गिरता पारा घटा देगा आलू और मटर का उत्पादन, किसान ऐसे करें बचाव

गिरता पारा घटा देगा आलू और मटर का उत्पादन, किसान ऐसे करें बचावफोटो साभार: गूगल।

लखनऊ। तापमान में हो रही भारी गिरावट से ठंड और कोहरे से जनजीवन पर असर पड़ रहा है, लेकिन अगर ऐसे ही पारा गिरता रहा तो इसको सबसे ज्यादा असर रबी सीजन की दलहनी फसलों के साथ ही आलू पर पड़ेगा। तापमान कम होने से मटर, चना और आलू की फसलों पर पाला रोग का खतरा मंडराने लगा है। ऐसे में भारतीय दहलन अनुसंधान संस्थान और केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने पाला रोग से 'इन फसलों को कैसे बचाया जाए' इसके लिए बुलेटिन जारी किया है।

रोग होने पर घट सकता है उत्पादन

तापमान कम होने के साथ ही जैसे ही ठंड बढ़ती है और तापमान 10 डिग्री से कम होने लगता है वैसे ही पाला पड़ना शुरू हो जाता है। पाला रोग में आलू की पत्तियां सूख जाती है। इस बारे में जानकारी देते हुए आलू अनुसंधान संस्थान के संयुक्त निदेशक और प्रधान कृषि वैज्ञानिक डा. मनोज कुमार का कहना है कि जब वातावरण का तापमान 10 डिग्री सेल्सियस या इससे कम हो, आद्रर्ता 80 प्रतिशत से ज्यादा हो, कोहरा हो और थोड़ी बहुत बूंदाबादी हो तो पाला यानि झुलस रोग तेजी से फसलों की अपनी चपेट में लेता है। इसमें पत्तियां पीली होकर निर्जीव हो जाती हैं और अगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो पूरी पत्तियां सूख जाती हैं। जिससे पूरी फसल चौपट हो जाती है। उत्तर प्रदेश में इस साल 6 लाख 25 हजार हेक्टेयर में आलू की बुवाई की गई है। इस साल आलू उत्पादन का अनुमानित लक्ष्य 147 लाख मीट्रिक टन है। लेकिन अगर पाला रोग हो गया तो उत्पादन घट जाएगा।

चना और मटर पर भी पाला का असर

ठंड बढ़ने के साथ ही चना और मटर जैसी दलहनी फसलों पर भी पाला रोग की आशंका ज्यादा है। भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान के कृषि वैज्ञानिक डा. आईपी सिंह ने बताया कि इस साल दिसंबर के 10 दिनों में ही जैसी ठंड पड़ने लगी है, उसको देखते हुए दलहनी फसलों पर पाला का खतरा पिछले साल से ज्यादा है। उन्होंने कहा कि दलहनी किसानों को इस मौसम में ज्यादा सावधानी बरतने की जरुरत हैं। उन्होंने बताया कि जब तापमान 6 डिग्री के आसपास हो जाता है और फसलों के आसपास घना कोहरा हो जाता है तो रात्रि में 3 बजे से लेकर 5 बजे तक पाला पड़ने की संभावना सबसे ज्यादा होता है।

किसानों को बताया उपाय

डा. आईपी सिंह ने बताया कि झुलस रोग पहचाने के लिए यह जरूरी है कि किसान खेतों में अपनी सक्रियता बनाए रखें। उन्हें खेत में कहीं भी अगर फसल की पीली होती पत्तियां दिखाई दें तो उसे तुरंत खेत से निकालें दें, झुलसा रोग के लिए जो दवाएं बताई जा रही हैं उनका छिड़काव करें। उन्होंने बताया कि मैंकोजेब या जिनेब दवा को ढाई ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल तैयार करके छिड़काव करें। ऐसे करने से पाला रोग नहीं फैलेगा।

समय-समय पर हल्की सिंचाई करते रहे

पाला से फसलों को बचाने के लिए कृषि वैज्ञानिक डा. आईपी सिंह ने बताया कि पाला से फसलों को बचाने के लिए खेत में नमी का होना जरूरी है। ऐसे में किसानों को चाहिए कि वह इस मौसम में समय-समय पर खेतों में हल्की सिंचाई करते रहें। इससे आसपास के तापमान फसलों के अनुकूल बना रहेगा और पाला का असर नहीं रहेगा। उन्होंने इसके अलावा पाला से बचाने के लिए किसानों को सलाह दी है कि अगर संभव हो सके तो किसान अपने खेतों के चारों तरफ धुंआ करें। इससे तापमान अच्छा रहेगा और पाला का असर फसलों पर नहीं होगा।

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