सरकारी नीतियों से रफ़्तार नहीं पकड़ पा रहा धान व्यापार

सरकारी नीतियों से रफ़्तार नहीं पकड़ पा रहा धान व्यापारयूपी सहित आंध्र प्रदेश, और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में चावल व्यापार पड़ा ठंडा

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। चावल उत्पादन के मामले में भारत के तीन सबसे बड़े राज्यों ( पंश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश) में मौजूदा समय में चावल व्यापार की गति धीमी पड़ गई है। लगातार बंद हो रही चावल मिलों और सरकारी नितियों के कारण न तो मिलों को फायदा मिल पा रहा है और न ही धान की खेती करने वाले किसानों को।

पिछले कुछ वर्षों से धान के व्यापार आई गिरावट के बारे में लखनऊ जिले के बासमती व मंसूरी चावल के बड़े व्यापारी अतुल अग्रवाल ( 43 वर्ष) बताते हैं,'' जब से सरकार मिलों से लेवी चावल लेना बंद कर दी है, तब से प्रदेश में 60 पर्सेंट मिलों में ताले लग चुके हैं। पहले मिलेें किसानों से समर्थन मूल्य पर धान लेकर कुछ धान खरीद का 60 फीसदी हिस्सा सरकार को लेवी चावल के रूप में बनाकर बेच देती थीं लेकिन अब सरकार ने लेवी खरीदना बंद कर दिया है।''

ऑल इंडिया राइस मिल एसोसिएशन के अनुसार पहले सरकार की लेवी निति के तहत धान मिलों को किसानों से धान को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद कर उसका 75 फीसदी हिस्सा एफसीआई को देना होता था। इसके बाद बाकी बचे हुए चावल को मिलर्स खुले बाज़ारों में बेच देते थें। सरकार ने वर्ष 2013-14 में मिलों से लिए जाने वाले लोवी चावल के 75 फीसदी हिस्से को घटाकर 60 फीसदी कर दिया, फिर खरीफ वर्ष 2014-15 में सरकार ने इसे 25 फीसदी कर दिया ,जिससे मिलों पर चावल बेचने का बोझ बढ़ता गया। वर्ष 2015-16 में सरकार ने पूरी तरह से लेवी की खरीद को बंद कर दिया।

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राइस मिलों के बंद हो जाने से न सिर्फ मिलर्स को नुकसान हुआ है बल्कि किसानों को भी सरकार व्दारा निर्धारित की गई एमएसपी पर धान का मूल्य नहीं मिल पा रहा है। लखनऊ जिले के बीकेटी ब्लॉक के रामपुर बहेड़ा गाँव के किसान जयशंकर सिंह ( 56 वर्ष) ने पिछले वर्ष 1100 रुपए कुंतल के हिसाब से दो कुंतल धान गाँव के पास की बाज़ार में बेचा था जबकि सरकार व्दारा जारी किया गया धान खरीद का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1470 रुपए था।

जयशंकर ने बताया,'' घाटा होने से मिलों ने अब किसानों से धान लेना बंद कर दिया है। इसलिए किसान या तो मंडी में धान लेकर जाता है या गाँव में ही व्यापारी को बेच देता है।''

पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब राज्यों में धान किसानों ने सरकार से यह शिकायत की थी कि उन्हें अपनी फसल के लिए पूरा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) नहीं मिल रहा है। उनका आरोप था कि गल्ला मंडियों और खरीद एजेंसियों के अधिकारी व कुछ अन्य लोगों के बीच गठजोड़ के कारण उन्हें अपनी फसल का पूरा दाम नहीं मिल पा रहा था।

भारत में चावल के सबसे बड़े उत्पादक राज्य पश्चिम बंगाल के बर्धमान क्षेत्र में चावल का बड़े स्तर पर निर्यात किया जाता है। बंगाल में चावल के व्यापार में लगातार हो रही कमी के बारे में राइस मिल एसोसिएशन,बर्धमान पंश्चिम बंगाल के क्षेत्रीय अधिकारी देव ज्योति बताते हैं,'' सरकार नेे पिछले वर्ष से ही यहां पर चावल का दाम 1500 रुपए प्रति कुंतल कर दिया है।यह दाम वैश्विक स्तर बहुत अधिक है। इसलिए अब ज़्यादातर देश भारत से व्यापार नहीं कर रहे हैं, जिससे यहां के मिलर्स घाटे में हैं।''

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भारत में चावल उत्पादन के मामले में शीर्ष तीन राज्यों ( पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और आंध्रप्रदेश) में भी धान व्यापार पिछले कुछ वर्षों से बुरी स्थिति से गुज़र रहा है।राइस मिल एसोसिएशन के अनुसार केंद्र सरकार ने वर्ष 2012 में उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश में लवी चावल की सरकारी खरीद को पूरी तरह से बंद कर दी थी। इससे दोनो ही प्रदेशों में सैकड़ों की संख्या में राइस मिलों को घाटा झेलना पड़ा था। वहीं पिछले दो वर्षो में पश्चिम बंगाल में सरकार की खाद्य सब्सिडी योजनाओं की संख्या बढ़ने और निर्यात कम होने से चावल कारोबार पर बुरा असर पड़ा है।बंगाल में वर्ष 2013-14 में करीब 1200 चावल मिलें थी।वहीं 2016 -17 में राज्य में चावल मिलों की संख्या घट कर एक हज़ार से भी कम हो गई है।

आंध्र प्रदेश राइस मिल एसोसिएशन के अधिकारी नागेंद्र गनप्पा बताते हैं,'' जिस हिसाब से यहां पर चावल का उत्पादन होता है, उसकी तुलना में मिलों की संख्या बहुत कम बची है। लेवी खरीद बंद हो चुकी है, इसलिए धान मिलें भी चावल का बड़े स्तर पर स्टॉक नहीं रख रही हैं। इससे व्यापार धीमा पड़ गया है।

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भारत में कृषि बज़ार एवं फसल उत्पादन व वितरण की जानकारी के लिए चल रहे बेव पोर्टल वल्र्ड ब्लेज़ के मुताबिक भारत में वर्ष 2017 में प्रमुख धान उत्पादन वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर है। शीर्ष पर पश्चिम बंगाल है और तीसरे स्थान पर आंध्र प्रदेश है।
जहां एकतरफ प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में चावल व्यापार में मंदी देखी जा रही है। वहीं पंजाब में पिछले कुछ वर्षों में धान व्यापार में सरकार ने राइस मिलर्स का अच्छा साथ दिया है। इस बारे में राइस मिलर्स एसोसिएशन, पंजाब के उपाध्यक बाल कृष्ण बाली ने बताया,'' पंजाब में सरकार इस समय मिलों को कस्टम राइस मिलिंग (सीआरएम) सुविधा प्रदान कर रही है। इस सुविधा में सरकार राइस मिलों से 80 फीसदी चावल की खरीद कर रही है और बाकी का 20 प्रतिशत हिस्सा मिलों को बेचने के लिए रखा गया है, जो कि मिलें खुदरा बाज़ार में आसानी से बेच लेती हैं।''

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