प्रभात, सरोज और गौतम से बढ़ेगी बोरोधान की खेती

प्रभात, सरोज और गौतम से बढ़ेगी बोरोधान की खेतीधान की रोपाई।

लखनऊ। खरीफ की सबसे प्रमुख फसल धान की खेती अब रबी सीजन में की जा रही लेकिन इससे जितनी ऊपज प्राप्त होनी चाहिए नहीं मिल रही है। ऐस में बोरोधान की खेती के लिए कृषि विभाग की तरफ से प्रभात, सरोज और गौतम जैसी प्रजातियों की खेती किसानों से करने की सलाह दी गई है।

गोविंद बल्लभ पंत कृषि और प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ. आरपी सिंह ने बताया, ''बोराधान की खेती को लेकर कृषि वैज्ञानिकों ने कई रिसर्च करके बोरोधान की कई प्रजातियां विकसित की हैं, किसान इन प्रजातियों का बोरोधान लगाकर अधिक उपज ले सकते हैं।''

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उन्होंने बताया कि बोरोधान की खेती के लिए जरई यानि पौध डालने का समय 15 अक्टूबर से लेकर 15 नवंबर तक होता है। डेढ़ से लेकर दो महीने में नर्सरी के लिए डाले गए धान रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं। बोरोधान की नर्सरी डालने के लिए डेपोग मेथड से पौध तैयार करना अच्छा रहता है। इस विधि से पौध कहीं भी छत या बड़ी आकार की लोहे या लकड़ी के बने पनारे (ट्रे) पर तैयार की जाती है। अंकुरित बीज को एक इंच मोटी मिट्टी की सतह पर फैला देते है। इस सतह को हल्के हाथों से कुछ थपथपा देते है और इससें पानी छिड़क कर नमी बनाए रखते हैं। इस विधि से पौध उगाने में ठंडक से हानि की संभावना कम हो जाती है।

बोरोधान की रोपाई से पहले खेत की तैयारी पर विशेष ध्यान देना होता है। जिस खेत में रोपाई करनी होती है उसे कम से कम दो जुताई करके मजबूत मेड़ बनाना होता है। इसके बाद 10 टन गोबर की सड़ी खाद प्रति हेक्टेयर बिखेर कर जुताई और पाटा लगा देते हैं।

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बोरोधान की रोपाई के लिए अनुकूल तापमान 13-14 सेंटीग्रेड होना चाहिए। ऐसा तापमान औमतौर पर 15 जनवरी से 15 फरवरी के बीच होता है। ऐसे में किसानों को इस समय ही बोरोधान की रोपाई करनी चाहिए।

नेपाल की सीमा से सटे महराजगंज जिले के गांगी बाजार के भेड़िया टोला गांव के किसान मनोज कुमार ने कहा, ''मेरे खेत के पास से पानी की बड़ी नहर गुजरती है जिसके कारण उसके पास स्थित मेरे खेतों में सालभर पानी का जलजमाव रहता है। जिसके कारण मैं इसमें सामान्य तौर पर न तो गेहूं की खेती कर पाता हूं और ना ही धान की। ऐसे में पिछले कई सालों से मैं बोरोधान की खेती कर रहा हूं। इसकी पैदावार भी अच्छी हो रही है।''

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गोरखपुर जिले के सदर तहसील के मानीराम गांव में भी बड़ी मात्रा में बोरोधान की खेती की जा रही है। इस गांव किसान रामभुअल निषाद ने बताया कि गांव में बहुत बड़ा ताल है जिसके कारण से बरसात में गांव के बाहर का तीन हिस्सा पानी में डूब जाता है। बरसात का मौसम खत्म होते ही यह पानी हटने लगता है। लेकिन उसके बाद भी पूरा पानी नहीं हट पाता है ऐसे में यहां पर बोरोधान की खेती हो रही है।

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उत्तर प्रदेश के 3 हजार हेक्टेयर ऐसे क्षेत्र जहां पर जलजमाव के कारण कारण सामान्य खरीफ और रबी की फसल नहीं हो पाती थी, वहां पर बोरोधान धान की खेती करके किसान अधिक लाभ कमा सकते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया, देवरिया, गोरखपुर, बस्ती, सिद्धार्थनगर, मिर्जापुर, वाराणसी और गाजीपुर ऐसे जिले हैं जहां पर बोरोधान धान की खेती सालों से हो रही है। इसके अलावा नेपाल सीमा से लगे उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्रों में सदियों से बोरोधान की खेती की जा रही है।

बोरोधान की फसल 140 से लेकर 155 दिनों में तैयार हो जाती और प्रति हेक्टेयर इसकी औसत उपज 35 से लेकर 65 कुंतल प्रति हेक्टेयर होती है।

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