मछली पालन में इन बातों का रखें ध्यान 

मछली पालन में इन बातों का रखें ध्यान प्रतीकात्मक तस्वीर।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। मछली पालन का व्यवसाय शुरू करते समय कई बार पालक सही ध्यान नहीं देते हैं, जिससे लागत तो लग जाती है, लेकिन मुनाफा नहीं मिल पाता, कई बार तो नुकसान भी उठाना पड़ता है। इसलिए तालाब निर्माण करते समय मुख्य बातों का ध्यान रखना चाहिए।

तालाब का निर्माण ऐसे स्थान पर करना चाहिए, जहां की मिट्टी में अच्छी उर्वराशक्ति हो और जल का रिसाव न हो। तालाब ऐसे स्थान में निर्मित करना चाहिए, जहां मीठे जल के स्रोत हों और उनके क्षतिग्रस्त होने की संभावना न हो। तालाब निर्माण करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना आवश्यक होता है कि मत्स्य पालन की आवश्यक सामग्री भी सहजता से प्राप्त हो जाए।

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डॉ. गोविंद कुमार वर्मा, वैज्ञानिक (पशु पालन एवं मत्स्य) कहते हैं, “मछली पालन की सही जानकारी के लिए जनपद में स्थित सहायक निदेशक मत्स्य/मुख्य कार्यकारी अधिकारी मत्स्य पालक विकास अभिकरण के कार्यालय से सम्पर्क किया जा सकता है। साथ ही मण्डल के मण्डलीय उप निदेशक मत्स्य कार्यालय से भी सम्पर्क कर जानकारी प्राप्त की जा सकती है। मछली पालन के बीज के लिए जनपद के मत्स्य पालक विकास अभिकरण से सम्पर्क किया जा सकता है। जहां से मत्स्य बीज का पैसा जमा कराने पर अभिकरण द्वारा मत्स्य विकास निगम की हैचरी से मत्स्य बीज प्राप्त कर मत्स्य पालक के तालाब में डाला जाता है। इसके साथ ही मत्स्य पालक जनपदीय कार्यालय में मत्स्य बीज का पैसा जमा कराकर सीधे निगम की हैचरी से अपने साधन से मत्स्य बीज तालाब में डाल सकता है।”

नए तालाबों का मत्स्य पालन के लिए वैज्ञानिक तरीके से निर्माण किया जाए और पुराने तालाबों को यथासंभव समतल कर मत्स्य पालन के लिये उपयुक्त बना लिया जाए। छोटे स्तर पर जो तालाब निर्मित किये जाते हैं, वे दो प्रकार के होते हैं।

प्रजनन तालाब

प्रजनन तालाबों का आकार आवश्यकतानुसार 0.5 से 2.0 हेक्टेयर होता है और गहराई दो से तीन मीटर तक होनी चाहिए ताकि मत्स्य प्रजनन का प्रबंधन सहजता से हो सके।

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नर्सरी तालाब

नर्सरी तालाब छोटे तथा मौसमी होते हैं। इन नर्सरी तालाबों में जीरो के आकार से पौने आकार के मछलियों के बीजों का पालन किया जाता है। सामान्यत: इन तालाबों का आकार 0.01 से 0.04 हेक्टेयर और उनकी गहराई 1.0 से 1.5 मीटर होती है ताकि तालाब में मछलियों के बीजों का पालन सहजता से किया जा सके। इन तालाबों के अतिरिक्त प्रजनन और नर्सरी तालाबों के अतिरिक्त दो अन्य इनसे कुछ बड़े तालाब होते हैं ये दो प्रकार के होते हैं।

विरल (रेयरिंग) तालाब

विरल तालाब में इन तालाबों में छोटी मछलियों (फ्राई) का परिपालन और संवर्धन किया जाता है। ऐसे तालाबों में अंगुलिकाएं (फिंगरलिंग) तैयार की जाती है। इन विरल तालाबों का आकार 0.04 -0.1 हेक्टेयर तथा गहराई 1.5-2.0 मीटर होती है।

संचयक (स्टाकिंग) तालाब

संचयक अथवा मछली पालन वाले तालाब आकार में बड़े होते हैं तथा इन तालाबों में मछलियों का पालन उस समय तक किया जाता है जब वे पुष्ट व खाने योग्य न हो जाएं। ऐसे तालाबों का आकार और क्षेत्रफल 0.5 से 2.0 हेक्टेयर और गहराई 2.0-2.5 मीटर तक होती है।

तालाबों के बांध बहुत मजबूत होने चाहिए ताकि वे जल के भराव को सह सकें। इन तालाबों में सामान्यत: तालाब की निचली सतह से ऊपरी जल सतह के मध्य 2:1 का अनुपात रखा जाता है। तालाब बनाने के लिए 15-25 प्रतिशत रेतीली, 60-80 प्रतिशत बलुई और 8-15 प्रतिशत चिकनी मिट्टी उपयुक्त किया जाता है। ऐेसे तालाबों के लिये जलाशय, नहर आदि से पानी प्राप्त किया जाता है। प्राकृतिक जल स्रोतों की भूमिका इस कार्य में महत्वपूर्ण होती है। यदि जल का अभाव प्रतीत हो तो ट्यूबवेल से जल की आपूर्ति की जा सकती है।

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मिट्टी की गुणवत्ता और उसकी रसायनिक तात्विकता

मछली पालन के लिये चिकनी तथा दोमट मिट्टी ही सभी दृष्टियों से उत्तम होती है। ऐसी मिट्टी में जल का रिसाव बहुत कम होने के साथ-साथ बांध भी मजबूत बनते हैं। तालाब की मिट्टी मछली पालन के लिये उपयुक्त है या नहीं, इसका परीक्षण सहज रीति से किया जा सकता है। इसके परीक्षण के लिये थोड़ी सी मिट्टी हाथ में लेकर उसे दबाकर गेंद के आकार में गोल बना लें। उसे ऊपर उछालकर फिर अपने हाथों में पकड़ लें। इस प्रक्रिया में यदि मिट्टी की गेंद टूटकर बिखरती नहीं है तो यह मिट्टी मछली-पालन के लिये उपयुक्त होती है। मिट्टी की क्षारीयता तथा अम्लीयता आदि का भी परीक्षण कर लेना चाहिए। उपर्युक्त तालिका के आधार पर मछली पालन के लिये मिट्टी की उपयुक्तता का परीक्षण किया जा सकता है। यदि तालाब में अधिक रिसाव हो तो उसे गोबर, रसायन (वेन्टोनाइट) अथवा पॉलीथिन से रोका या कम किया जा सकता है, पॉलीथिन का उपयोग इस दिशा में बहुत कारगर सिद्ध होता है।

पानी की गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता

जिस तालाब में मत्स्य पालन का कार्य संपादित किया जाए, वहां तालाब का जलस्तर 2.0 मीटर होना चाहिए। नर्सरी तालाब में यह कम से कम 1.0-1.5 मीटर होना आवश्यक है। मछली पालन का कार्य आरंभ करने के पूर्व पानी के रंग और उसकी पारदर्शिता का परीक्षण कर लेना आवश्यक होता है। यदि पानी का रंग नीला अथवा हरा होता है तब यह तथ्य सहज ही समझ लेना चाहिए कि तालाब में हरी अथवा नीली शैवाल का फैलाव है।

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ऐसा जल अधिक उत्पादन देने वाला होता है। यदि पानी बहुत अधिक मटमैला होता है, तो उस पानी में जलीय भोज्य पदार्थो का उत्पादन नहीं हो सकता है, लेकिन खाद तथा कृत्रिम आहार की सम्पूर्ति कर ऐसे जल को मछली-पालन के योग्य बनाया जा सकता है।

जल का परीक्षण प्रयोगशाला में आसानी से हो जाता है, इससे पता चल जाता है कि पानी में ऑक्सीजन, कार्बन डाईऑक्साइड, पीएच, (अम्लीयता) नाइट्रोजन, और फास्फेट्स की कितनी मात्रा उपलब्ध है। पीएच की जांच के लिये पीएच पेपर का भी उपयोग किया जा सकता है। रंग की जांच विभिन्न रंगों के रंगफलक या चार्ट के द्वारा कर ली जाती है। इससे पीएच. मान और मात्रा का परीक्षण हो जाता है। मत्स्य पालन के लिए जल में घुली हुई ऑक्सीजन भी एक उत्पादन के लिए एक महत्वपूर्ण कारक है।

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