ध्यान न दिया तो लुप्त हो जाएंगी धान की देसी किस्में

ध्यान न दिया तो लुप्त हो जाएंगी धान की देसी किस्मेंप्रतीकात्मक फोटो

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह किसानों का रुझान नए हाइब्रिड बीजों की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। इसके चलते किसान फसलों की खास किस्मों को भूल रहे हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि धीरे-धीरे ये किस्में गायब हो रहीं हैं।

ऐसे भी कई किसान हैं, जो धान की पुरानी किस्मों को सहेजे हुए हैं। फैजाबाद ज़िले के किसान राकेश दूबे ने 4.2 हेक्टेयर में काला नमक, काला भात, जवा फूल, चिन्नावर जैसी धान की किस्मों को लगाया है।

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राकेश दूबे बताते हैं, “धान, गेहूं की ऐसी बहुत सी परंपरागत किस्में हैं जिनकी खेती किसानों ने छोड़ दी है, अब सब हाइब्रिड धान लगाते हैं। इस बार मैंने सिद्धार्थनगर जिले की सुगंधित किस्म काला नमक, औषधीय गुणों वाली किस्म काला भात और छत्तीसगढ़ की दो किस्मों जवा फूल और चिन्नावर लगाई है। इन किस्मों को लगाने से ज्यादा उत्पादन तो नहीं मिलता, लेकिन अच्छी किस्म का धान तो हो जाता है।”

करीब 10 वर्ष पहले भारत सरकार ने फिलीपीन्स स्थित धान अनुसंधान संस्थान (इर्री) की तर्ज पर सीड बैंक बनाने की योजना को हरी झंडी दी थी। इसकी मदद से प्रदेश में विलुप्त होती सैकड़ों प्रजातियों को सुरक्षित रखा जा सकता था पर हाइब्रिड फसलों के चलन से लोग परम्परागत किस्मों को भूलते जा रहे हैं।

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धान की विलुप्त होती प्रजातियों को संरक्षित करने की योजना बनाई गई, पर पिछले 10 वर्षों से ये योजना ठण्डे बस्ते में है। सिद्धार्थनगर जिले में किसानों के लिए काम करने वाली गैर सरकारी संस्था शोहरतगढ़ इनवायरमेंट सोसाइटी ऐसी किस्मों को बचाने की पहल कर रही है। संस्था ये संस्था किसानों को जैविक विधि से काला नमक की खेती का प्रशिक्षण के साथ ही बाजार भी उपलब्ध कराया जाता है।

ये हैं उत्तर प्रदेश की धान की पुरानी किस्में

  • सिद्धार्थ नगर- बस्ती का काला नमक, काला जीरा, जूही बंगाल, कनक जीरा, धनिया और मोती बदाम
  • इलाहाबाद के कोरांव का सोना चूर्ण
  • सुल्तानपुर चन्दौली का शक्कर चीनी, जिरिंग साम्भा,
  • प्रतापगढ़ का लालमनी
  • रायबरेली, फैजाबाद,
  • बहराइच का नामचुनिया, दुबराज, बादशाह पसंद, शक्कर चीनी, विष्णु पराग

शोहरतगढ़ इनवायरमेंट सोसाइटी के देवेन्द्र सिंह बताते हैं, “संस्था की मदद से शोहरतगढ़ और बर्डपुर ब्लॉक में किसानों को काला नमक किस्म के संरक्षण के लिए प्रशिक्षण भी दिया गया है। काला नमक की पौष्टिकता को देखते हुए भारत सरकार व प्रदेश सरकार भी काला नमक को बढ़ावा देने का कार्यक्रम चला रही है।”

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धान की परंपरागत फसलों को बचाने के लिए लखनऊ के रहमान खेड़ा स्थित कृषि प्रबंध संस्थान में बकायदा काम भी शुरू हुआ था, लेकिन दो वर्षों के बाद ही बजट की कमी से कार्य रोक दिया गया। इस योजना के तहत तय किया गया था कि विलुप्त होती प्रजातियों को संरक्षित कर वैज्ञानिक मान्यता दिलाने के साथ-साथ उनका बौद्धिक सम्पदा अधिकार (आईपीआर) में पंजीकृत भी कराया जाएगा, लेकिन योजना कारगर नहीं हुई।

जैविक खेती करने वाले किसानों के लिए अच्छी खबर

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