किसानों के लिए खुशखबरी, भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने मसूर की नई प्रजाति की विकसित, बढ़ेगी पैदावार

किसानों के लिए खुशखबरी, भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने  मसूर की  नई प्रजाति की विकसित, बढ़ेगी पैदावारमसूर

लखनऊ। मसूर एक ऐसी दलहनी फसल है जिसकी खेती भारत के लगभग सभी राज्यों की जाती है लेकिन पिछले कुछ सालों से मसूर की खेती की उत्पादकता में ठहराव आ गया था, इसके अलावा यह फसल तैयार होने में भी 130 से लेकर 140 दिन लेती है। ऐसे में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों ने मसूर की नई प्रजाति पूसा L4717 विकसित किया है। इसकी खासियत यह है कि मात्र 100 दिन में यह तैयार हो जाती और प्रति हेक्टेयर इसकी उत्पादकता भी 13 कुंतल है। केन्द्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने मसूर की इस नई किस्म की जानकारी किसानों को टि्वटर के माध्यम से दी है।

प्रोटीन और आयरन की प्रचुरता वाली मसूरी की इस प्रजाति को विकसित करने में कई सालों से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के कृषि वैज्ञानिक लगे हुए थे। इसी साल इसका फिल्ड ट्रायल करके इस बार के रबी सीजन के लिए इस प्रजाति को लांच किया है। सेंट्रल जोन और पानी की कमी वाले असिंचित क्षेत्रों के लिए इस प्रजाति की खेती बेहतर रहेगी।

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मसूर की खेती के बारे में जानकारी देते हुए गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रोद्योगिकी के दलहन वैज्ञानिक डा. एसके वर्मा ने बताया '' मसूर की खेत के लिए कृषि विभाग की तरफ से एक दर्जन पहले और भी किस्में लांच की गई हैं जिनकी बुवाई करके किसान अच्छी उपज ले सकते हैं।''

उन्होंने बताया कि यह किस्में हैं पन्त मसूर-639,पन्त मसूर-406, आई.पी.एल.-81, नरेन्द्र मसूर-1, डी0पी0एल0-62, पन्त मसूर-5, पन्त मसूर-4, डी.पी.एल.-15, एल-4076, पन्त मसूर-234, पूसा वैभव 18-22, के-75 और एच.यू.एल.-57 है।

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मसूर की खेती के लिए दोमट से भारी भूमि अधिक उपयुक्त होती है। धान के बाद खाली खेती में मसूर की बुवाई अक्टूबर के मध्य के बाद की किसानों को करनी चाहिए। मसूर की खेती के लिए भूमि की तैयारी जरूरी है। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और 2 से लेकर 3 जुताइयां देशी हल से करके पाटा लगाना चाहिए। मसूर की अगेती किस्म की बुवाई के लिए 40-60 किलोग्राम और पिछेती की बुवाई के लिए 55-75 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर जरूरतर होती है। मसूर की खेती के लिए बीजोउपचार भी जरूरी होता है। इसके लिए 10 किलोग्राम बीज को मसूर के एक पैकेट को 200 ग्राम राइजोबियम कल्चर से उपचारित करके बोना चाहिए।

मसूर में सिंचाई की कम जरूरत पड़ती है लेकिन इसके बाद भी इसकी पहली सिंचाई फूल आने से पहले करनी चाहिए। धान के खेतों में बोई गई मसूर की फसल में सिंचाई फली बनने के समय करनी चाहिए।

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