आलू की फसल पर मंडरा रहा पछेती झुलसा का ख़तरा, हो जाएं सावधान

आलू की फसल पर मंडरा रहा पछेती झुलसा का ख़तरा, हो जाएं सावधानआलू की फसल पर झुलसा रोग का ख़तरा।

पिछले कुछ दिनों से लगातार कोहरे ने वातावरण को ढक रखा है, तापमान में भारी गिरावट आई है। इसको देखते हुए कृषि विभाग भारत सरकार ने चेतावनी जारी करते हुए सभी कृषि विज्ञान केंद्रों को सतर्क रहने के निर्देश दिये हैं, क्योंकि कोहरे और ठंढ की वजह से आलू की फसल में झुलसा रोग लगने का ख़तरा रहता है। यह रोग फसल को पूरी तरह से बर्बाद कर देता है। इस लिए अगर इससे पहले से बचाव नहीं किया गया तो आलू के उत्पादन में कमी आ सकती है।

उत्तर प्रदेश उद्यान विभाग के आलू विकास अधिकारी वाहिद अली ने बताया, ''बदली और कोहरे की वजह से फंगस का इनफेक्श हो जाता है, जिसकी वजह से झुलसा रोग लग जाता है। उन्होंने बताया, ''पछेती झुलसा के बचाव के लिए जैसे ही बदली हो तुरंत दवाओं का छिड़काव करें, क्योंकि अगर एक बार इसका प्रकोप हो गया तो बचाव करना बहुत मुश्किल हो जाता है।''

ये भी पढ़ें- घटता-बढ़ता तापमान घटा सकता है गेहूं की पैदावार

झुलसा रोग से प्रभावित आलूू की फसल।

झुलसा रोग दो प्रकार का होता है, अगेती झुलसा और पछेती झुलसा। अगेती झुलसा दिसंबर महीने की शुरुआत में लगता है जबकि पछेती झुलसा दिसंबर के अंत से जनवरी के शुरुवात में लग सकत है। इस समय आलू की फसल में पछेती झुलसा रोग लग सकता है। जो फसल इसकी चपेट में आ जाती है वो लाख कोशिश के बावजूद सभल नहीं पाती है।

राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के अनुसार भारत में हर वर्ष करीब 31521.95 हैक्टेयर में आलू की बुआई की जाती है, जिससे औसतन 613435.27 मीट्रिक टन उत्पादन होता है।

ये भी पढ़ें- बेड विधि से चने की खेती से कम लागत में होगा अधिक उत्पादन

केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम, मेरठ ने बीते वर्षों की तरह इस वर्ष भी नई विकसित ब्लाइट कास्ट (पैन इण्डिया माडल) से पछेती झुलसा बीमारी का अनुमान लगाया है। मौसम की अनुकूलता के कारण आलू की फसल में पछेती झुलसा बीमारी की संभावना व्यक्त की गई है।

इस बारे में जानकारी देते हुए उद्यान विभाग के निदेशक एसपी जोशी ने बताया कि जिन किसान भाइयों ने अभी तक आलू की फसल में फफूदनाशक दवा का पत्तियों पर झिड़काव नहीं किया है या जिन किसानों की आलू की फसल में पछेती झुलसा बीमारी के लक्षण अभी नहीं दिखें हैं उन सभी किसान भाइयों को सलाह दी जाती है कि वे मैन्कोजेब/प्रोपीनेब/क्लोरो थेलोनील युक्त फफूदनाशक दवा का ऐसी आलू की प्रजातियों पर छिड़काव करें जो जल्दी से बीमारी की चपेट मे आ जाते हैं। दो से ढाई किलोग्राम दवा 1000 लीटर में घोल कर प्रति हेक्टेयर छिड़काव कराना जरुरी है।

ये भी पढ़ें- जानिए कैसे बचाएं गन्ने को इस रोग से

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि जिन खेतों में बीमारी के लक्षण दिखने लगे हों उनमें साइमोइक्सेनील मैनकोजेब का 03 किग्रा 1000 लीटर में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें। इसी प्रकार फेनोमेडोन मैनकोजेब 03 किग्रा 1000 लीटर में घोलकर एक हेक्टेयर पर छिड़काव करना है अथवा डाई मेथामार्फ एक किग्रा मैनकोजेब दो किग्रा 1000 लीटर में घोलकर छिड़काव करने की सलाह दी जाती है। बार-बार फफूदनाशक का छिड़काव न करें।

इस समय भारत दुनिया में आलू के रकबे के आधार पर चौथे और उत्पादन के आधार पर पांचवें स्थान पर है। आलू की फसल को झुलसा रोगों से सब से ज्यादा नुकसान होता है।

ये भी पढ़ें- कभी माओवादियों का गढ़ कहे जाने वाले गाँव के लोग सीख रहे हैं वैज्ञानिक तरीके से खेती

फर्रुखाबाद के आलू एवं साकभाजी विभाग अधिकारी नेपाल राम ने बताया, ''पछेती झुलसा का प्रभाव फसल पर अगेती झुलसा के मुकाबले ज्यादा पड़ता है।'' उन्होंने बताया, ''मोजेक से बचने के लिए किसानों को फास्फोमाईडान या मोनोक्रोटोफास की एक एसएल प्रति लीटर पानी मीलाकर हर 15 दिन पर छिड़काव करना चाहिए।''

ये भी देखें- जानिए क्या होती है मल्टीलेयर फार्मिंग

Share it
Top