जानिए, बढ़ते प्रदूषण से मांसाहारी पौधे कैसे बन रहे हैं शाकाहारी

जानिए,  बढ़ते प्रदूषण से मांसाहारी पौधे कैसे बन  रहे हैं शाकाहारीकीटभक्षी पौधों की डाइट में कीड़ों की जगह एल्गी या शैवाल ने ली है।

इंदल सिंह भदौरिया

लखनऊ। जहां एक तरफ मांसाहार राजनीतिक और सामाजिक मंचों का मुद्दा बना हुआ है और यूपी में अवैध बूचड़खानों पर ताले लग रहें हैं, वहीं अब पौधे भी शाकाहारी बन रहे हैं। नई खबर ये है कि मांसाहार की जगह शाकाहार अपनाने वालों में कीटभक्षी पौधे भी शामिल हो गए हैं और ऐसा हुआ है बढ़ते प्रदूषण की वजह से।

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इस समय मांसाहार छोड़कर शाकाहार अपनाने का चलन बड़े जोरों पर है। लोग मांसाहार खानपान छोड़कर शाकाहार बन रहे हैं। इन्हीं सब के बीच अब कीटभक्षी पौधे भी अब वेजीटेरियन बन रहे हैं। भारत में ऐसे मांसाहारी पौधों की 30 प्रजातियां पाई जाती हैं। दुनिया भर में कीटभक्षी पौधों की 400 प्रजातियां है। ये पौधे ऐसी जगह उगते हैं जहां नाइट्रेट की कमी होती है। इस कमी को पूरा करने के लिए ही ये पौधे कीटों के शरीर से नाइट्रेट ले लेते हैं लेकिन ‘ऑस्ट्रिया की विएना यूनिवर्सिटी’ के शोधकर्ताओं, मरियानेकॉलर पेरूटा और वोलफ्रेम एडलेसनिग ने पाया कि अब कीटभक्षी पौधों की डाइट में कीड़ों की जगह एल्गी या शैवाल ने ली है। शैवाल सूक्ष्म पौधे होते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह बदलाव वातावरण में बढ़ने वाले प्रदूषण की वजह से हुआ है।

वनस्पति जगत में कुछ पौधे अपने विशेष अंगों से छोटे-छोटे कीट, पतंगों को पकड़कर उनका रस चूस लेते हैं और इस तरह पोषक तत्वों की कमी की पूर्ति कर लेते हैं। ऐसा ही एक पौधा है ‘यूट्रीकुलैरिया या ब्लैडरवार्ट’। यह एक जड़ रहित बारीक पत्तों वाला पौधा है जो झील और तालाबों में तैरता रहता है। इसकी कुछ पत्तियां फूल कर थैली या ब्लैडर के आकार की हो जाती हैं। इस ब्लैडर के पास एक छोटा सा रास्ता होता है जो केवल अंदर की ओर ही खुलता है। अगर पानी में तैरता हुआ कोई कीड़ा इन बालों के संपर्क में आता है तो ये बाल उसे जकड़कर ब्लैडर के अंदर खींच लेते हैं। ब्लैडर के अंदर पौधे का पाचक रस कीड़े के शरीर को घोल लेता है और पौधा इससे मिलने वाले पोषक तत्वों का अवशोषण कर लेता है।

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