वो खेतों में दिन दिन भर पसीना बहाती हैं.. लेकिन किसानी का दर्ज़ा नहीं

वो खेतों में दिन दिन भर पसीना बहाती हैं.. लेकिन किसानी का दर्ज़ा नहींमंदसौर में शहीद किसान स्मृति सम्मेलन के दौरान प्रतिमाओं का किया गया अनावरण। फोटो : प्रभात सिंह

नई दिल्ली। ग्राम्य जीवन में महिलाओं की स्थिति और रोज़मर्रा के काम में उनके योगदान के बारे में बाहर की दुनिया के लोग सिर्फ अंदाज़ लगा सकते हैं। घर की ज़िम्मेदारियों के साथ ही खेती-बाड़ी के काम में उनके बराबर शरीक रहने और खटने के बावजूद उन्हें वह दर्जा हासिल नहीं है, जिसकी वे सचमुच हक़दार हैं। इसकी तमाम वजहें हो सकती है मगर पितृसत्ता और सामाजिक मान्यताओं की इसमें प्रमुख भूमिका है। पिछले दिनों देश के उत्तरी और दक्षिणी राज्यों में यात्रा के दौरान ऐसे कई अनुभव हुए, जो उनके श्रम के साथ ही उनके जीवट की मिसाल हैं।

आंध्र प्रदेश के सूखाग्रस्त इलाके अनंतपुर में हुई किसानों की एक सभा में आगे की कुर्सियों पर बैठी कई महिलाओं को देखा, जिनकी गोद में तस्वीर थी। ये तस्वीरें उनके पति की थीं, बैंक और साहूकार का क़र्ज़ नहीं चुका पाने के दबाव और हताशा की वजह से जिन्होंने जान दे दी। ऐसी ख़बरें हम पिछले वर्षों में सुनते-पढ़ते आए हैं मगर उन महिलाओं को सामने पाकर कोई भी उनकी तकलीफों के बारे में सोचने को मजबूर होगा। पति के नहीं होने पर उनके हिस्से में अपनी ज़िम्मेदारियों के साथ पति के हिस्से के दायित्व और खेती के काम भी आ गए हैं।

ऐसी सभाओं में उनकी मौजूदगी दरअसल वह उम्मीद है कि शायद उनकी व्यथा सरकार तक पहुंच सके और सत्ता में बैठे लोग उनकी इतनी मदद कर सकें कि जीवनयापन अपेक्षाकृत आसान हो जाए। ऐसे किसी वायदे से थोड़ी देर के लिए ही सही, उनकी आंखों में चमक लौट आती है, उम्मीदें मज़बूत हो जाती हैं।

इसी सभा में एक बुजुर्ग रमन्ना भी बैठे थे, जिनके हाथ में उनकी पत्नी वेंकटम्मा की तस्वीर थी। बुजुर्ग के पास तीन एकड़ खेत हैं मगर वेंकटम्मा को इसलिए जान देनी पड़ी क्योंकि उनके पति साहूकार का पौने तीन लाख रुपये और बैंक का पचास हजार रुपये का कर्ज़ और ब्याज़ नहीं चुका सके थे। और यह कर्ज़ उनके पति के नाम नहीं, वेंकटम्मा के नाम था। इसे किसी क्षणिक आवेश में किया हुआ त्याग मान लेना क्या सचमुच वेंकटाम्मा की स्थिति का समुचित मान होगा?

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इसके कुछ रोज़ पहले ही हम मंदसौर के टकरावद और चिल्लोद पिपलिया गाँवों में थे। इन गाँवों के दो किसान छह जून को पिपलिया मंडी में किसान आंदोलन के दौरान पुलिस की गोली से मारे गए थे। लोगों ने उनकी याद में गाँव के चौक पर उनकी प्रतिमाएं लगाने का फैसला किया था। उस रोज़ इन प्रतिमाओं का अनावरण होना था। टकरावद में बरगदेश्वर मंदिर परिसर की सभा में मैंने ग़ौर किया कि मंच से बबलू पाटीदार का ज़िक्र होते ही महिलाओं की भीड़ में एक महिला की आंखें डबडबा गईं।

अपने बच्चे को चुप कराने के लिए वह उसे दूध पिलाकर रही थीं मगर लोगों से अपनी आंखें छिपाने के लिए वह बार-बार अपनी धोती से पोंछ रही थीं। मैंने दिलीप पाटीदार से उनके बारे में पूछा तो मालूम हुआ, वह बबलू की बहन हैं। मूर्ति के अनावरण के वक्त माला पहनाते हुए बबलू की मां गले लगकर फफककर पड़ीं तो घर की और महिलाएं भी। बबलू की शहादत पर नारे लगाने वाले या फिर बाहर से गए हुए नेताओं के वक्तव्य उन महिलाओं को क्या सचमुच इतनी तसल्ली दे सकते हैं कि वह जिन्दगी भर के इस अभाव को भूल सकें?

चिल्लोद पिपलिया में कन्हैया पाटीदार की मूर्ति के अनावरण से पहले देखा कि उनकी मां ने अपने आंचल में बांधकर रखे एक सौ एक रुपये निकालकर मूर्ति के आगे रखते हुए हाथ जोड़ लिए थे। किसी मां के लिए अपने बेटे, किसी महिला के लिए अपने पति को यूं प्रतिमा की शक्ल पाने को दु:ख क्या सचमुच कोई और महसूस कर सकता है? चिल्लोद की सभा में ही बोलते वक्त किसी नेता ने सामने महिलाओं को बैठे देखा तो आग्रह किया कि महिलाएं आगे आकर मंच साझा करें क्योंकि इसके बिना आंदोलन को पूर्णता नहीं नहीं मिलेगी।

उम्मीद के उलट कई महिलाएं सामने से उठकर आईं और मंच पर बैठ गईं। आंदोलन के लिए फैसलों के बारे में सहमति जताने के लिए वे हाथ ज़रूर उठातीं मगर चेहरे पर पड़ा घूंघट उठाने की उन्हें ज़रूरत नहीं लगी। आंदोलन में शिरकत की सहमति उनका साहस है और घूंघट सामाजिक मान्यता। और वहीं क्यों, रास्तों पर चलते वक्त, खेतों में काम करने वक्त भी तो वे यह समन्वय बनाए रखती हैं।

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