दलहनी फसलों में चने की खेती के लिए किसान अभी से करें तैयारी

दलहनी फसलों में चने की खेती के लिए किसान अभी से करें तैयारीचना की बुवाई का समय अक्टूबर से शुरू हो रहा है

लखनऊ। सरकार ने वर्ष 2021 तक देश को दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में चना की खेती को बढ़ाने के लिए तैयारी कर रहा है। सरकार ने इस वर्ष 2017-18 के लिए 210 लाख टन दलहनी फसलों के उत्पादन का रखा है, जिसमें 33 प्रशिशत से ज्यादा हिस्सा चने का है। रबी सीजन की प्रमुख फसल चना की बुवाई का समय अक्टूबर से शुरू हो रहा है, ऐसे में किसान चना की बुवाई की अभी से तैयारी करें।

चना की खेती करने में किसानों को कोई समस्या न हो और उनको चना की खेती की सभी जानकारी उनको एक क्लिक पर मिल जाए इसके लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने चना किसानों के लिए मोबाइल एप चनामित्र को किया लांच। किसान इस मोबाइल एप को डाउनलोड करके चना की खेती की सभी जानकारी ले सकते हैं।

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देश में कुल दलहनी फसलों के करीब 27 फीसदी रकबे पर चने की खेती की जाती है। देश में लगभग 250 लाख हेक्टेयर में दलहनी फसलें की बुवाई की जाती है। उन्नत तकनीक और पादप संरक्षण के तरीकों का सही इस्तेमाल न करने के कारण इस की राष्ट्रीय उत्पादकता मात्र 623 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर ही रह गई है। ऐसे में इसको बढ़ाने के लिए काम किया जा रहा है। ऐसे में चना के उत्त्पादन को बढ़ावा देने के लिए भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपुर ने चना की कई उन्नतशील किस्मों को विकसित किया है जिसकी खेती करके किसान चना का अधिक उत्पादन ले सकते हैं।

इस बारे में जानकारी देते हुए यहां के कृषि वैज्ञानिक डॉ. आईपी सिंह ने बताय '' चना की खेती के लिए दोमट या भारी दोमट मिट्टी जहां पानी के निकास की व्यवस्था हो वहां पर इसकी अच्छी खेती की जा सकती है। ''

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उन्होंने बताया कि भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान ने आईपीसीके-02 नामक प्रजाति को हरियाणा, पंजाब, जम्मू, दिल्ली, उत्तराखंड, उत्तरी राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को ध्यान में रखते हुए विकसित किया है। बड़े दानों वाली चना की यह प्रजाति उकठा रोग के प्रति भी अवरोधी है। यह बाकी प्रजातियों की तुलना में अधिक उपज भी देती है।

एमएनके-1 नामक चना की प्रजाति को भी एआरएस गुलबर्गा कर्नाटक ने विकसित किया है। इसके दाने भी बड़े होते हैं। कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, तमिलनाडु, के लिए इस प्रजाति को विकसित किया गया है। यह 12 से लेकर 13 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज देती है और इसमें उकठा रोग का भी खतरा नहीं रहता है।

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देश में चना की खेती का अधिक से अधिक उत्पादन हो इसके लिए एसवीबीपी कृषि एवं प्रोद्वोगिकी विश्वविद्वालय मेरठ ने डब्ल्यूसीजीके नामक चना की प्रजाति विकसित की है। हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, उत्तराखंड, उत्तरी राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेशम में खेती के लिए इस प्रजाति को चिन्हित किया गया है। यह प्रजाति भी उकठा रोधी और 24 कुंतल प्रति हेक्टेयर यह उपज भी देती है।

खेत की तैयारी-चना खासतौर से मध्यम से भारी मिट्टी में आसानी से उगाया जा सकता है, जिस का पीएच 5.6 से 8.6 के बीच हो। खेत की तैयारी के लिए खरीफ मौसम में खाली पड़े खेतों की सितंबर के आखिरी हफ्ते या अक्तूबर के शुरू में जुताई करें, बाद में रोटावेटर चला कर मिट्टी को भुरभुरी कर के पाटा लगा कर बुवाई करनी चाहिए।

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बीजदर व बीजोपचार- ज्यादा पैदावार के लिए बीजों के आकार के मुताबिक देसी चने की 75 किलोग्राम, जबकि बड़े आकार के काबुली चने की 125 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से ले कर बुवाई करनी चाहिए। बोआई के समय लाइन से लाइन की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रहनी चाहिए। बीजों को बोने से पहले मेंकोजेब की 3 ग्राम या कार्बेंडाजिम या कार्बोक्सिन की 2 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित करने के बाद राइजोबियम और पीएसबी कल्चर से 5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से शोधित करना चाहिए।

बुवाई का समय और तरीका- सामान्य समय पर इसकी बुवाई अक्तूबर से लेकिर 15 नवंबर तक होनी चाहिए। सिंचित इलाकों में 30 नवंबर तक और देरी से दिसंबर के पहले सप्ताह तक भी कर सकते हैं। चना की बुवाई सीड ड्रिल से करना अच्छा रहता है। बुवाई में लाइन से लाइन की दूरी असिंचित और पछेती दशा में 20-25 सेंटीमीटर और सामान्य सिंचित दशा में 45 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। कूंड की गहराई 6-8 सेंटीमीटर और पौधों की आपसी दूरी 8-10 सेंटीमीटर रखनी चाहिए।

उर्वरकों की मात्रा- कंपोस्ट खाद की सही मात्रा हो तो 2.5 टन प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें या 2 से 3 किलोग्राम पीएसबी कल्चर को 50 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद में मिला कर आखिरी जुताई से पहले खेत में प्रति हेक्टेयर की दर डालें। दलहनी फसलें अपनी नाइट्रोजन की जरूरत का करीब 75 फीसदी सहजीवी बैक्टीरिया राइजोबियम से पूरा कर लेती हैं। चने की अच्छी पैदावार लेने के लिए 20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस, 20 किलोग्राम पोटाश और 20 किलोग्राम गंधक की प्रति हेक्टेयर की दर से जरूरत होती है।

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