भूसे से मालामाल हो रहे पूर्वांचल के किसान

भूसे से मालामाल हो रहे पूर्वांचल के किसानगेहूं का भूसा बनाते किसान।

लखनऊ। किसानों के मवेशियों के लिए गेहूं का भूसा सबसे मुफीद चारा माना जाता है। यह एक ऐसा चारा है जिसको पूरे साल घर में रखकर गाय, बैल और भैंसों को खिलाया जाता है। लेकिन बदलते दौर में जब गेहूं की कटाई और मड़ाई के लिए कंबाइन मशीनें आ गईं तो भूसा बनना कम हो गया। ऐसे में कई जगहों पर मवेशियों के लिए चारा का संकट उत्पन्न हो रहा है। लेकिन पूर्वांचल के किसानों ने चारे की इस समस्या से निपटने के लिए जहां फिर से भूसा बनाना शुरू किया, वहीं बाजार में भूसे को बेचकर अच्छी कमाई भी कर रहे हैं।

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देवरिया जिले के रूद्रपुर ब्लाक के केवटलियां गॉंव के किसान राधेश्याम यादव ने बताया '' गेहूं की मड़ाई के लिए जब आधुनिक मशीने नहीं थी और थ्रेसर और कंबाईन का इस्तेमाल शुरू नहीं हुआ था, उस समय बैल के जरिए गेहूं की मड़ाई में भूसा बड़ी मात्रा में पैदा होता था। लेकिन अत्याधुनिक मशीने आने से भूसे को लेकर संकट पैदा हो गया है। ''

उन्होंने कहा कि गेहूं की कटाई में कंबाईन मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल से गॉंव-गॉंव में लोगों को भूसा से हाथ धोना पड़ रहा है। कंबाईन मशीने ऊपर सिर्फ गेहूं की बालियों को काटती है। गेहूं का डंठल जिससे भूसा बनता है वह खेत ही रह जाता है। ऐसे में यहां के किसानों ने तय किया कि वे लोग कंबाईन मशीन से गेहूं की कटाई नहीं कराएंगे, बल्कि गेहूं की कटाई करके थ्रेसर से मड़ाई कराएंगे जिससे भूसा मिल सके। राधेश्याम ने बताया कि इसका नतीजा यह हुआ कि इस बार उनके क्षेत्र में लोगों ने गेहूं के साथ ही बड़ी मात्रा में भूसा भी मड़ाई से पाया।

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किसानों के बीच परंपरागत खेती को बढ़ावा देने के लिए काम करने वाले कृषि विशेषज्ञ और गोरखपुर के मनोज कुमार ने बताया कि दो दशक पहले तक यूपी में गेहूं की कटाई मजदूरों से कराकर खलिहान में लाकर पंपिंग मशीनें और ट्रैक्टर से चलने वाले थ्रेसरों से गेहूं की मड़ाई होती थी। इससे बड़ी मात्रा में भूसा पैदा होता था। स्थिति यह थी कि यहां का भूसा देश के बाकी राज्यों में मवेशियों के चारा के लिए जाता था। उन्होंने बताया कि पंजाब और हरियाणा के बाद यूपी में कंबाईन मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल से भूसा बनना लगभग खत्म सा हो गया है। लेकिन पिछले दो साल से किसानों के अंदर भूसा को लेकर चेतना जागी है। ऐसे में इस साल यहां के किसान बड़ी मात्रा में गेहूं की मड़ाई में भूसा पैदा किए हैं।

भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान झांसी के वैज्ञानिक डॉ. सुनील कुमार ने बताया कि मवेशियों के लिए गेहूं के भूसे का चारा सदियों से इस्तेमाल रहा है, लेकिन पिछले कुछ सालों में भूसा बनना कम हुआ है। हालांकि, अब किसान भूसा को लेकर जागरूक हो रहे हैं। भूसा अधिक पैदा होने से मवेशियों के चारा का संकट भी दूर होगा। इसके अलावा खेतों में अवशेष जलाने का प्रचलन भी इससे रूक जाएगा।

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