केंद्र ने दिया खेतिहर मजदूरों को दिवाली का तोहफा, चिंता में आए बड़े किसान

केंद्र ने दिया खेतिहर मजदूरों को दिवाली का तोहफा, चिंता में आए बड़े किसानप्रतीकात्मक फोटो।

लखनऊ। केंद्रीय श्रम मंत्रालय द्वारा खेतिहर मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी 350 रुपए तय करने के फैसले से खेतिहर मजदूरों की तो दिवाली खुशनुमा हो गई, लेकिन बड़े किसानों के माथों पर चिंता की लकीरें उभर आई हैं। केंद्रीय मंत्रालय ने यह फैसला उन अकुशल कृषि श्रमिकों के लिए लिया है जो तीसरी श्रेणी में आने वाले इलाकों में हैं।

100 रुपये मिलती है मजदूरी

सरकार के इस फैसले के बारे में सुनकर लखनऊ के उत्तर में 40 किमी दूर स्थित शाहपुर गाँव के खेतिहर मजदूर परमेश्वर कहते हैं, "ऐसा हो जाएगा जो तो जिंदगी सुधर जाएगी। अभी 100 रुपए मजदूरी मिलती है तो दो-तीन दिन काम करो, तब जाकर घर की व्यवस्था भर का पैसा इकट्ठा हो पाता है"। परमेश्वर अपनी तीन बेटियों की शादी कर चुके हैं, उनके दो बच्चे और हैं जो अभी छोटे हैं। परमेश्वर कहते हैं कि "दिवाली है अब, तो 100 रुपए मिले थे मजदूरी करके, उसमें क्या कर लें।"

संसद के शीतकालीन सत्र में किया जाएगा पेश

श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने कहा कि मंत्रालय इस संबंध में एक नवंबर को अधिसूचना जारी करेगा। वर्तमान में अभी मजदूरी की दर 160 रुपये प्रतिदिन है। दत्तात्रेय ने कहा कि ‘पारिश्रमिक संहिता’ पर त्रिपक्षीय बैठकें पूरी हो चुकी हैं। इसे अब मंत्रिमंडल की मंजूरी के लिए रखा जाएगा। इसे अगले महीने होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में पेश किया जाएगा।

फिर यह यूनिवर्सल न्यूनतम मजदूरी

बंडारू दत्तात्रेय ने कहा, "हम न्यूनतम मजदूरी एक्ट में बदलाव करने जा रहे हैं, इसके बाद यह यूनिवर्सल न्यूनतम मजदूरी कहलाएगी। एक बार बदलाव हो जाने के बाद ये कानून बन जाएगा, फिर सभी राज्यों को इसे बरकरार रखना पड़ेगा।"

बड़े किसानों की बढ़ी मुश्किलें

हालांकि सरकार के इस फैसले से बड़े किसानों की जेब का भार बढ़ना तय है। उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले में 20 एकड़ ज़मीन पर खेती करने वाले किसान श्रीस त्रिवेदी (40 वर्ष) ने गाँव कनेक्शन को बताया, "अगर सरकार ऐसा कर देगी तो हमारे लिए बड़ा मुश्किल हो जाएगा। अगर हमारे पास देने को 200 से 350 रुपए होते तो खेती में मजदूरों की कमी ही क्यों होती। इतना पेमेंट बड़ा किसान दे दे तो मजदूर भट्टे या मनरेगा में जाएगा ही क्यों, लेकिन बात यह है कि इतनी मजदूरी देने को है ही नहीं।"

तब किसान को होगा घाटा

श्रीस कहते हैं कि इस न्यूनतम मजदूरी की अगर बाध्यता कर देंगे तो किसान अपने खेत में काम करा ही नहीं पाएगा क्योंकि हर किसान अपने मुनाफे से हाथ धोकर, घाटे में चला जाएगा। श्रीस जैसे किसान खेती की एक नई बयार का भी अनुभव कर रहे हैं जिसमें मजदूरों पर से निर्भरता कम करने की ओर रूझान है। "हम अब ऐसी ही फसलें उगाने की कोशिश कर रहे हैं जिनका ज्यादातर काम मशीनों से हो सके और मजदूरों पर निर्भरता कम हो जाए। मजदूरी तो बढ़ा दी सरकार ने लेकिन एमएसपी पर हमारा धान नहीं बिकता तो कहां से निकालेंगे मजदूरी का बढ़ा हुआ खर्च।"

मजदूरी तो तय देंगे मगर

वर्तमान समय में राज्य कई श्रेणी के मजदूरों के लिए मजदूरी खुद ही तय करते रहे हैं और इसकी कोई भी न्यूनतम सीमा तय नहीं है। हालांकि लखनऊ के शाहपुर गाँव के एक खेतिहर मजदूर ने जो अपनी चिंता रखी उस पर सरकार को भी ध्यान देना होगा। छोटेलाल (40 वर्ष) ने कहा, "मजदूरी तो तय कर देंगे 350 पर वो हमें मिल पाए तो है। मनरेगा में भी तो तय है सब बीच में खा लेते हैं, पूरा मिलता कहां है"।

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