सिंघाड़ा लगाने का काम शुरू, लेकिन नर्सरी के लिए किसानों को रही परेशानी

सिंघाड़ा लगाने का काम शुरू, लेकिन नर्सरी के लिए किसानों को रही परेशानीगोसाईगंज के एक तालाब में सिंघाड़ा लगाती एक महिला। (फोटो-प्रमोद अधिकारी)

अश्वनी कुमार निगम

लखनऊ। नहरों पोखरों और तालाबों में पानी की मात्रा बढ़ने के साथ ही गांवों में सिंघाड़े की बेल डालने का काम शुरू हो चुका है, लेकिन सिंघाड़े की पर्याप्त संख्या में बेल नहीं मिलने से सिंघाड़ा उत्पादक किसान परेशान हैं। बाराबंकी जिले के सफीपुर गांव में रहने वाले 45 साल के शोभेलाल ने बताया '' पिछले एक दशक से तालाब में सिंघाड़ा डालने का काम करता हूं, लेकिन हर साल सिंघाड़े की बेल के लिए परेशानी उठानी पड़ती है। '' उन्होंने बताया कि मई और जून के महीने में ही गांव के छोटे तालाब, पोखरों और गड्डों में जिस सिंघाड़े के बीज को बोया गया था उसमें बहुत कम बेल बनी है। यह हर साल की समस्या है।

देश के विभिन्न राज्यों खासकर बिहार, झारखंड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और मध्यम प्रदेश की राज्य सरकारों ने सिंघाड़ा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए अपने राज्यों में इसके किसानों को नर्सरी सुविधा से लेकर तमाम प्रकार की सब्सिडी और सुविधाएं दे रही हैं जबकि उत्तर प्रदेश सरकार इसके अभी बहुत कुछ नहीं कर रही है। इसके बाद भी राजधानी लखनऊ से सटे बाराबंकी और आसपास के दूसरे जिलों में किसानों की पहली पसंद बन रहा है। परंपरागत तौर पर खेती-किसानी करने वाले ग्रामीणों का रूझान भी सिंघाड़े की खेती की तरफ बढ़ रहा है। कम समय में ज्यादा मुनाफा देने के कारण भी कुछ खास जातियों खासकर मछुआरो-कहारों के अलावा अब सामान्य किसान भी इसको अपना रहे हैं।

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सिंघाड़ा उत्पादक किसानों का कहना है कि अगर सरकार उनकी मदद करें तो सिंघाड़े की खेती से छोटे और सीमांत किसानों की माली हालत में सुधार आ सकता है। सिंघाड़े की खेती को लेकर सरकार की तरफ से जो मदद मिलनी चाहिए वह किसानों को नहीं मिल पा रही है। बाराबंकी जिले का गदिया गांव भी पूरे जिले में सिंघाड़े की खेती के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता है़ इस गांव के लगभग सभी तालाबों में सिंघाड़े का उत्पादन होता है। इस गांव के रहने वाले और पिछले तीस साल से सिंघाड़े की खेती करने वाले रामजीवन कहते हैं '' हमारे गांव में जितने भी छोटे-बड़े तालाब हैं सभी में सिंघाड़ा लगाया जाता है। इस बार इस बार भी सिंघाड़ा लगाने का काम चल रहा है लेकिन सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिल रही है। नर्सरी नहीं होने से हम लोगों को परेशानी होती है।''

सिंघाड़े की बुवाई बरसात शुरू होते ही जुलाई से लेकर अगस्त के पहले सप्ताह की तक किया जाता है। यह बहुत की मेहतन भरा काम होता है. बाकी फसलों के मुकाबले सिंघाड़े की नर्सरी बाहर कहीं उपलब्ध नहीं होती है। ऐसे में गांव के कुछ सिंघाड़े की फसल के विशेषज्ञ लोग ही इसे तैयार करते हैं। मई और जून के महीने में ही गांव के छोटे तालाब, पोखरों और गड्डों में इसका बीज बोया जाता है, इसे बाद एक महीने में बेल के रूप में इसका पौधा तैयार किया जाता है। जिसको निकालकर तालाब और तालों में इसे डाला जाता और यह बेल के रूप में ताबाल की सतह में फैल जाती है। पानी में रहने के कारण सिंघाड़े की फसल में तमाम तरह बीमारियों और कीट-पतंगों से भी इसे खतरा रहता है। ऐसे में इसको बचाने के लिए समय-समय पर इसमें दवाएं और खाद भी इसमें डाली जाती है।

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सिंघाड़ा की खेती करने वाले लखनऊ जिले के गोसाइगंज के किसान राधेशयात बताते हैं कि गांव के अधिकतर तालाब चूंकि ग्रामसभा की संपत्ति होती है इसलिए सिंघाड़े की खेती के लिए इसे पांच से लेकर छह महीने के लिए ग्रामसभा से पट्टे पर लिया जाता है, इसके लिए तालाब के क्षेत्रफल के अनुपात ग्रामसभा को पैसा देना पड़ता है। जिसमें एक तालाब को पट्टा 15 हजार से लेकर एक लाख रुपए तक का होता है। ''

सिंघाड़ें की खेती करने में जोखिम भी उठाना पड़ता है अगर किसी साल बरसात कम हुई और सिंघाड़े की फसल सही नहीं हुई तो काफी घाटा भी उठाना पड़ता है, हालांकि इस साल अच्छी मानसूनी बरसात को देखते हुए सिंघाड़े की फसल अच्छी होने की संभावना है क्योंकि इस साल पर्याप्त बारिश होने के कारण जहां गांव के पोखर, तालाब और ताल लबालब भरे हैं।

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इंडियन डायेटिक एसोसएिशन की सीनियर डायटिशियन डॉ विजयश्री प्रसाद ने बताया '' सिंघाड़ा के आटे का प्रयोग कई प्रकार की दवाओं के बनाने में भी किया जाता है इसलिए इसकी डिमांड भी दिनोंदिन पहले की तुलना में बढ़ रही है।' उन्हेांने बताया कि थॉयरायड और घेंघा रोग को दूर करने में इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है, चूंकि इसमें आयोडीन अधिक पाया जाता है इसलिए इन बीमारियों से ग्रसित मरीजों के लिए यह फायदेमंद है।

जो सिंघाड़े अभी तालाब में लगाए जा रहे हैं उन सिंघाड़े के बेल में अक्टूबर में फल आना शुरू हो गया है ओर इसके बाद इसे तोड़ने का काम शुरू हो जाएगा। नवरात्रि शुरू होते ही इसकी डिमांड तेजी से बढ़ जाएगी़ क्योंकि व्रतधारी इसको खाते हैं साथ ही इससे तैयार होने वाला आटा भी व्रत में खानेपीने की चीजों में प्रयोग होता है।

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