कम पानी  और कम यूरिया में धान की खेती के लिए वैज्ञानिकों ने किसानों को दिए सुझाव

कम पानी  और कम यूरिया में धान की खेती के लिए वैज्ञानिकों ने किसानों को दिए सुझावधान की खेती में ज्यादा पानी के इस्तेमाल से खतरनाक मीथेन गैस का होता है उत्पादन।

धान की खेती में पानी ज्यादा लगने से जहां किसानों की लागत बहुत आती है वहीं खतरनाक मिथेन गैस का उत्सर्जन भी होता है। वैज्ञानिकों का कहना है किसान अगर पानी भरकर धान लगाने की अपेक्षा किसान अंकुरित बीज बुआई का प्रयोग करें तो लागत काफी कम हो जाएगी

लखनऊ। राष्ट्रीय खाद्यान उत्पादन में उत्तर प्रदेश का विशेष योगदान है। देश के कुल खाद्य उत्पादन में इसका हिस्सा 19 प्रतिशत है लेकिन पिछले एक दशक से उत्तर प्रदेश में खाद्यान्न उत्पादकता में ठहराव आ गया है। जिसका प्रमुख कारण धान की खेती में मीथेन गैस का होने वाला उत्सर्जन है।

उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार प्रदेश में जल जमाव वाले क्षेत्रों में धान की खेती और फसलों में नाइट्रोजन के अधिक इस्तेमाल से मीथेन गैस का उत्सर्जन बढ़ रहा है और फसलों की पैदावार घट रही है। डाॅ. मिल्खा सिंह औलख, पूर्व कुलपति, बांदा कृषि विश्वविद्यालय ने बताया कि '' जलवायु परिवर्तन में मीथेन गैस बड़ी भूमिका निभा रही है। जिसका कृषि पर प्रभाव पड़ रहा है। जल प्लावित क्षेत्रों में धान की खेती से अधिक मीथेन गैस पैदा हो रही है। यह एक ग्रीन हाउस गैस है जो जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार मानी जाती है। ''

उत्तर प्रदेश में मीथेन गैसे के उत्सर्जन को कम करने और जलवायु परिवर्तन के कारण यहां की फसलों पर पड़ रहे प्रभाव को लेकर पिछले दिनों उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद में देशभर में वैज्ञानिकों ने मंथन किया। जिसमें धान की फसल खेती से उत्सर्जित हो रहे मीथेन को कम करने और पर्यावरण में उपलब्ध कार्बन-डाई-आक्साईड गैस की मात्रा को कम करने के उपायों को लेकर कृषि वैज्ञानिकों ने सुझाव दिए। इस अवसर पर उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक प्रो. राजेन्द्र कुमार ने बताया '' धान की खेती में अधिक पानी की खपत और इसके कारण उत्सर्जित होने वाले मीथेन गैस को रोकने के लिए धान खेती की खेती उन विधियों से की जाए जिसमें पानी कम लगे और मीथेन गैस भी उत्सर्जित न हो। '' उन्होंने बताया कि धान की खेती के लिए कई ऐसी तकनीक आ गई है जिसकी मदद से खेतों में पानी का इस्तेमाल काफी हद तक कम किया जा सकता है।

धान: अच्छे उत्पादन के लिए वैज्ञानिकों की सलाह।

चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कानपुर के पूर्व कुलपति डा.एम.एम. अग्रवाल ने बताया कि धान की खेती में मीथेन गैस का उत्सर्जन एक बड़ी समस्या बन रही है ऐसे में ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन को कम करने के लिये बैम्बू प्लाण्टेशन पर जोर दिया जाए। इसके साथ ही फसलों में संतुलित नाइट्रोजन का इस्तेमाल किया जाए।

प्रदेश में कुछ दिनों बाद ही खरीफ का सीजन शुरू होगा इसके लिए 15 मई के बाद से ही किसान खेतों में तैयारी शुरू कर देंगे। ऐेस में इस बार धान की खेती में पानी का कम इस्तेमाल हो इसको लेकर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने किसानों के बीच धान की बुवाई की उन तकनीकों को अपनाने की सलाह दी है जिसमें पानी का इस्तेमाल कम हो। जलवायु परिवर्तन से किसान कैसे निपटे इसके लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने '' स्मार्ट प्रैक्टिस एंड टेक्नोलाजी फॉर क्लाइमेट रिसाइलेंट एग्रीकल्चर नामक किताब का प्रकाशन किया है। '' जिसमें धान की खेती करने वाले किसानों को धान की बुवाई की नई तकनीकों के बारे में बताया गया है। इसके अनुसार धान की रोपनी बुवाई से अलग धान के बीज की सीधी बुवाई और अंकुरित बीज की बुवाई की विधि के बारे में बताया गया है।

जलवायु परिवर्तन से किसान कैसे निपटे इसके लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने '' स्मार्ट प्रैक्टिस एंड टेक्नोलाजी फॉर क्लाइमेट रिसाइलेंट एग्रीकल्चर नामक किताब का प्रकाशन किया है। '' जिसमें धान की खेती करने वाले किसानों को धान की बुवाई की नई तकनीकों के बारे में बताया गया है।

ये भी पढ़ें- देश में दालों की बंपर पैदावार, लेकिन किसान निराश

नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्यागिक विश्वविद्यालय फैजाबाद के एग्रोमेट्रोलॉजी, विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डा. पद्माकर त्रिपाठी ने बताया कि धान की रोपनी विधि से बुवाई करने में पानी की अधिक जरूरत होती है। ऐसे में अगर सीधी बुवाई और अंकुरित बीज बुवाई विधि का धान किसान अपनाएं तो मीथेन गैस का उत्सर्जन कम हो जाएगा। उन्होंने बताया कि धान की सीधी बुवाई बससे बड़ा फायदा यह है इसमें पानी की कम जरूरत पड़ती है। पंजाब जैसे राज्यों में इस तकनीक से धान की बुवाई के अच्छे परिणाम मिले हैं। देश के दक्षिणी राज्यों में जहां बुवाई के वक्त पानी कम रहता है वहां पर ड्रम के जरिए अंकुरित बीजों की बुवाई तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस तकनीक में धान के बीज को रातभर पानी में भिगोकर रख दिया जाता है। ताकि वह अच्छे से अंकुरित हो जाएं। उसके बाद फाइबर से बने छेद वालों ड्रमों की मदद से इसे खेत में बोया जाता है।

खेती किसानी से जुड़ी सभी बड़ी खबरों के लिए यहां क्लिक करके इंस्टॉल करें गाँव कनेक्शन एप

धान में पानी के साथ किसान बहुत ज्यादा यूरिया का इस्तेमाल होता है जो मीथेन गैस का उत्सर्जन कर बड़ी समस्या पैदा कर रहा है। इलके लिए बैम्बू प्लाण्टेशन पर जोर दिया जाए। इसके साथ ही फसलों में संतुलित नाइट्रोजन का इस्तेमाल किया जाए। जिससे नाइट्रस आक्साइड कम पैदा हो।
डा.एम.एम. अग्रवाल, पूर्व कुलपति, चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय

चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कानपुर के पूर्व कुलपति डा.एम.एम. अग्रवाल ने बताया कि धान की खेती में मीथेन गैस का उत्सर्जन एक बड़ी समस्या बन रही है ऐसे में ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन को कम करने के लिये बैम्बू प्लाण्टेशन पर जोर दिया जाए। इसके साथ ही फसलों में संतुलित नाइट्रोजन का इस्तेमाल किया जाए। जिससे नाइट्रस आक्साइड कम पैदा हो। उपकार के महानिदेशक डा. राजेन्द्र कुमार ने बताया कि जल प्लावित क्षेत्रों में धान की खेती न करके अंतरिम सिंचाई से अथवा अपलैंड में धान उत्पादन को प्रोत्साहित किया जाए जिससे मीथेन का उत्सर्जन कम हो। साथ ही ईको फ्रेंडली कृषि को बढ़ावा दिया जाए।

जल प्लावित क्षेत्रों में धान की खेती न करके अंतरिम सिंचाई से अथवा अपलैंड में धान उत्पादन को प्रोत्साहित किया जाए. जिससे मीथेन का उत्सर्जन कम हो। साथ ही ईको फ्रेंडली कृषि को बढ़ावा दिया जाए।
डा. राजेन्द्र कुमार, महानिदेशक , उपकार

ताजा अपडेट के लिए हमारे फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए यहां, ट्विटर हैंडल को फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें।

Share it
Top