खेती किसानी

पास्ता और नूडल्स की तेजी से बढ़ रही है मांग, मुनाफा कमाना है तो बोइए गेहूं की ये किस्में

लखनऊ। गेहूं से बने पास्ता, नूडल्स, मैक्रोनी और बिस्किट की मांग पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ रही है। भारत में भी ऐसे उत्पादों की मांग में कई गुना का इजाफा हुआ है, लेकिन इतनी मांग के बावजूद गेहूं उगाने वाले किसानों को इसका लाभ नहीं मिल रहा है। भारत में पास्ता, नूडल्स बनाने वाला गेहूं अभी तक ज्यादातर विदेशों से आयात किया जाता है। लेकिन देश के किसान मुनाफा कमाने के लिए गेहूं की उन्हीं किस्मों को उगा सकते हैं, जो बेहतर कीमत पर बिक सकेंगी।

गेहूं एक ऐसी फसल है जिसकी खेती देश के लगभग सभी हिस्सों में की जाती है। हाल के वर्षो में जीवन स्तर में सुधार और खानपान कीर बदलती आदतों की वजह से गेहूं के प्रसंस्कृत खाद्ध पदार्थों की मांग तेजी से बढ़ रही है। पारंपरिक तौर पर लोग गेहूं से बनने वाले रोटी और चपाती के बदले गेहूं से बने दूसरे खाद्य पदार्थों को पसंद कर रहे हैं। आटा और मैदा के अलावा कुछ फीसदी गेहूं से बिस्कुट, ब्रेड, केक और अन्य बेकरी उत्पादों बनते हैं, जिनकी मांग तेजी से बढ़ी है। ये खाद्य पदार्थ महंगी कीमत पर बिकते हैं। यानि प्रसंस्करण के बाद उसी गेहूं की कीमत कई गुना ज्यादा हो जाती है। लेकिन भारत के किसानों के खाते में अपेक्षानुसार लाभ नहीं आता।

भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल हरियाणा की रिपोर्ट के मुताबिक गेहूं के प्रसंस्करण आंकड़ों के अनुसार किसानों को उपभोक्ता की तरत से अदा किए गए एक रूपए में से मात्र 31 पैसा ही मिलता है। ऐसे में किसानों को हर साल घाटा हो रहा है। इसलिए जरुरी है कि किसान अच्छी किस्सें उगाएं और कोशिश करें उसे प्रोडक्ट बनाकर बेंचे।

गेहूं के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में किसानों की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए यह जरूरी है, किसान गेहूं आधारित उत्पादन बनाने वाली छोटी या बड़ी इकाईयां स्थापित करें।
अनुज कुमार, कृषि वैज्ञानिक, भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल

गेहूं के उत्पाद बनाने पर जोर देते हुए कृषि वैज्ञानिक अनुज कुमार ने बताया, ''गेहूं के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में किसानों की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि कुछ किसान या उसके परिवार के लोग गेहूं आधारित उत्पादन बनाने वाली छोटी या बड़ी इकाईयां स्थापित करें।''
लेकिन किसानों के साथ समस्या ये है कि उन्हें न अच्छी किस्मों की जानकारी हो पाती है, और न प्रसंस्करणकी पर्याप्त ट्रेनिंग। कानपुर देहात जिले के अमरौधा ब्लॉक के ग्राम जरईलापुर के किसान सुदीप कुमार बताते हैं, '' फैक्ट्री लगा तो लें लेकिन यही नहीं पता इसके लिए गेहूं कौन सा (किस्म) चाहिए। हमें कोई बताता नहीं गेहूं की कौन सी किस्म प्रसंस्करण उद्योग में काम आता है। ऐसे में किसान परंपरागत तौर पर गेहूं की जो किस्में हैं उसी की खेती करता है।''

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संस्था के मुताबिक देश में 68-68 मिलियन टन गेहूं और उससे बने उत्पादों की वार्षिक खपत है। भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान संस्थान के मुताबिक किसानों को एक तरफ जहां खाद्ध् प्रसंस्करण के बारे में जागरूकता कम है वहीं उन्हें इस बात की भी जानकारी नहीं है कि वह गेहूं की कुछ खास किस्मों की खेती करें जहां पर गेहूं के प्रसंस्करण उद्योग में ऐसे गेहूं की ज्यादा मांग है।

पास्ता बनाने के लिए ये किस्में हैं उपयुक्त

जैसे पास्ता बनाने के लिए पंजाब, हरियाणा,  पश्चिम उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के तराई क्षेत्र, जम्मू के कठुवा, हिमांचल प्रदेश के उना जिलों के लिए पीडीडब्ल्यू- 233, डब्ल्यूएच-896, डब्ल्यूएचडी -943, पीडीडब्ल्यू- 291 और पीडीडब्ल्यू -313 किस्म की गेहूं की बुवाई करने के लिए किसानों को सलाह जारी की गई है।

देश के मध्य क्षेत्र खासकर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, राजस्थान के कोटा, उदयपुर और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के क्षेत्र के लिए एचआई- 8627, एचआर- 8663, एचआई-8498, एचआई-8713 और एचडी- 4672 किस्म की खेती किसानों के लिए बेहतर हैं, जिससे पास्ता बनता है। महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसान एमएसीएस-2846 किस्म की गेहूं की खेती करके खाद्य प्रसंस्करण उद्योग लगा सकते हैं।

किसानों को नहीं अच्छी और मुनाफा देने वाली किस्मों की जानकार

उत्तर प्रदेश में गोरखपुर जिले बांसगांव ब्लाॅक के रूद्रपुर गांव के किसान रामाशीष ने बताया, ''गेहूं से जुड़े प्रसंस्करण उद्योग की ईकाइयां लगाने के लिए जो सहायता हमें सरकार की तरफ से मिलनी चाहिए नहीं दी जाती है। ऐसे में हम चाहकर भी गेहूं से जो कमाई करनी चाहिए नहीं कर पाते हैं। '' देश में गेहूं से बने आटे का प्रसंस्करण उद्योग अभी काफी असंगठित है। पारंपरिक तौर पर आटा बनाने के लिए अभी भी गांव से लेकर शहरों तक छोटी-छोटी आटा चक्कियां स्थापित हैं। ऐसे में देश में अब किसानों को गेहूं प्रसंस्करण करने वाली ईकाईयां लगाने की जरूरत है।”

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