खेतों के जोत छोटे होने से कृषि उत्पादन घट रहा है, वहीं खेत को लेकर विवादों के कारण चकबंदी अधिकारियों के न्यायालयों में हर दिन दर्जनों मामले आ रहे हैं। एक सर्वे के मुताबिक, गाँव का एक किसान हर 20 दिन में चकबंदी कोर्ट का चक्कर लगा रहा है।

ग्रामीणों की अलग-अलग राय

चकबंदी को लेकर गाँवों में लोगों के बीच एक राय नहीं है, कुछ किसानों को जहां इस बात का डर सता रहा है कि चकबंदी से उनकी जमीनें चली जाएंगी, वहीं जिन किसानों के खेत टुकड़ों-टुकड़ों में बंटे हुए हैं, वह चकबंदी को लेकर आवाज उठा रहे हैं।

चकबंदी का विरोध भी और समर्थन भी

पिछले 7 नवंबर को उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के रानेपुर गाँव में शासन के निर्देश पर जब चकबंदी अधिकारी चकबंदी करने गए तो गाँव में चकबंदी के पक्ष और विपक्ष में ग्रामीण बहस करने लगे और चकबंदी टीम को वापस लौटना पड़ा। यह कोई पहला मामला नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश समेत देश के अलग-अलग हिस्सों में चकबंदी के विरोध और समर्थन में जिला अधिकारी कार्यालयों में धरना-प्रदर्शन चल रहा है।

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सिर्फ यूपी में 1 लाख 728 मामले लंबित

चकबंदी प्रक्रिया में धांधली को लेकर प्रदेश के अधिकतर तहसीलों में मामले चल रहे हैं। जौनपुर जिले खुटहन ब्लॉक के बीरमपुर गाँव के किसान संतोष मिश्र बताते हैं, “हमारे गाँव में 1997 में चकबंदी प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन यह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। चकबंदी में जमीनों का सही मूल्यांकन न होने से गाँव के बहुत से किसान भूमिहीन हो गए हैं, इसलिए चकबंदी प्रक्रिया दोबारा शुरू करने की मांग चल रही है।'' चकबंदी निदेशालय उत्तर प्रदेश की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में 1 लाख 728 चकबंदी के मामले लंबित हैं।

दूसरी हरित क्रांति भी नहीं

चकबंदी नहीं होने से देश में दूसरी हरित क्रांति भी नहीं हो पा रही है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की तरफ से बनाई गई डॉ. समर सेन कमेटी ने भी चकबंदी नहीं होने से खाद्यान्न उत्पादन घटने की बात की थी। देश के जाने-माने कृषि अर्थशास्त्री डॉ. समर सेन को पूर्वी भारत में हरित क्रांत को लेकर अपनी रिपोर्ट दी थी। कुछ साल पहले उनकी मौत हो गई।

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चकबंदी की प्रक्रिया को तेज करने की अपील की थी

यह कमेटी भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा बनाई गई थी और इसका मकसद हरित क्रांति को पूर्वी भारत की ओर ले जाने के लिए सलाह देना था। स्वर्गीय सेन ने जमीन के टुकड़ों में बंटने की समस्या की ओर ध्यान आकृष्ट किया था और इसे एक प्रमुख समस्या करार दिया था। उन्हेंने चकबंदी की प्रक्रिया को तेज करने का कहा था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

1.2 हेक्टेयर तक रह गया जोत का औसत आकार

कृषि मंत्रालय की राष्ट्रीय कृषि विकास योजना की रिपोर्ट के अनुसार, देश में कृषि भूमि की जोत का औसत आकार पहले ही घटकर 1.2 हेक्टेयर तक रह गया है। अधिकांश खेती की जमीन बेहद छोटे टुकड़ों में बंटी हुई है और वहां खेती करना अव्यावहारिक हो रहा है। चकबंदी के जरिए जमीन के छोटे टुकड़ों को मिलाने से कृषि उत्पादकता को बढ़ाने वाले उपायों में निवेश बढ़ाया जा सकेगा, जिसकी बदौलत कृषि उत्पादन में वृद्धि होगी। इस रिपोर्ट के अनुसार 50 के दशक में अविभाजित पंजाब राज्य ने चकबंदी के जरिए ही जोतों की संख्या को ऐसा कम किया, जिसने आगे चलकर हरित क्रांति के लिए प्रेरणा का काम किया।

सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा लघु और सीमांत किसानों को

कृषि में चकबंदी की अहमियत को समझते हुए चार दिन पहले ही बिहार सरकार ने अपने तीसरे कृषि रोडमैप (2017-22) को लांच करते हुए अब सरकार का जोर चकबंदी की तरफ है। बिहार सरकार एरियल सर्वे के जरिए भूमि रिकार्ड को दुरुस्त करने के साथ ही चकबंदी पर काम करने जा रही है। चकबंदी से खेत का आकार बड़ा होगा, जिसका सबसे ज्यादा लाभ लघु और सीमांत किसानों को होगा।

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